ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंचितकर्मके रूपमें वे सब दुःख, क्लेश, अपमान, बहिष्कार आदि स्वाभाविक था। ऐसे वातावरणमें वे बालक बड रहे थे। संभव है कि उन बालकोंको बाहर जितना डांट फटकार पडा, उससे अधिक घरमें प्रेमवात्सल्य तथा सहानुभूति मिली हो ! घरमें भारतीय वाङ्मयका गहरे प्रभाव भी पडे हों। रामायण और महाभारतके कहानियोंसे उनके मन बुद्धि खिली हो ! साथ साथ तीर्थयात्राके प्रेमी विठ्ठलपंतके साथ कुछ यात्राएँ भी हुई हो। किंतु विठ्ठलपंतके मनमें सदैव इन बालकोंका विचार रहा होगा ! इनका जनेऊ कैसे हो ? समाजमें इनका क्या स्थान है ? समाजसे होनेवाले बहिष्कार तिरस्कारसे इन बालकोंको बचानेके लिये तथा समाजमें उनको उचित स्थान दिलानेके लिये माता- पिताका तडपना स्वाभाविक है। इस लिये उन्होंने अत्यंत बचपनसे अपने ही बालकोंका विद्याध्ययन भी किया होगा। ४ तपश्चर्या और ब्रह्मदीक्षा- ऐसी स्थितिमें विठ्ठलपंत अपनी पत्नी और पुत्रोंको साथ लेकर त्र्यंबकेश्वर गये। त्र्यंबकेश्वर महाराष्ट्रका एक पुण्य-क्षेत्र है। परमपावनी गोदावरीका उगमस्थान, वहां ब्रह्मगिरि- पर्वत है। पवित्र पर्वत ब्रह्मगिरि, देह- दंडनसे पापक्षालनकनके विचारसे विठ्ठलपंत रातके समय उस ब्रह्मगिरीकी परिक्रमा करने लगे। ऐसे ही समय एक दिन अकस्मात शेर आनेसे परिवार अस्त व्यस्त हो भागने लगा। शेरसे बचनेके लिये भागने वाले निवृत्ति, गुहामें समाधिस्थ गहिनीनाथकी गोदमें जा पडे। गहिनी नाथ और निवृत्ति, अनेक पीढियोंका संबध । विठ्ठलपंतके दादा त्र्यंबकपंतको स्वयं गोरखनाथने उपदेश दिया था। गहिनीनाथ गोरखनाथके पट्ट शिष्य। निवृत्तिनाथके दादा गोविंदपंत और दादी नीरादेवीको गहनीनाथने उपदेश दिया था। जिसका परदादा गुरुबंधु और दादा शिष्य, और पिता ? गहिनीनाथके अनुग्रहसेही उनके माता पिताकी वृद्धावस्थामें हुई संतान था ! शायद गहिनीनाथने अनुभव किया होगा कि नाथपरंपराका पुण्य - फलही मेरे सम्मुख आ खडा है। गहिनीनाथने उस बालकको पास लेकर सिरपर हाथ रखा। दीक्षाके रूपमें नाथसंप्रदायका सारसर्वस्व उसको दे डाला !! बाघके भयसे गुहामें गये हुए निवृत्तिनाथ संपूर्ण निर्भय होकर गुहासे बाहर आये। गुहामें वे कितने दिन रहे इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं है। निवृत्तिनाथ घर आये और उन्होंने अपने सभी भाइयोंको “अपने जैसे ही किया है तत्काल !” वाली कहावत सच कर बताई ! किंतु विठ्ठलपंतकी दृष्टिसे निवृत्तिनाथ उपनयनके लिये योग्य था। गांवके ब्राह्मण, विठ्ठलपंत और इन बालकोंका मुखा- वलोकन भी पाप समझते थे। ऐसी हालतमें बालकोंका जनेउ कैसे हो ? आखिर अपने बालकोंके अभ्युदय निःश्रेयसके लिये विठ्ठलपंत ब्राह्मणोंकी शरण गये। बिना इसके दूसरा चारा ही नहीं था। ब्रह्म सभा बैठी। शास्त्रोंकी पोथियां खुलीं। किंतु धर्म-ग्रंथोंमें ऐसा कोई आधार नहीं मिला अथवा ऐसा कोइ प्रायश्चित्त नहीं मिला जिससे “संन्याससे गृहस्थाश्रममें आये हुए व्यक्तिका अथवा संन्यासीके लडकोंका शुद्धिकरण हो !” इसके पहले यदि ऐसी कोई घटना हुई होती तो शास्त्रोंमें ऐसा उल्लेख होता। शास्त्रकारोंने सामाजिक अभ्युदयको ध्यानमें रखकर वर्णाश्रम व्यवस्था बनाई। मनुष्यकी संपूर्ण शक्ति- यांका समाजके हितमें पूर्ण उपयोग हो इसलिये वानप्रस्थ और संन्यासकी व्यवस्था की। यदि किसीमें तीव्र वैराग्य उदय हुआ है तो, वह कुछ पहले चतुर्थाश्रम ले सकता है किंतु तीव्र वैराग्यसे चतुर्थाश्र- ममें गया हुआ मनुष्य भला संन्याससे गृहस्थ क्यों बनेगा ? इसके पहले कभी ऐसी समस्या पैदा ही नहीं हुई होगी ! अंतमें शास्त्रमें जिस महापापका कोई प्रायश्चित ही नहीं उसके लिये देहांत प्रायश्चित ही है ! पाप हुवा निश्चित। नहीं होनी चाहिये थी और अब तक नहीं हुई थी, ऐसी बात हुई है। विठ्ठलपंतको पश्चाताप हुवा है। वह प्रायश्चित्त चाहता है। शास्त्र कोई प्रायश्चित्त नहीं कहते। ९ ज्ञानेश्वर