ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे देशी और संस्कृतवाणी । सोहती सार्थ चिर-संगिनी । भावार्थ-सिंहासन भूषिणी । शुद्ध भावसे ॥ ४५ ॥ खिलाया जहां भावोंका रूप । आया है रस-वृत्तिमें ओप । प्रतिष्ठा मिली हमें अमाप । कहता चातुर्य ॥ ४६ ॥ वैसे देशीका लावण्य । जिससे लेके तारुण्य । रचा है फिर अगण्य । गीता-तत्व ॥ ४७ ॥ ऐसा चराचर गुरुवर । जो चतुर चित्त चमत्कार । वह सुनोजी यादवेश्वर । बोलने लगे ॥ ४८ ॥ कहे ज्ञानदेव निवृत्तिदास । सुनो श्री हरि बोले जो सरस । अर्जुन तू है अन्यंग सर्वस । अंतः करणका ॥ ४९ ॥ भगवान उवाच भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः । यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥ मैं तेरी आंखों से दीखता हूं उतना ही नहीं— हमने जो निरूपण किया । तेरा अवधान भी देख लिया ! वह भी हमने संपूर्ण पाया । धनुर्धर ॥ ५० ॥ देखना घटमें भर अल्प नीर । वह नहीं चुआ तो अधिक भर । देखी तेरी चाह कुछ कह कर । अब कहता हूं सुन ॥ ५१ ॥ कोई आया जो अनायास । उस पर छोड़ा सर्वस । हुआ मेरा निज-निवास । तू इस समय ॥ ५२ ॥ पार्थकी योग्यता देख सर्वेश्वर । ऐसे बोलने लगा सादर । आती मेघमाला जैसे घर कर । देख हिमालय ॥ ५३ ॥ फिरसे सुन तू मेरी बात उत्तम अर्जुन । प्रेमसे कहता तेरी करके हित-कामना ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी : ३०२