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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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श्रमको बुलाकर पूछा "तुम्हारे घरमें कौन कौन हैं ?" प्रश्न सुनकर चैतन्याश्रम सहमसे गये । उन्होंने सोचा, गुरु श्रीपाद स्वामीका रामेश्वरकेलिये जाकर बीच यात्रासे लौटने और आते ही चैतन्या- श्रमको बुलाकर ऐसा प्रश्न पूछनेमें हो न हो कुछ रहस्य अवश्य है ! चैतन्याश्रमने भी सारी सच्ची घटना गुरु श्रीपादस्वामीसे निवेदन करके "पत्नीकी आज्ञा लेकर आया था।" कहते हुए श्री चरणोंमें प्रणाम किया । श्रीपाद स्वामीने शिष्यको उठाया, और अपने पिताके साथ काशी आयी हुई रुक्मिणी- देवीकी भेंट कराके कहा "इसका स्वीकार करो । निषिद्ध कर्म मानकर मनमें इसका भय न करो । पर- मेश्वर तुम्हारे साथ है। अपने गांवमें जाओ और सुखरूप स्वधर्म मानकर गृहस्था श्रमका पालन करो !" अपने गुरु पर संशयातीत श्रद्धा ही चैतन्याश्रमका पाथेय था । गुरु-आज्ञा ही उनके लिये शास्त्र था । दूसरा मार्ग वह नहीं जानते थे। इसलिये गुरु आज्ञाको उन्होंने शिर आंखों पर चढ़ालिया । गेरूवे वस्त्र उतारे । गृहस्थाश्रमका चोगा पहना । पत्नीके साथ अपने गांवमें आये । संन्यास छोड़कर गृहस्थाश्रम स्वीकार करना लोक-रूढ़ी तथा धार्मिक परंपराके विरुद्ध था । लोक-निंदा स्वाभाविक थी । यह एक महा-पाप था । धर्म-भीरु ब्राह्मण-समाजने उनको बहिष्कृत किया । विठ्ठलपंतने गांवके बाहर एक झोपड़ी बांधी । एकांतमें ब्रह्म-चिंतनमें जीवन बिताने लगे । ऐसे बारह वर्ष बीते । यह काल उनके लिये अत्यंत क्लेश-कारक था । यह बारह वर्षकी तपस्या आगे आनेवाले महापुरुषोंके निर्माणकी तपस्या थी । स्वर्गको भी तुच्छ माननेवाले योग-भ्रष्ट आत्मा सहज सेंत-मेंतमें अवतरित नहीं होते । बारह वर्षकी ऐसी तपस्या पूरी होनेके बाद शा. श. ११९५ में श्रीमुखसंवत्सर माघबद्य प्रतिपदा सोमवारके दिवस सूर्योदयके समय श्रीनिवृत्तिनाथका जन्म हुवा । इसके दो वर्ष बाद शा. श. ११९७ युवा संवत्सर श्रावण वद्य अष्टमी-कृष्णाष्टमी गुरुवारकी मध्यरात्रीके समय श्रीज्ञानदेवका जन्म हुवा । शा. श. ११९९ ईश्वरसंवत्सर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा रविवार प्रहर रातमें श्रीसोपानदेवका जन्म हुवा और शा. श. १२०१ प्रमाथी संवत्सर आश्विन शुक्ल १ शुक्रवार मध्यान्हमें श्रीमुक्ताईका जन्म हुवा । उपरोक्त जन्मतिथियां स्पष्ट होने पर भी निर्विवाद नहीं है । सामान्य नियमानुसार इस बातमें भी विद्वानोंमें मतभेद है । कुछ विद्वानोंने श्रीनिवृत्तिनाथ शा. श. ११९०, श्रीज्ञानदेव शा. श. ११९३ श्रीसोपानदेव शा. श. ११९६, श्रीमुक्ताई शा. श. ११९९ ऐसा जन्मकाल दिया है । दोनों ओरके विद्वानोंने अपने मत-प्रतिपादनमें पर्याप्त आधार दिये हैं और अंतमें यह भी कह दिया है कि इन दो कालके विषयमें एकवाक्यता करनेका प्रयत्न करना व्यर्थ है । शायद इन दो मेंसे कोई एक सच होगा या दोनों गलत होंगे ! अस्तु, प्रत्येक भाषाके साहित्यमें, प्रत्येक महत्वके प्रश्न पर, विद्वानोंके ऐसे निर्णय होते ही हैं, नहीं तो भला वह विद्वत्ता किस बातकी ? विद्वान भले ही किसी निर्णय पर पहुंचे । विठ्ठलपंतके ये चार संतान हुए थे इस बातमें तो किसीको कोई संदेह नहीं ! इन चारोंको ही महाराष्ट्रने आदर्श- पुरुष मानकर अक्षरशः सिर पर लिया । उनके महानिर्वाणके सात सौ वर्ष बाद भी आज उनकी समा- धियोंपर मेले लगते हैं, और लाखों लोग वहां जाते हैं । किंतु उन्ही बालकोंका बचपन अत्यंत करुणा- जनक स्थितिमें बीता । इनके जन्मके बाद माता-पिताको अनन्वित हाल सहने पड़े । किसीभी महान व्यक्तिको अपनी परंपराको तोड़कर नयी परंपरा निर्माण करते समय जो दुःख कष्ट उठाने पडते हैं, जो अपमान सहने पडते हैं, वे सब विठ्ठलपंतको सहने पडे ही। साथ ही साथ, इन अबोध बाल- कोंके भावी जीवनके विषयमें सोचकर उन्हे जो वेदनाएं हुई होंगी, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती; क्यों कि जैसे संन्यास छोड़कर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करने वालेका मुखावलोकन अथवा दर्शन पाप हे असगुन है, वही बात संन्यासीके लडकोंकी थी ! उनके नसीबमें भी माता पिताके ज्ञानेश्वरी ८