ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 27, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंरामेश्वर यात्रा करके वहांसे पुनः आलंदी आये और आपेगांव जाकर माता-पिताके दर्शनकी अपनी इच्छा उन्होंने सिद्धेश्वरपंतसे कही। सिद्धेश्वर पंतने भी प्रसन्नतासे दामादकी इच्छा मान ली। स्वयं पत्नी और पुत्रीको साथ लेकर दामादके साथ उनके घर जानेके लिये तैयार हो गये। वहां आपेगांवमे विट्ठलपंतके पिता गोविंदपंत और माताजी अपने पुत्रके आगमनकी प्रती- क्षामें घुल रहे थे। वे पुत्रको, वह भी पत्नीके साथ आया हुआ देखकर बडे प्रसन्न हो गये। सिद्धेश्वरपंतने वस्त्राभरणसे गोबिंदपंत और उनकी पत्नी नीरादेवीका सन्मान किया। विवाहकी सारी कथा सुनाई और दामाद और अपनी पुत्रीको उनके घर छोडकर अपने घर लौट आये। विठ्ठलपंतने सुखसे माता पिता और पत्नीके साथ कुछ दिन बिताये। वार्धक्यके कारण मातापिता वैकुंठवासी हो गये। घर प्रपंचका सारा भार विठ्ठलपंत पर आया। वह भी अपने गांवके ग्रामाधिकारी थे। किंतु वे इन सबसे उदासीन रहते थे। उनके जीवनक्रमके विषयमे पुरानी पोथियोंमें तत्कालीन संत नामदेवने लिख रखा है -
नित्य हरिकथा नाम-संकीर्तन संत दर्शन सर्वकाल॥ आषाढ कार्तिकमें पंढरीकी यात्रा विठ्ठल अकेला सुखरूप ॥
ऐसी स्थितिमें पुनः पुनः विठ्ठलपंतके मनमें संन्यास लेनेकी बात आने लगी। वह अपनी पत्नीसे वही वही बात कहने लगा। रुक्मिणीने यह बात अपने पितासे कही। सिद्धेश्वरपंतने पुत्रीसे "बिना संतानके संन्यास न लेनेकी बात कहलवाई" कुछ दिन ऐसे ही बीते। विठ्ठलपंत पुनः अपनी पुरानी बात दुहराने लगे। वे बार बार कहते "मुझे संन्यास लेनेकी इच्छा हुई है। तू अपनी आज्ञा दे!" बार बार यही यही बात सुनकर रुक्मिणीने कभी असावधानीसे कह दिया "जाइये" बस यही अपनी पत्नीकी आज्ञा मान कर विठ्ठलपंत चल दिये। वे सीधा काशी गये। यहां पत्नी विठ्ठलपंतकी राह देखते देखते थक गयी। उसने सारी बात सिद्धेश्वरपंतसे कही। पिता आकर लडकीको अपने घर ले गये। वहां जाते ही रुक्मिणीदेवीने अश्वत्थ प्रदक्षिणादि अपने व्रतनियम प्रारंभ कर दिये।
३ संन्यास और संसार- काशी जाकर विठ्ठलपंतने किसी श्रीपादस्वामीसे संन्यास लेलिया और चैतन्याश्रमके नामसे वहीं गुरुके साथ रहने लगे। ऐसे ही कुछ काल बीता। चैतन्याश्रम शास्त्राध्ययन और ब्रह्म-चिंतनमें लीन रहने लगा। इस बीचमें श्रीपाद स्वामीने रामेश्वर - यात्राकी सोची। आश्रमका सारा दायित्व चैतन्याश्रम पर सौंप करके श्रीपादस्वामी रामेश्वर-यात्राके लिये रवाना हो गये। रामेश्वर यात्रामें प्रवास करते करते श्रीपादस्वामी आलंदी आये। आलंदीमें उसी प्राचीन- तम सिद्धेश्वर मंदिरमें उतरे। वहांका वही अश्वत्थ। रुक्मिणीदेवी नियमसे उस अश्वत्थकी परि- क्रमा करती थी। परिक्रमा करके अश्वत्थको प्रणाम करते समय सहज ही उन्होंने श्रीपादस्वामीको भी प्रणाम किया और, "पुत्रवती भव" स्वामीजीने आशीर्वाद दिया। स्वामीजीका आशीर्वाद सुन कर उस दुःखमें भी रुक्मिणीदेवीको हंसी आयी। स्वामीजीने कारण पूछा और देवीजीने सारी बात स्वामीजीसे कह डाली। देवीजीकी बातें सुनकर स्वामीजीको लगा हो या न हो, संभवतः चैतन्याश्रम ही इस दुखियाका पति है। सिद्धेश्वर पंतसे भी स्वामीजीकी बातें हुईं। स्वामीजीने कहा "आप अपनी पुत्रीको लेकर मेरे साथ काशी चलें। मैं विठ्ठलपंतसे आपकी भेंट करा देता हूँ। इतना ही नहीं पत्नीका स्वीकार करनेको कहूंगा!" श्रीपादस्वामी, सिद्धेश्वरपंत और रुक्मिणीदेवीको साथ लेकर काशी गये। पिता-पुत्रीकी अलग रहनेकी व्यवस्था करके स्वामीजी आप आश्रम गये। आश्रममें जाते ही स्वामीजीने चैतन्या-
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