ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
वैसे देशी और संस्कृतवाणी । सोहती सार्थ चिर-संगिनी । भावार्थ-सिंहासन भूषिणी । शुद्ध भावसे ॥ ४५ ॥ खिलाया जहां भावोंका रूप । आया है रस-वृत्तिमें ओप । प्रतिष्ठा मिली हमें अमाप । कहता चातुर्य ॥ ४६ ॥ वैसे देशीका लावण्य । जिससे लेके तारुण्य । रचा है फिर अगण्य । गीता-तत्व ॥ ४७ ॥ ऐसा चराचर गुरुवर । जो चतुर चित्त चमत्कार । वह सुनोजी यादवेश्वर । बोलने लगे ॥ ४८ ॥ कहे ज्ञानदेव निवृत्तिदास । सुनो श्री हरि बोले जो सरस । अर्जुन तू है अन्यंग सर्वस । अंतः करणका ॥ ४९ ॥ भगवान उवाच भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः । यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥ मैं तेरी आंखों से दीखता हूं उतना ही नहीं— हमने जो निरूपण किया । तेरा अवधान भी देख लिया ! वह भी हमने संपूर्ण पाया । धनुर्धर ॥ ५० ॥ देखना घटमें भर अल्प नीर । वह नहीं चुआ तो अधिक भर । देखी तेरी चाह कुछ कह कर । अब कहता हूं सुन ॥ ५१ ॥ कोई आया जो अनायास । उस पर छोड़ा सर्वस । हुआ मेरा निज-निवास । तू इस समय ॥ ५२ ॥ पार्थकी योग्यता देख सर्वेश्वर । ऐसे बोलने लगा सादर । आती मेघमाला जैसे घर कर । देख हिमालय ॥ ५३ ॥ फिरसे सुन तू मेरी बात उत्तम अर्जुन । प्रेमसे कहता तेरी करके हित-कामना ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी : ३०२
बोले कृपालुओंके राज । सुन धनुर्धर तू आज । कहा था तुझको जो गूज । कहूंगा पुनरपि ॥ ५४ ॥ अजी ! प्रतिवर्ष जैसे खेत पेरना । हरे भरे खेतको फिर काट-लेना । खेतमें श्रमने कभी न डकताना । पाने अधिक उपज ॥ ५५ ॥ पुनः पुनः पुट देनेसे । सुवर्ण चमकता जैसे । वैसा सुवर्ण खोजनेसे । मिलता नहीं ॥ ५६ ॥ यहां भी ऐसा ही है पार्थ । तेरे हित नहीं सर्वथा । सुनो अपने ही स्वार्थार्थ । बोलता मैं ॥ ५७ ॥ करनेसे शिशुका अलंकार । होगा क्या उसपर उपकार । देखके होंगे आनंद विभोर । स्वयं माता पिता ॥ ५८ ॥ जैसे तू अपना हित पूर्ण । जानेगा हम होंगे प्रसन्न । यह है वास्तविकता जान । हमारे कहनेकी ॥ ५९ ॥ जाने दो सुमन सुभाषित । तुझसे है ममत्व बहुत । औ' तुझे भाती है यह बात । तभी कहता हूं ॥ ६० ॥ अर्जुन हम इसी कारण । करते हैं तुझसे भाषण । सुन यह स-अंतःकरण । चित्त देकर ॥ ६१ ॥ सुन सुन तू यह मर्म । मेरा वाक्य यह परम । आया स्वयं अक्षर-ब्रह्म । तुझसे मिलने ॥ ६२ ॥ पार्थ तू मुझको न जानता । न जानो तो मैं यह कहता । अजी ! मैं जो यहां हूं बोलता । मानो ब्रह्मांड ही है ॥ ६३ ॥ न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥ यहां वेद हुए मौन । लंगडा हुआ पवन । बिन रातके विलीन । होते रवि-शशि ॥ ६४ ॥ न देव जानते मेरा प्रभाव न महर्षि भी । सभी प्रकारसे मैं हूं उनका मूल कारण ॥ २ ॥ ३०३ विभूति-चिंतनयोग
सब कोयी मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं इसलिये मुझे कोयी नहीं जानता— अजी ! गर्भ जो है उदरका । नहीं जानता पय माताका । वैसे ही ज्ञान-जात देवोंका । मेरे विषयमें ॥ ६५ ॥ जलचरोंको सागरका भान । गुरगुरेको जैसा है गगन । वैसा ही महर्षियोंका ज्ञान । मेरे विषयमें ॥ ६६ ॥ मैं हूँ कौन तथा हूँ कितना । कब किससे हुआ उत्पन्न । इसपे न कहा है वचन । युग-युगोंसे ॥ ६७ ॥ महर्षी तथा वे देव । ये भूतजात हैं सर्व । मैं अनादि हूँ पांडव । जान तू यह स्पष्ट ॥ ६८ ॥ उतरा हुआ नीर चढ़ेगा पर्वत । वृक्ष बढता जायेगा जड पर्यंत । जानेगा तब मुझसे बना जगत । मुझे पूर्ण ॥ ६९ ॥ या वटांकुरमें वृक्ष समायेगा । अथवा उर्मिमें सागर डूबेगा । या परमाणुमें ही समा जायेगा । ब्रह्मांड गोल ॥ ७० ॥ तो भी मुझसे बने थे जीव । महर्षी अथवा जो हैं देव । मुझे जाननेमें हैं पांडव । लेंगे समय बहुत ॥ ७१ ॥ मुझे जाननेके लिये इंद्रियोंको अंतरमुख करो— मुझे जानना है यद्यपि कठिन । कोई रखे इंद्रिय बहिर्गमन । कर उसको अंतर्मुख विलीन । अपनेमें ही ॥ ७२ ॥ बढ़ता है वह मेरी ओर । चढ़ भूतोंके सिरपर । छोड़के असत्य संसार । धनंजय ॥ ७३ ॥ यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ जाने जो मैं अजन्मा हूं स्वयम्भू विश्व-चालक । निर्मोही हो मनुष्योंमें छूटता सब पापसे ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०४
भली भांति यहां रह कर । स्व-प्रकाशमें ही जानकर । देखता अजत्व जो प्रखर । मेरे नयनों से ॥ ७४ ॥ मैं हूं अनादिसे पर । सर्व लोक महेश्वर । मुझको ऐसा जो नर । जानता है ॥ ७५ ॥ पाषाणमें वह पारस । रसमें है जो सिद्धरस । मनुष्याकृतिमें जो अंश । मेरा ही जान ॥ ७६ ॥ जंगम बिंब है वह ज्ञानका । अवयव सुखके अंकुरका । प्रकाश है वह मानवताका । लोकदृष्टिका है भ्रम ॥ ७७ ॥ कर्पूरमें हिरा मिला । उस पर पानी डाला । कर्पूर सब पिघला । प्रकटा हीरा ॥ ७८ ॥ रूपमें है वह मानुष । देखनेमें अन्य सदृश । न स्पर्शते प्रकृति-दोष । उसको कभी ॥ ७९ ॥ उसको छोड़ जाते हैं सब पाप । जैसे जलता चंदन वृक्ष साप । वैसे ब्रह्म-ज्ञानीको कोई संकल्प । कभी छूता नहीं ॥ ८० ॥ होना यदि मेरा ज्ञान । ऐसा चाहता है मन । मैं कैसा हूँ यह जान । तथा मज्जन्य वस्तु ॥ ८१ ॥ सभी है मेरे ही विकार । भूतमात्रके रूप धर । फैले हैं त्रिलोकमें भर । धनंजय ॥ ८२ ॥ बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥ अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥ बुद्धि ज्ञान क्षमा शांति सत्य निर्मोह निग्रह । जन्म-मृत्यु सुख-दुःख लाभालाभ भयामय ॥ ४ ॥ अहिंसा समता तुष्टि तप दान यशायश । हुये ये मुझसे भाव भूतोंमें भिन्न भिन्न जो ॥ ५ ॥ (३१) ३०५ विभूति-चिंतनयोग
प्रथम है जान तू बुद्धि । फिर ज्ञान जो निरवधि । असंमोह सहन सिद्धि । क्षमा सत्य ॥ ८३ ॥ तब इंद्रिय मन दमन । सुख दुखमें समवर्तन । भाव अभाव मान अर्जुन । मेरे ही विकार ॥ ८४ ॥ भय तथा अभयता । अहिंसा तथा समता । मेरा रूप पांडुसुत । जान तू यह ॥ ८५ ॥ दान यश अपकीर्ति । इन भावोंकी वसती । मेरी ओरसे है होती । सब भूतोंमें ॥ ८६ ॥ जैसे भूत जात भिन्न भिन्न । वैसे मेरे गुण भी है जान । होते मेरे ज्ञानसे उत्पन्न । कुछ अज्ञानसे भी ॥ ८७ ॥ जैसे प्रकाश औ' अंधार । लेकर सूर्यका ही आधार । फैलता अस्तमें है अंधार । उदयमें वैसे प्रकाश ॥ ८८ ॥ मेरा ज्ञान और अज्ञान । है जो दैवके ही कारण । तभी भूतोंमें भाव जान । कम और अधिक ॥ ८९ ॥ तभी जीव सृष्टि संपूर्ण । मेरे ही विकारमें तू जान । उलझी हुई यहां अर्जुन । जान तू यह ॥ ९० ॥ अब इस सृष्टिके पालक । जिसके आधीन होते लोक । वे ग्यारह भाव भिन्न देख । कहता तुझे ॥ ९१ ॥ महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥ संपूर्ण गुणसे जो वृद्ध । औ' महर्षियोंमें प्रबुद्ध । जो हैं कश्यपादि प्रसिद्ध । सप्त-ऋषी ॥ ९२ ॥ चौदह मनु जो विख्यात । उसमें चार प्रतिष्ठित । स्वयंभू आदि ख्याति प्राप्त । कहे हैं अन्य ॥ ९३ ॥
महर्षि सात आदीके मनु जो चार हैं तथा । मेरे संकल्पसे भाव लोकमें उनकी प्रजा ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०६
ऐसे एकादश ये समस्त । मेरे मनसे ही है निर्मित । सृष्टि व्यापार संचलनार्थ । धनुर्धर ॥ ९४ ॥ न हुए थे लोक व्यवस्थित । ये त्रिभुवन अनधिष्ठित । तथा यह सब भूतजात । जो था पडा हुआ ॥ ९५ ॥ तभी हुए ये ग्यारह उत्पन्न । उन्होने ही लोकपाल निर्माण । करके उनको अध्यक्ष जान । रखा यहां ॥ ९६ ॥ इसलिये ये ग्यारह राजा । उनके रहे अनेक प्रजा । है विस्तार यह सजा-धजा । मेरा ही सारा ॥ ९७ ॥ पहले होता है बीज एक । वही बनता तना नेक । उसमें ही अंकुर अनेक । निकलते हैं ॥ ९८ ॥ उस अंकुरके अनेक । निकलते शाखोपशाख । शाखाओंमें फुटते देख । असंख्य पल्लव ॥ ९९ ॥ उन पल्लवोंमें फल फूल । वृक्षत्व बहरता सकल । चिंतन रतको है केवल । बीज-मात्र ॥ १०० ॥ वैसे मैं आदि एक ही जान । उत्पन्न है मुझसे ही मन । मनसे सप्तऋषी उत्पन्न । तथा मनु भी ॥ १ ॥ उन्होंने किये लोकपाल निर्माण । लोक-पालोंने किया लोकसृजन । लोकोंसे हुई नाना प्रजा उत्पन्न । दीखती जो ॥ २ ॥ ऐसे इस विश्वका निर्माण । किया मैने ही पूर्ण रूपेण । चिंतन रतको होता ज्ञान । अन्यको नहीं ॥ ३ ॥ एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥ ७ ॥ मेरा जो योग-विस्तार जानता यह तत्वता । वह निश्चय पायेगा इस निष्कंप योगको ॥ ७ ॥ ३०७ विभूति-चिंतनयोग
मैं सर्व व्यापी हूँ इसलिये “जो जो मिला भूत । उसे मान भगवंत”— इसी लिये सुभद्रा-पति । ये भाव मेरी ही विभूति । तथा उसकी है ये व्याप्ति । संपूर्ण विश्व ॥ ४ ॥ इसीलिये सुन तू पार्थ । ब्रह्मादिसे चीटि पर्यंत । बिना मेरे दूसरी बात । नहीं है विश्वमें ॥ ५ ॥ ऐसे जो जानता यथार्थ । ज्ञान बोधसे हो जागृत । उसे नहीं दुःस्वप्न द्वैत । उत्तम-मध्यमादिक ॥ ६ ॥ मैं तथा मेरी विभूति । औ' विभूति व्याप्त व्यक्ति । एक है यह प्रतीति । करता वह ॥ ७ ॥ ऐसे जो संवेह रहित । अनुभव-ज्ञान सहित । मिलकर हुआ कृतार्थ । मनसे मुझमें ॥ ८ ॥ ऐसे जो मुझको भजता । अभेद दृष्टिसे जानता । भजन नादमें झूमता । उसके मैं ॥ ९ ॥ भक्तियोग यह भेद रहित । है अखंड तथा संशयातीत । आचारमें टूट भी शुभदाता । ऐसा कहा छठेमें ॥ ११० ॥ मेरा यह अभेद ज्ञान । जानना चाहता तो मन । कहता हूँ उसको सुन । ध्यान देकर ॥ ११ ॥ अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥८॥ मुझसे ही यह संपूर्ण । होता है विश्वका जनन । तथा है पालन पोषण । मुझसे ही ॥ १२ ॥ जैसे जल-कल्लोल माल । उसका जन्मदाता जल । औ' आधार भी वही जल । तथा जीवन भी ॥ १३ ॥ मुझमें सबका मूल प्रेरणा मुझसे सब । यह जान मुझे ज्ञानी भजता भक्ति-भावसे ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०८
जैसे यहां सर्वत्र कहीं । जलके बिना कछु नहीं । वैसे विश्वमें जहां कहीं । मेरे बिन ना कछु ॥ १४ ॥ मुझे ऐसे व्यापक मान । भजन करते सर्व स्थान । ये उनके भजन पूजन । प्रकट है प्रेम-भावसे ॥ १५ ॥ देशकाल वर्तमान । मुझमें देख अभिन्न । जैसे वायु हो गगन । फिरता गगन में ॥ १६ ॥ ऐसे निज-ज्ञान संपन्न । हो विचरते त्रिभुवन । मुझको जगद्रूप मान । अंतः करणमें ॥ १७ ॥ जो जहां मिलता है भूत । उसीको माना भगवंत । यह भक्ति-योग निश्चित । मेरा जान ॥ १८ ॥ मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥ दो भक्तोंकी भेंट आनंद-महोत्सव है— अन्तःकरण मैं बना । प्राण भी मद्रूप बना । भूला है जीव मरण । बोध-मूलसे ॥ १९ ॥ फिर बोधके नशेमें । औ' संवादके सुखमें । नाचते लेने देनेमें । ज्ञानानंदके ॥ २० ॥ जैसे समीपके दो सरोवर । उमड आते जब परस्पर । बनाते तब तरंग ही घर । तरंगको वैसे ॥ २१ ॥ होता जब भक्तसे भक्तका मिलन । मानो आनंदसे आनंदका गुंफन । ज्ञानसे करता ज्ञानका ही भूषण । ज्ञानके लिये ॥ २२ ॥ सूर्यसे सूर्यकी आरती उतारना । चंद्रने चंद्रका आलिंगन करना । या-गंगा यमुनाका है मिलन होना । वैसे ही धनंजय ॥ २३ ॥ चित्त प्राण मुझे मान बोध देते परस्पर । मेरे कीर्तनमें नित्य रमते तुष्ट होकर ॥ ९ ॥ ३०९ विभूति-चिंतनयोग
जैसे प्रयाग है समरसका । संगम प्रवाह सात्विकताका । हुआ जो सुसंवाद चौराहका । गणपति ही मानो ॥ २४ ॥ तब है महा सुखके नशेमें । उडे देह-ग्रामके बाहरमें । आत्म-तृप्तिके गर्जनानंदमें । गूंजता गगन ॥ २५ ॥ गुरु शिष्यका एकांत-स्थल । वहां भी देखके देश-काल । कहनेकी बात जो मंगल । गरजते हैं मेघ-से ॥ २६ ॥ पूरा खिला हुआ जो कमल । समा न सकता परिमळ । अभेद रूप देता प्रफुल्ल । आमोदोन्माद ॥ २७ ॥ सदा सर्वत्र मेरा गुणवर्णन । औ' वर्णनानंदमें खो जाता कथन । उस खोनेमें घुलते तन मन । जीव सहित ॥ २८ ॥ जीत लिया मत्सुख पूर्ण । प्रेमोत्कर्षमें हों बे-भान । भूले देश-काल भी पूर्ण । अपनेमें ही ॥ २९ ॥ तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥ भक्त केवल मेरा प्रेम-सुख चाहते हैं— हमको उन्हे जो कुछ देना था । उन्होने पहले ही पालिया था । हमारे दिये बिना कमाया था । फिर रहा क्या देनेको ॥ १३० ॥ उनका जो निश्चित पथ । उसके सम्मुख हे पार्थ । स्वर्ग-मोक्ष आदिके पथ । जैसी पगडंडियां ॥ ३१ ॥ अंगीकार किया उन्होंने प्रेम । दे देना है जो हमारा नियम । कर लिया उन्होंने वही काम । नाम लिया हमारा ॥ ३२ ॥ अनुदिन वह बढते जाये । कालकी दृष्टि नहीं पड पाये । इतना ही काम हमारे लिये । रहता है तब ॥ ३३ ॥ ऐसे मगन जो नित्य भजते प्रीति-पूर्वक । देता उन्हे बुद्धि योग जिससे मैं मिलूं उन्हे ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ३१०
अध्याय ७: ज्ञानविज्ञानयोग
ममता दृष्टिका आच्छादन कर । जैसे दौडती है माता धनुर्धर शिशुके पीछे सदा बद्ध होकर । रहता जो क्रीडारत ॥ ३४ ॥ शिशु जब जो जो खेल दिखाता । उसे स्वर्णमय करती माता । वैसे भक्तका प्रभुत्व बढाता । मैं उपासनामें ॥ ३५ ॥ उस उपासना पोषणसे । भक्त मिलन होगा मुझसे । देखता है इस भांतिसे । भाता है मुझे ॥ ३६ ॥ अजी ! भक्तकी मुझे है आस । उसकी एक-निष्ठाकी प्यास । प्रेमी भक्तोंका अकाल खास । रहता मेरे यहां ॥ ३७ ॥ स्वर्ग औ' मोक्षके पथ । छोड दिये उन्हींके हाथ । दिया तन लक्ष्मीके साथ । शेषके आधीन ॥ ३८ ॥ अपने पास केवल एक । रखा है निर्मल प्रेम-सुख । वह प्रेमियोंके लिये देख । किया जतन ॥ ३९ ॥ जैसे कहा मैंने अब तक । देखके अपनत्व नेक । लेते प्रेमियोंका प्रेम एक । जो शब्दसे परे ॥ ४० ॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥ मुझ आत्मामें ही प्रेम-भाव । जिन्होंने किया जीनेका ठाव । उसके बिना अन्य पांडव । सब है व्यर्थ ॥ ४१ ॥ ऐसे प्रिय तत्वज्ञोंके सम्मुख । कर्पूर मशाल हाथमें रख । चलता हूं मैं आगे आगे देख । राह दिखाते ॥ ४२ ॥ उनको अज्ञान रातमें । घिरे हुए घने तममें । दूर कर तम राहमें । करता नित्योदय ॥ ४३ ॥ अर्जुनको कृष्ण परब्रह्म होनेका भास --- प्रिय भक्तोंका प्रियतम । बोला जब पुरुषोत्तम । कहा अर्जुनने सप्रेम । मन हुआ शांत ॥ ४४ ॥ करुणा करके मैं ही हियमें रहके नित । तेजस्वी ज्ञान ज्योतीसे अज्ञान तम नाशता ॥ ११ ॥ ३११ विभूति-चिंतनयोग
अजी ! मुझे क्या सुना दिया । संसार तापसे दूर किया । जन्म-मरणसे है छुड़ाया । कृपाकर प्रभु ॥ ४५ ॥ यह नव-जन्म अपना । देखते अपने नयन । मेरे हाथ आया जीवन । मन भाया जो ॥ ४६ ॥ उज्ज्वल हुआ आज आयुष्य । हुआ दैव दशाका उदय । वाक्प्रसाद पाया हे सदय । दैव मुखसे ॥ ४७ ॥ तेरे वचनके प्रकाशसे । अंतर्बाह्य तम मिटनेसे । देखता हूं यथार्थ रूपसे । स्वरूप तेरा ॥ ४८ ॥ अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥ अजी ! वही है तू परब्रह्म । महाभूतोंका विश्राम-धाम । पवित्र तम अति परम । जगन्नाथ ॥ ४९ ॥ परम दैवत तू तीनोंका । पुरुष है तू पंचवीसका । दिव्य है तू प्रकृति भावका । परे है जो श्रेष्ठ ॥ १५० ॥ स्वामी तू है अनादि-सिद्ध । जन्म रहित जो प्रसिद्ध । हमने पाया अब शुद्ध । स्वरूप तेरा ॥ ५१ ॥ काल-यंत्रका तू सूत्रधार । जीवन कलाका कर्णधार । तू ही है ब्रह्मांडका आधार । जाना यह निश्चित ॥ ५२ ॥ आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥ यहां ओर ही एक भांति । आती है इसकी प्रतीति । ऋषियोंने भी इसी भांति । किया है वर्णन ॥ ५३ ॥ अर्जुनने कहा पवित्र तू पर-ब्रह्म श्रेष्ठ जो मोक्ष-धाम तू । आत्मा शाश्वत औ' दिव्य अजन्मा आदि औ' विभु ॥ १२ ॥ गाते हैं ऋषि जो सारे तथा असित देवल । व्यास नारद देवर्षि वैसे ही आपने कहा ॥ १३ ॥ ज्ञानेश्वरी ३१२
उन ऋषियोंने जो कहा था । अनुभवमें आयी सत्यता । कृपया आपने सुनाया था । इसीलिये अब ॥ ५४ ॥ आता था देव-ऋषि नारद । गाता था ऐसे बचन छंद । गानेका ही लेकर आनंद । खो देते थे अर्थ ॥ ५५ ॥ प्रकट हुए यदि भास्कर । अंधोंके ही गांवमें आकर । बिना उष्णताके तापकर । देखें प्रकाश कैसे ॥ ५६ ॥ सुन देवर्षि नारदका अध्यात्म-गान । उससे केवल नाद-माधुर्य ही सुन । चितसे न कर उसका सार-ग्रहण । छोड देते थे ॥ ५७ ॥ असित देवलके मुखसे । सुना है तेरा चरित्र ऐसे । किंतु चित्त विषय-विषसे । था अति ग्रस्त ॥ ५८ ॥ विषय-विष होता भयंकर । तीता विषय है अति मधुर । तथा परमार्थ होता मधुर । लगता तीता ही ॥ ५९ ॥ अजी ! औरोंका क्या कहना । भवनमें तेरा गुण गाना । व्यास देवका नित सुनाना । तेरा चरित्र श्रेष्ठ ॥ १६० ॥ अंधारमें चिंतामणि देखा । उपेक्षासे नहीं उठा सका । उजालेमें पहचान सका । ऐसे ही है यह ॥ ६१ ॥ वैसे व्यासादिकोंके वचन । मेरी भी जो चिद्रत्नोंकी खान । उपेक्षित पड़ी थी श्रीकृष्ण । बिना प्रकाशके ॥ ६२ ॥ सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । न हिते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥ फैले तेरे वाक्सूर्य किरण । ऋषि-वाक्योंका हुआ स्मरण । मिटा सब अपरिचितपन । तेरी कृपासे ॥ ६३ ॥ ज्ञान-बीज रूप थे उनके बोल । हृदय-भूमिमें जमे थे सकल । उसपे तेरी कृपाका यह ओल । संवाद फल आया ॥ ६४ ॥ मानता सत्य ये सारा स्वयं तू कहता मुझे । देव दानव कोयी भी तेरा रूप न जानते ॥ १४ ॥ (40) ३१३ विभूति-चिंतनयोग
अजी ! नारदादिक जो संत । उनकी उक्ति रूप सरिता । मैं महोदधि बना अनंत । संवाद सुखका ॥ ६५ ॥ मेरा अनेकानेक जन्म- । किया हुआ जो सत्कर्म । फला है यह अत्युत्तम । तू सद्गुरु रूप ॥ ६६ ॥ वैसे सुने थे वृद्धोंके वचन । सदैव तेरे ही गुण-वर्णन । हुई अब तेरी कृपा महान । तभी फले सब ॥ ६७ ॥ तभी भाग्य होता अनुकूल । उद्यम होते सब सफल । सुना था वह है जो सफल । हुआ गुरु कृपासे ॥ ६८ ॥ माली जिसमें जन्म बिताता । गाछ लगाकर जन्म देता । किंतु वसंतमें ही खिलता । अनायास ॥ ६९ ॥ जब विषम ज्वर उतरता । तभी रसनामें स्वाद आता । रसायन भी है जो फल देता । जब होता आरोग्य ॥ १७० ॥ वाचा श्रवण नयन प्राण । अनुभवते सार्थकपन । संचरता उसमें चेतन । तभी मात्र ॥ ७१ ॥ वैसे शब्दजातका अध्ययन । योगाभ्यासादि समस्त साधन । अपना कह सकते हैं जान । जब गुरु अनुकूल ॥ ७२ ॥ इस प्रतीतिके आनंदसे । नाचता अर्जुन निश्चयसे । कहता है हे देव ! कृष्णसे । तेरी बात मानी ॥ ७३ ॥ सच है यह कैवल्यपति । हुई मुझे त्रिशुद्ध प्रतीति । सुरासुर-नरादिकी मति । न जानती तुझे ॥ ७४ ॥ न सुनकर तेरा वचन । अपनेसे ही कर चिंतन । अशक्य है होना तेरा ज्ञान । हुआ मेरा निश्चय ॥ ७५ ॥ स्वयमेवात्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥ तू ही है अपने आप जानता पुरुषोत्तम । देव देव जगन्नाथ भूतेश-भूत भावन ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३१४
जीव स्व-सामर्थ्यसे ईश्वरको नहीं जान सकता— जैसे अपनी विशालता गगन । आप ही जानता संपूर्ण रूपेण । अथवा जैसे अपना हो सपना । जानती पृथ्वी ॥ ७६ ॥ वैसे अपनी सर्वशक्ति । जानता तू ही लक्ष्मीपति । यहां वेदादिककी मति । अकडती व्यर्थ ॥ ७७ ॥ दौडनेमें जीतना मनको । आंकना हाथसे पवनको । पार करना आदि शून्यको । कैसे संभव ॥ ७८ ॥ ऐसा है तुझे जानना । उसको कह सकना । असंभव तेरे बिना । अन्य किसीको ॥ ७९ ॥ तू ही जानता अपनी बात । कहनेमें भी तू ही समर्थ । देव ! मेरे माथे का तू आर्त- । पसीना पोंछ दे ॥ १८० ॥ सुना क्या यह भूत-भावन । त्रिभुवन-गज-पंचानन । सकल देव-देवतार्चन । जगन्नायक ॥ ८१ ॥ जानना चाहें तो तेरा बड़प्पन । उसके सम्मुख हम रजकण । यह जान हुए तो सलज्ज मौन । नहीं अन्य उपाय ॥ ८२ ॥ चहूँ ओर सरिता सागर भरा । किंतु चातक बेचारा रहा कोरा । स्वातीका बूंद ही उसका सहारा । वही उसका पानी ॥ ८३ ॥ वैसे गुरु है सर्वत्र चहूँ ओर । किंतु कृष्ण ! मुझे तेरा ही आधार । रहने दो यह वचन विस्तार । कहो विभूतियोग ॥ ८४ ॥ वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः । याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥ तेरी जो विभूति संपूर्ण । जिससे तू व्याप्त भुवन । कह तू दिव्य श्री कृष्ण । कृपा पूर्वक ॥ ८५ ॥ विभूति अपनी दिव्य मुझ अशेष तु कह । जिससे विश्व है सारा व्याप्त हो कर तू रहा ॥ १६ ॥ ३१५ विभूति-चिंतनयोग
विभूति जो यहां समस्त । लोगोंमें व्याप्त है अनंत । जो है प्रधान औ' विख्यात । कर तू प्रकट ॥ ८६ ॥ कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥ किस भांति जानूं तुझको । किस भांति गाऊं तुझको । विश्व रूप कहूँ तुझको । न होगा चिंतन ॥ ८७ ॥ अजी ! पीछे कहे जैसे । निज-भाव कहे वैसे । अभी सबिस्तर तैसे । कह तू एक बार ॥ ८८ ॥ किन भावोंका ले आधार । भजनेसे है सुखकर । कह वह मुझे सत्वर । विभूति-योग ॥ ८९ ॥ विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वंतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥ अर्जुनकी विभूति-विस्तार सुननेकी इच्छा— मैंने पूछा जो विभूति । वहि कहो भूतपति । पुनः इसकी पुनरुक्ति । करना क्या ॥ १९० ॥ ऐसी आवे तो भाव कल्पना । उसको जाने दो जनार्दन । मुझ जैसेको अमृत पान । ना न कहलाता ॥ ९१ ॥ कालकूटका जो सहोदर । मृत्यु भयसे पिये अपार । किंतु चतुर्वेश पुरंदर । होते जाते हैं ॥ ९२ ॥ ऐसा वह क्षीराब्धिका रस । उसमें है अमृतका बास । उसके जो माधुर्य मृष्टांश । नहीं छोडा जाता ॥ ९३ ॥ उस अल्पामृतकी यह महता । उस सामान्यकी वह मधुरता । यहां तेरा वचन परमामृत । कहना क्या ॥ ९४ ॥ योगेश जानूं मैं कैसे तुझे चिंतनमें नित । कौन कौन स्वरूपोंमें करूं मैं तब चिंतन ॥ १७ योग-विभूति-विस्तार कह तू अपना निज । सुनके न अघाता मैं वचनामृत पानसे ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३१६
मंदाराचलको न उतराना । क्षीर सागरको नहीं मथना । अनादि सिद्ध जो अमृत पीना । वह भी अनायास ॥ ९५ ॥ न है वह द्रव या बद्ध । न है वहां रस औ' गंध । वह मिलता नित्य-सिद्ध । स्मरते ही ॥ ९६ ॥ सुन कर होता निरास । निश्चित संसारका पाश । तथा आति नित्यता पास । अपने आप ॥ ९७ ॥ मिटती जन्म-मृत्युकी भाषा । भूल जाता सर्वस निःशेष । अंतर्बाह्य वह महा-सुख । बढ़ता जाता ॥ ९८ ॥ तथा दैवयोगसे होता सेवन । सेवनसे अमृत होता है प्राण । देता है स्वयं श्री कृष्ण भगवान । ना न कहता चित्त ॥ ९९ ॥ सहज भाता है चित्तको नाम । दर्शन होता रहता परम । तथा ज्ञान देता अमृतोपम । आनंद मगन हो ॥ २०० ॥ अनुभवता मैं कैसा सुख । कह न सकता परितोष । कथित कथन कृष्णमुख- । करता है आनंद ॥ १ ॥ आनादि भास्कर क्या बासी होता । अस्नात अग्नि अमंगल होता । नदी प्रवाह क्या पुराना होता । समय बीतनेसे ॥ २ ॥ सुन तेरे मंगल वचन । किया है नाद-ब्रह्म दर्शन । तथा कृष्णागरुके 'सुमन । बटोर लिये हैं ॥ ३ ॥ सुनकर पार्थके वचन । डुला कृष्णका अंतःकरण । कहता है भक्ति ज्ञान पूर्ण । सागर बना यह ॥ ४ ॥ प्रिय सखाके प्रेममें मस्त । उमड़ते स्नेहमें हो त्रस्त । कष्टसे संयत हो अनंत । बोलता क्या ॥ ५ ॥ भगवान उवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥ सुन मैं कहता दिव्य मुख्य मुख्य विभूतियां । मेरा विभूति-विस्तार न टूटता कभी कहीं ॥ १९ ॥ ३१७ विभूति-चिंतनयोग
भगवानकी अनंत विभूतियोंकी कल्पना— मैं हूँ पितामहका पिता । स्मरनेसे भी है भूलता । कहता बाबा पांडुसुत । अच्छा किया तूने ॥ ६ ॥ बाबा ! कहता वह अर्जुनको । इसमें विस्मय नहीं हमको । शिशु हो कहा नहीं क्या नंदको । बाबा ! उसने ॥ ७ ॥ यहांका प्रसंग है ऐसे । प्रेमोद्रेकमें होता वैसे । कृष्ण कहता अर्जुनसे । सुन धनंजय ॥ ८ ॥ तूने पूछा है मेरी विभूति । अनंत हैं वे सुभद्रापति । मेरी होकर भी मेरी मति । न जानती उन्हें ॥ ९॥ शरीरमें रोम हैं किती । जिसका उसे न गिनती । वैसी ही है मेरी विभूति । अनगिनत मुझे ॥ २१० ॥ वैसा भी मैं कैसा कितना । ज्ञान नहीं मुझे अपना । सबसे रूढ जो प्रधान । कहता हूं तुझे ॥ ११ ॥ जिनको जाननेसे हे पार्थ । सभी जान लिया होता । बीज जब हाथमें है आता । आया वृक्ष जैसा ॥ १२ ॥ या स्वाधीन होनेसे उपवन । आते सभी वृक्ष फल सुमन । वैसे जान लिया कर चिंतन । आता चित्तमें विश्व ॥ १३ ॥ वैसे सच ही है धनुर्धर । अनंत है जो मेरा विस्तार । आकाशका जो महा विस्तार । छिप जाता मुझमें ॥ १४ ॥ अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥ कुंतलालक मस्तक सुन । धनुर्वेद त्र्यंबक अर्जुन । बसा मैं हियमें आत्मा बन । भूतमात्रके ॥ १५ ॥ अंदर भी मैं हूँ अंतःकरणमें । बाहर भी मैं आवरण रूपमें । मैं ही हूँ आदिमें तथा निर्वाणमें । मैं मध्यमें भी ॥ १६ ॥ हियमें सबके मैं हूँ बसता आत्म रूपसे । मैं आदि भूत मात्रोंको मध्य मैं और अंत भी ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी ३१८
जैसे मेघ तलमें गगन । अंदर बाहर सूक्ष्म स्थान । आकाशमें इनका जनन । रहना भी वही ॥१७॥ फिर ये सब लय हो जाते । अकाश ही बनके रहते । वैसे आदि अंत लय होते । भूतमात्र मुझमें ॥ १८ ॥ ऐसा विविध व्यापक पन । मेरा विभूति विस्तार जान । जीवका कर तू अब कान । सुन जो सुना था ॥ १९ ॥ अब भी मेरी वे जो विभूति । सुनना है क्या सुभद्रापति । पुनरुक्ति करता सप्रीति । प्रधान रूपसे ॥ २२० ॥ आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् । मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥ भगवानकी प्रधान ऐसी पिचत्तर विभूतियां — यह कह बोला प्रेममें । मैं हूं विष्णु आदित्योंमें । तथा सूर्य ज्योतिर्वंतोंमें । जो है रश्मिवंत ॥ २१ ॥ मरीचि मैं मरुतोंमें । चंद्र मैं तारागणोंमें । बोले श्रीकृष्ण रणमें । गगन रंगके ॥ २२ ॥ वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानांमस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥ वेदोंमें मैं सामवेद । कहता वह गोविंद । देवोंमें मरुद्बंधु । महेंद्र हूँ मैं ॥ २३ ॥ इंद्रियोंमें मैं हूँ मन । जो है ग्यारहवा जान भूतमात्रोंमें चेतन । स्वभावसे मैं ॥ २४ ॥ आदित्योंमें महा विष्णु सूर्य मैं ज्योतिमानमें । मरीचि मुख्य वायुमें नक्षत्रोंमें शशांक मैं ॥ २१ ॥ मैं सामवेद वेदोंमें देवोंमें देव-राज मैं । मन हूँ इंद्रियोंमें मैं चेतना भूत-मात्रमें ॥ २२ ॥ ३१९ विभूति-चिंतनयोग
रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् । वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥ मैं हूँ रुद्रोंमें शंकर । कामसे जिसका वैर । निःसंशय धनुर्धर । निष्भ्रांत मान तू ॥ २५ ॥ यक्ष-रक्ष गणमें विख्यात । शंभुका मित्र जो धनवंत । वह कुबेर मैं हूँ अनंत । कहने लगा ॥ २६ ॥ वैसे ही मैं वसुओंमें । अग्नि हूँ जान मनमें । सर्वोव्य मैं शिखरोंमें । मेरू हूं गिरीश जो ॥ २७ ॥ पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिं । सेनानिनामहं स्कंदः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥ महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥ स्वर्ग सिंहासन सहायक । सर्वश्रेष्ठ सर्वज्ञ जो नेक । पुरोहित स्वर्गका प्रमुख । मैं वह बृहस्पति ॥ २८ ॥ त्रिभुवनका श्रेष्ठ सेनापति । कहलाता स्कंद जो महामति । अग्नि कृत्तिका जान जो विभूति । शिव वीर्य से ॥ २९ ॥ विश्वके सकल सरोवरमें । जल राशिमें समुद्र रूपमें । तपोराशि हूँ मैं महर्षियोंमें । कहलाता भृगु मुनि ॥ ३० ॥ सकल अक्षरोंमें जो है श्रेष्ठ । जहां सत्योत्कर्ष परमोत्कट । ज्ञानी जन जिससे एक निष्ठा । वह ओंकार मैं हूँ ॥ ३१ ॥ कुबेर यक्ष रक्षोंमें रुद्रोंमें मैं सदाशिव । मेरू मैं गिरि-मालामें अग्नि मैं वसु वर्गमें ॥ २३ ॥ बृहस्पति मुझे जान पुरोहित प्रधान जो । स्कंद सेनाधिपोंमें मैं समुद्र जल-राशिमें ॥ २४ ॥ मैं एकाक्षर वाणीमें भृगु मैं ऋषि-वृंदमें । जप हूं सब यज्ञोंमें स्थावरोंमें हिमालय ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३२०
जो है समस्त यज्ञोंमें । जपयज्ञ मैं लोकमें । कर्म-त्याग प्रणवादिमें । नित्य होता ॥ ३२ ॥ अजी ! जप यज्ञ जो परम । बांध न सकते यज्ञादि कर्म । नामसे पावन धर्म-अधर्म । परब्रह्म वेदार्थ ॥ ३३ ॥ स्थावरोंमें जो पर्वत । पुण्य रूप रहा स्थित । पुण्य-पुंज हिमवंत । मैं हूँ जान तू ॥ ३४ ॥ अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् देवर्षीणां च नारदः । गंधर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलोमुनिः ॥ २६ ॥ उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेंद्राणाम् नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥ कल्पद्रुम औ' पारिजात । गुणमें चंदन है ख्यात । फिर भी वृक्षोंमें अश्वत्थ । मेरी विभूति है ॥ ३५ ॥ देवऋषियोंमें मुझे पार्थ । जानना तू नारद यथार्थ । तथा गंधर्वोंमें चित्ररथ । मुझे ही जान ॥ ३६ ॥ सभी सिद्धोंमें महासिद्ध । कपिलाचार्य जो प्रबुद्ध । तुरंगोंमें जो हैं प्रसिद्ध । उच्चैःश्रव मैं ॥ ३७ ॥ गजोंमें मैं हूं राज-भूषण । ऐरावत स्वर्ग-भूषण । पय-राशि कर मंथन । निकाला अमृतांश ॥ ३८ ॥ यहां मैं नरोंमें जो राजा । विभूति विशेष सहज । जन कहलाते हैं प्रजा । जिसकी सब ॥ ३९ ॥ अश्वत्थ सब वृक्षोंमें देवर्षि बोच नारद । चित्ररथ गंधर्वों में सिद्धोंमें कपिलमुनि ॥ २६ ॥ उच्चैश्रवा अश्वोंमें मैं निकला जो अमृतसे । ऐरावत गजेंद्रोंमें नरोंमें मैं नराधिप ॥ २७ ॥ ३२१ विभूति-चिंतनयोग (41)