ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 32, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर नया मार्गदर्शन देता है । इस ग्रंथ पर महाराष्ट्रके ४३ विद्वान, साधु संतोने, भाष्य लिखा है, फिर भी इसका अभ्यास करना रहा ही है !! कुछ विद्वान लोगोंका कहना है "नाथसंप्रदायका सारा तत्वज्ञान और अंतिम अनुभव इस ग्रंथमें देखनेको मिलता है।" कुछ विद्वान कहते हैं "इसमें आधुनिक विज्ञानके बीज देखनेको मिलते हैं।" इसके बाद जैसे कमलकी सुगंधसे भ्रमर खींचे जाते हैं वैसे महाराष्ट्रके संतजन ज्ञानदेवकी ओर खींचे जाने लगे । नामदेव परिवार, गोरा कुंभार, नरहरी सोनार, विसोबा खेचर, सावता माली, सेना नाई, बंका महार, जनाबाई, भागू महारीण, ब्राह्मणसे चांडालतक सारे स्त्रीपुरुष संत-जन निवृत्ति-ज्ञानदेवके चारों ओर सूर्य-किरणकी भांति एकत्र हुए ! और ज्ञानदेवकी कीर्ति सुगंध तापी तीरपर योग-साधनामें लीन चांगदेव तक पहुंच गयी ! वे अपनी योग-शक्तिके बल बूते पर प्रचंड शक्तियोंके स्वामी बने हुए थे । उन्होंने ज्ञानदेवके दिखाये हुए योग-चमत्कार सुने ! जो भैंसेके मुखसे वेद कहलाये ! ऐसे ये नये योगी कौन ? उन्होने ज्ञानदेवको पत्र लिखा । ज्ञानदेवने पत्रका उत्तर लिखा । ६५ छंद, ओबियां । उसको 'चांगदेव' पासष्टी कहते हैं । यह पढ़ कर चांगदेव चमत्कृत हो गये । इसकी भावानुभूति उनकी शक्तिके परेकी बात थी । उनकी जिज्ञासा बढ़ी । वे अपनी योगशक्तिका संपूर्ण परिचय देते हुए ज्ञानदेवसे मिलने आये । ज्ञानदेवने वैसे ही उनका स्वागत किया । चांगदेव दिखाना चाहते थे बुद्धिके बल बूते पर मैंने समग्र जीवसृष्टि पर स्वामित्व पाया है और श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी प्रेरणासे ज्ञानदेवने दिखाया भावुकके लिये निर्जीव ऐसा कुछ भी नहीं । मनुष्य अपनी भावशक्तिसे निर्जीवको भी सजीव बना सकता है । जीवसृष्टि पर स्वामित्व पाये हुए चांगदेव, निर्जीव सजीव यह भेद मिटाये हुए ज्ञानदेवकी शरण आये ! ज्ञानदेवने मुक्ताईके द्वारा चांगदेवको आत्मानुभव कराया । ७ तीर्थयात्रा और महा-यात्रा- नामदेव पंढरपुरका पगला । उसका सारा विश्व पंढरपुरमें । विठ्ठल उसका सर्वस्व । जो कोई मिला पंढरपुर ले चलो । वे निवृत्ति ज्ञानदेवको भी पंढरपुर लाये । पंढरपुरका अर्थ भजन कीर्तन ! वहां दिन रात भजन कीर्तन चलता रहता है । और ज्ञानदेव "हरिनाममें नित्यतृप्त !" पंढरपुरमें कुछ काल रहनेके बाद तीर्थयात्राकी बात सूझी । उनको तो समाजको मार्ग-दर्शन करना था अथवा अपने आनंदसे विश्व भरना था ! ज्ञानदेवने नामदेवको साथ बुलाया । नामदेव कहता है "मेरा प्राण पंढरपुरकी देहरीसे अटका है !" विश्वके अणुअणुमें आत्मदर्शन करने वाले ज्ञानदेव और विठ्ठलके अलावा सब कुछ सूना कहनेवाले नामदेव ! नामदेवको विठ्ठल वियोग असह्य ! अंतमें इसी विठ्ठलकी आज्ञासे नामदेव ज्ञानदेवके साथ यात्रामें गये । यह यात्रा छ साल तक चली । ज्ञानदेव नामदेवादिकी यह यात्रा बहता हुवा अमृत प्रवाह है । पंढरपुर, नाशिक, सह्याद्रीका सातपुडा पार करके, गुजरातका सोमनाथ, द्वारका, प्रभास, उज्जैन, प्रयाग, काशी, अयोध्या, गया, मथुरा, वृंदावन करके छ सालके बाद पुनः पंढरपुर आये । यहां ज्ञानदेवका जीवन कार्य समाप्त हुआ । पानेका सब कुछ कबके पा चुके थे, अब करनेका सब कुछ कर चुके । तब भला शरीर धारणाकी क्या आवश्यकता ? उन्होने श्रीगुरु निवृत्तिनाथ तथा पंढरीनाथसे चिर-समाधीकी आज्ञा मांगी । ज्ञानदेवने इंद्रायणीके किनारे आलंदीमें, माता जिस अश्वत्थकी परिक्रमा करती थी उस स्वर्ण अश्वत्थकी छायामें, पिताके श्रीगुरुने जहां बैठकर माताको "पुत्रवती भव" का आशीर्वाद दिया था वहां, उस अजानवल्लीके पास गुहामें समाधि-स्थान निश्चित किया । श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी आज्ञा लेकर कार्तिक वद्य त्रयोदशीका दिवस समाधि दिवस निश्चित किया गया । कार्तिक शुद्ध देवोत्थान एकादशीको पंढरपुर आयेहुए सारे संतजन एकादशीके उत्सव समाप्त करके ज्ञानेश्वरी १२