ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंताल तंबोरा मृदंगके साथ, धर्म-पताका कंधोंपर लिये हुए, पंढरपुरसे आलंदी आये। आलंदीका इंद्रायणी नदी किनारा 'राम कृष्ण हरि" से गूंजने लगा। "श्रीहरि विठ्ठल जय हरि विठ्ठल" के जय घोष आकाशसे भिड़ने लगे। सारे संत सज्जन इंद्रायणीके किनारे अश्रुभरी आंखोंसे "उस काल" की प्रतीक्षा करने लगे। क्षण क्षण युगसा लगता था। अंतमें समय आया। ज्ञानदेव उठे। शांत, धीर, गंभीर, नयना- भिराम, स्फुरद्रूपी युवक, धीरे धीरे कदम बढाकर अपने अग्रज, श्रीगुरु, जिनकी कृपासे शब्दोंसे कही नहीं जा सकनेवाली बात शब्दचित्रोंसे सुननेवालोंकी आंखोंके सम्मुख प्रत्यक्ष ला रखी, ऐसी गुरु-माउली श्रीनिवृत्तिनाथके चरणोंमें झुककर चरणपर मस्तक रखा चरण वंदना की। अंतिम चरण-वंदना ! अखंड चरण वंदना ! सागरकी भांति, सदैव अपनी सहज साम्यावस्थामें स्थिर गंभीर मर्यादामें रहनेवाले श्रीगुरु निवृत्तिनाथने भी, इस समय चंद्र देखकर उछलनेवाले सागरकी भांति, गुरु शिष्यकी सारी सीमाओंको तोडकर, ज्ञानदेवको, अपने छोटे भाईको, अपने एकमात्र शिष्यको, उठाकर गले लगाया। बाल संवारे, मोक्ष सिंहासनकी महायात्रामें निकले हुए इस यात्रीके अंग अंग स्पर्श करके गुरु-स्पर्श कवचसे अजय किया ! अमर किया ! सोपान और मुक्ताईने अपने अग्रज और श्रीगुरुके चरणस्पर्श किये। "तुम्हे भी यह सुख मिलेगा एक दिन।" ज्ञानदेवने उन्हे आशीर्वाद दिया। आश्वासन दिया। श्रीगुरु निवृत्तिनाथ अपने एक मात्र प्रिय शिष्य, अपने ब्रह्मानुभवका सर्वस्व-धरोहर, ज्ञानदेवको समाधिके सुखासन तक ले गये। वह सुखासन प्रातःकालसे नामदेवके पुत्रोंने लीप पोत कर शुद्ध किया था। महाराष्ट्रके संतोंने उस पर कोमल तृणांकुर बिछाकर सजाया था। प्रत्येक संतने अपना अपना तुलसी पत्र रखा था। महाराष्ट्रके सभी संतोंके सद्भाव, श्रद्धा, आशीर्वादसे, शाश्वत सुखके लिये सजाया गया वह "संजीविनी समाधि" का अखंड दीर्घ समाधीका सुखासन, उस पर श्रीगुरु निवृत्ति नाथने अपने शिष्यको बिठाया। ज्ञानदेव उस समधिके सुखासन पर बैठे। श्रीगुरुनिवृत्तिनाथकी चरण-वंदना कर ज्ञानदेवने एक सौ एक छंदोंका संत वंदन किया। सारा संत समाज सांस रोक कर अपने आराध्यदेवका अंतिम वंदन स्वीकार कर रहा था आंखें अश्रु सुमनांजली अर्पण कर रही थीं। वंदन समाप्त हुवा। ज्ञानदेवकी धीर गंभीर वाणी गूंज उठी। अजी ! ध्यानसे चित दीजिए ! सबसुखका पात्र बनिए ! प्रतिज्ञोत्तर यह सुनिये ! प्रकट बात ॥ ज्ञानेश्वरीका नौवा अध्याय। राज-विद्या, राजगुह्य- ईश्वर-समर्पणयोग, जीवन साधनका सार सर्वस्व। ज्ञानदेव वह गाने लगे। सारे संत समाजको दिया गया उस योगेश्वरका यह अंतिम संदेश। संत जन अपने कोटि कोटि रोमकूपोंके कान बनकर वह सुनने लगे। आंखें अश्रु सुमनोंकी माला गुंथने लगीं, प्राण अकुलाकर तडपने लगे। मन, बुद्धि, भाव, चित्त, अंतःकरण, सारा वातनामय सा अनुभव होने लगा। अजी देना अवधान। चढना आनंद सिंहासन । झाली दैवाने माला श्रवण- । इंद्रियको आज ॥ नौवा अध्याय पूर्ण हुवा। श्रीगुरुनिवृत्ति नाथने, जिनकी कृपासे ज्ञानदेवका शरीर भी इतना दिव्य हो गया था कि "जिसे मृत्यु भी छूनेफा साहस नहीं कर सकती थी" समाधिद्वार पर पत्थर रख कर उसे सर्वदाके लिये बंद कर दिया। और अब तक रुकी हुई संतवाणी कल्पांतके पानीकी भांति आकाशको चीर कर ब्रह्ममें लीन हो गयी। पुंडलीक वरद पांडुरंग हरि विठ्ठल !!! १३ ज्ञानेश्वर