ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“ किंतु हमारी गति क्या ?” निवृत्तिनाथका प्रश्न स्पष्ट था । इसका कोई उत्तर नहीं दे सकते । किंतु उत्तर न देना भी अल्पताका द्योतक है ? विद्वान इस अल्पताको कैसे स्वीकार करेंगे ? यदि किसी प्रश्नपर निरुत्तर रहे तो विद्वत्ता किस बातकी ? निरुपाय होकर विद्वानोंने कहा “शास्त्र सम्मत ऐसा एक ही उपाय है, परमात्माकी अनन्य भक्ति करना ! प्राणिमात्रसे नम्र होकर व्याकुल भावसे भजन करना । ब्राह्मण और चांडालमें भेद न करते हुए सबको प्रणाम करना ! ” सुनकर सबको संतोष हुआ । सबने प्रसन्न मनसे कहा ‘ हमको यह स्वीकार है !! ” ६ प्रवृत्ति चक्रप्रवर्तन- किंतु बात यहीं नहीं रुकी । ब्राह्मणसभाके बाद, वहीं कुछ लोगोंने, निवृत्ति ज्ञानदेवादि के नाम पर कुछ निंदा नालस्ती की । ज्ञानदेवकी सहज कही हुई बातको लेकर निवृत्ति ज्ञानदेवको चुनौति दी गयी और वहां ज्ञानदेवकी योग-सिद्धियोंके अनेक चमत्कार दिखाये । इससे पैठणके विद्वान लोग आश्चर्य चकित हो गये । इन छोटे छोटे बालकोंके नेत्र दीपक योगसामर्थ्यसे ब्राह्मणसभा हतबुद्ध हो गयी । हम यहां किस लिए एकत्र हुए थे यह भी सब भूल गये । ब्राह्मण सभाके सम्मुख जो प्रश्न था वैसे ही रहा और अनजानमें सभा विसर्जन भी हो गयी । इस घटनाके बाद, निवृत्ति ज्ञानदेवादि कुछ काल पैठणमें रहे । पैठणमें वे कुछ काल अध्यात्म- ग्रंथोंका अवलोकन करते, दोपहरको प्रवचन होता और रातको भजन, कीर्तन । इसके बाद, उस कालका महान विद्वान, पंडित बोपदेवने शुद्धिपत्र लिखा । “ये स्वर्गीय देव- त्रयका अवतार रूप हैं । इनको कौन और क्या शुद्धिपत्र दें ?” इससे निवृत्ति-ज्ञानदेवकी कीर्तिसुगंध चारों ओर फैल गयी । इन बालकोंने पैठण छोडा । चारों ओरसे इन्हें बुलावा आने लगा । पहले संन्यासीकी संतान कह कर अवमान होता था अब इसी बात पर सम्मान होने लगा । लोक-मानस सदैव झूलेकी भांति रहा है । वे चारों भाई बहन पैठनसे चले । जैसे पैठनमें ब्राह्मण-सभाने जो कुल-धर्म कहा था “सबको समान मान कर परमेश्वरकी अनन्य भक्ति ” यही एक व्यवसाय था । बिना इसके दूसरा कोई कार्य नहीं था । परमात्म भक्तिका कार्य करते करते इनका संचार प्रारंभ हुआ । ऐसा प्रवास करते करते वे प्रवरानदीके किनारे पर बसे नेवासा गांवमें आये । वहां ज्ञानदेवके गीताप्रवचनोंको लिख लेनेवाला सच्चिदानंद बाबा मिला । वहां शिवालयमें ज्ञानदेव प्रवचन करते और सच्चिदानंद बाबा उनको लिख लेते ! ऐसे शा. श. १२१२ में ज्ञानेश्वरी ग्रंथ तैयार हुआ । ज्ञानदेवकी वाणी सच्चिदानंद बाबाने लिपि-बद्ध की; ग्रंथ तैयार हुआ । संभवतः सच्चिदानंद बाबाने कृतार्थताका अनुभव करके समय देखकर—जब श्रीगुरु निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेवादि साथ बैठे थे तब-लिपि बद्ध वह ग्रंथ श्रीगुरुके सम्मुख रख कर प्रणाम करते हुए कहा “यह भावार्थ-दीपिका तैयार हो गयी है ।” इस पर श्रीगुरु निवृत्तिनाथने इस ग्रंथकी ओर आंख उठाकर देखनेके पहले ही कहा “मुकुंदराजका परमार्थसार विशुद्ध ग्रंथ है । उसमें अपने अनुभवके अलावा और कोई आधार नहीं है !” सच्चिदानंद बाबाने ग्रंथ उठालिया । ज्ञानदेवने इस बातको “केवल अपने अनुभवके आधार पर ग्रंथ लिखनेकी आज्ञा ” समझा और “अनुभवामृत” लिखा । अनुभवामृत ज्ञानेश्वर महाराजका अपना मौलिक ग्रंथ है । उसको किसीका आधार नहीं है । किंतु जन्म भर पढने पर भी उस छोटेसे ग्रंथका अभ्यास नहीं हो पाता । जितनी बार पढते हैं उतनी बार एक न एक नया अर्थ झलकता है । यह ग्रंथ चिंतनशील साधकको नित्य नया आनंद ११ ज्ञानेश्वर