भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तब देहांत प्रायश्चित्त ही है ! ब्राह्मणोंने विठ्ठलपंतसे कहा "शास्त्रमें आप तथा आपके परिवारको शुद्ध करलेनेका कोई प्रायश्चित्त नहीं है। इसके लिये देहांत प्रायश्चित्त एक मात्र प्रायश्चित्त है। अब आप विचार करके जो योग्य है सो कीजिये !" विठ्ठलपंत जन्मतः विरक्त । संन्यास लिया था तब संसारकी ममता टूट चुकी थी। संन्यास छोड़ा तब संन्यस्तका अहंकार भी समाप्त हुआ। केवल कर्तव्य-रूप जीवन बिता रहे थे। यदि उनके देहत्यागसे संतानका भला होता है, उनको अभ्युदय और निःश्रेयसका अधिकार मिलता है, तब वे कहां पीछे हटनेवाले थे ? उन्होंने ब्रह्मसभाको वंदन कर कहा " त्रिवेणीमें शरीर त्याग करके मैं यह प्रायश्चित्त लूँगा" ! और "पीछे मुड़कर देखनेके पहले" चल पड़े । उनकी धर्म-पत्नी उनकी छायाकी भांति उनके पीछे थी ही। विठ्ठलपंत शरीर त्यागके लिये आलंदीसे प्रयागराज तक चलते गये ! भारतके महापुरुषोंने भारतकी भावात्मक एकताकी नींव ऐसे डाली है ! ! शास्त्रज्ञोंने विठ्ठलपंतको देहांत प्रायश्चित्त कहा। पिताके विषयमें शास्त्रोंका यह कठोर निर्णय सुनकर भी ज्ञानेश्वर महाराज लिखते हैं - शास्त्र कहता यदि कुछ तजना । राज्य-सुख-भोग तृण मानना । विष लेने कहता तो ना कहना । शब्द विरुद्ध ॥ १६-४६० ॥ यहां महापुरुषोंके हृदयकी गहराई दीखती है। उनकी महानताका दर्शन होता है। ज्ञानेश्वरी एक मौलिक चिंतन है किंतु मौलिकताके नशेमें कहीं भी निष्ठा हीनता नहीं दीखती। परंपरापर आघात नहीं। वैचा- रिक कटुता नहीं। सदैव सर्वत्र उदार, विचार सभी प्रकारकी निष्ठाका पालन । यह ज्ञानेश्वरीकी विशेषता है। ५ जीवन समर्पण हुवा किंतु समस्या वैसी ही रही - माता पिताने त्रिवेणीमें देहार्पण किया किंतु संन्यासीके पुत्रोंकी सामाजिक अथवा धार्मिक समस्या वैसे ही बनी रही। ब्रह्मसभाके सम्मुख विठ्ठलपंतका जो प्रश्न था "इन लडकोंका क्या होगा ?" यह प्रश्न ही रहा। केवल प्रश्न कर्ता बदला ! पहले विठ्ठलपंतने ब्राह्मणसभासे यह प्रश्न पूछा था अब निवृत्तिनाथने पूछा ब्राह्मणोंने कहा "आप पैठण जाइये। पैठणसे शुद्धी-पत्र लाइये। तब हम आपका स्वीकार करेंगे। हमारे पास आपके प्रश्नका उत्तर नहीं है।" इस पर निवृत्तिनाथ विरक्त हुए। "देहाश्रित वर्णाश्रम विहित कर्मबंधनके फंदेमें फसनेकी हमें कोई आवश्यकता नहीं " निवृत्तिनाथने कहा। सोपान देवको भी "ब्राह्मणोंद्वारा पावन होनेकी आवश्यकता " प्रतीत नहीं हुई। किंतु ज्ञानदेव, इससे सहमत नहीं थे। उनका कहना था "स्वरूप लीन स्थितिमें इसकी आवश्यकता नहीं यह स्वीकार। किंतु विधिबाह्य आचरण दूषण है यह वेदका मत। कुल धर्म पावन है, यह शास्त्रवचन । संतोंको इसका पालन करना ही चहिये। यदि वही समा- जके पथप्रदर्शक, शास्त्रविरुद्ध चले तो लोगोंके सम्मुख कौनसा आदर्श होगा ? इसलिये इसका विचार आवश्यक है।" सबने ज्ञानदेवकी बात स्वीकार की। ये दस बारह वर्षके बालक पैठणके विद्वान ब्राह्मणोंसे न्याय मांगने निकले । बारह वर्षके निवृत्तिनाथ, दस वर्षके ज्ञानदेव, आठ वर्षके सोपान और छ वर्षकी मुक्ताई !! आलंदीसे पैठण। पैठणके विद्वान ब्राह्मण-सभाके सम्मुख निवृत्तिनाथने आलंदीके विद्वानोंका पत्र रखा। अपनी सारी बात कही । "संन्यासीका संतान" इस शब्दसे ही "माता पिता तथा उनके संतान दोनों कुल-भ्रष्ट है। उनको किसी प्रकारका कोई प्रायश्चित्त नहीं है ! !" ब्राह्मण सभाने यह निर्णय दिया । ज्ञानेश्वरी १०