ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 381, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंममता दृष्टिका आच्छादन कर । जैसे दौडती है माता धनुर्धर शिशुके पीछे सदा बद्ध होकर । रहता जो क्रीडारत ॥ ३४ ॥ शिशु जब जो जो खेल दिखाता । उसे स्वर्णमय करती माता । वैसे भक्तका प्रभुत्व बढाता । मैं उपासनामें ॥ ३५ ॥ उस उपासना पोषणसे । भक्त मिलन होगा मुझसे । देखता है इस भांतिसे । भाता है मुझे ॥ ३६ ॥ अजी ! भक्तकी मुझे है आस । उसकी एक-निष्ठाकी प्यास । प्रेमी भक्तोंका अकाल खास । रहता मेरे यहां ॥ ३७ ॥ स्वर्ग औ' मोक्षके पथ । छोड दिये उन्हींके हाथ । दिया तन लक्ष्मीके साथ । शेषके आधीन ॥ ३८ ॥ अपने पास केवल एक । रखा है निर्मल प्रेम-सुख । वह प्रेमियोंके लिये देख । किया जतन ॥ ३९ ॥ जैसे कहा मैंने अब तक । देखके अपनत्व नेक । लेते प्रेमियोंका प्रेम एक । जो शब्दसे परे ॥ ४० ॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥ मुझ आत्मामें ही प्रेम-भाव । जिन्होंने किया जीनेका ठाव । उसके बिना अन्य पांडव । सब है व्यर्थ ॥ ४१ ॥ ऐसे प्रिय तत्वज्ञोंके सम्मुख । कर्पूर मशाल हाथमें रख । चलता हूं मैं आगे आगे देख । राह दिखाते ॥ ४२ ॥ उनको अज्ञान रातमें । घिरे हुए घने तममें । दूर कर तम राहमें । करता नित्योदय ॥ ४३ ॥ अर्जुनको कृष्ण परब्रह्म होनेका भास --- प्रिय भक्तोंका प्रियतम । बोला जब पुरुषोत्तम । कहा अर्जुनने सप्रेम । मन हुआ शांत ॥ ४४ ॥ करुणा करके मैं ही हियमें रहके नित । तेजस्वी ज्ञान ज्योतीसे अज्ञान तम नाशता ॥ ११ ॥ ३११ विभूति-चिंतनयोग