भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अजी ! मुझे क्या सुना दिया । संसार तापसे दूर किया । जन्म-मरणसे है छुड़ाया । कृपाकर प्रभु ॥ ४५ ॥ यह नव-जन्म अपना । देखते अपने नयन । मेरे हाथ आया जीवन । मन भाया जो ॥ ४६ ॥ उज्ज्वल हुआ आज आयुष्य । हुआ दैव दशाका उदय । वाक्प्रसाद पाया हे सदय । दैव मुखसे ॥ ४७ ॥ तेरे वचनके प्रकाशसे । अंतर्बाह्य तम मिटनेसे । देखता हूं यथार्थ रूपसे । स्वरूप तेरा ॥ ४८ ॥ अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥ अजी ! वही है तू परब्रह्म । महाभूतोंका विश्राम-धाम । पवित्र तम अति परम । जगन्नाथ ॥ ४९ ॥ परम दैवत तू तीनोंका । पुरुष है तू पंचवीसका । दिव्य है तू प्रकृति भावका । परे है जो श्रेष्ठ ॥ १५० ॥ स्वामी तू है अनादि-सिद्ध । जन्म रहित जो प्रसिद्ध । हमने पाया अब शुद्ध । स्वरूप तेरा ॥ ५१ ॥ काल-यंत्रका तू सूत्रधार । जीवन कलाका कर्णधार । तू ही है ब्रह्मांडका आधार । जाना यह निश्चित ॥ ५२ ॥ आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥ यहां ओर ही एक भांति । आती है इसकी प्रतीति । ऋषियोंने भी इसी भांति । किया है वर्णन ॥ ५३ ॥ अर्जुनने कहा पवित्र तू पर-ब्रह्म श्रेष्ठ जो मोक्ष-धाम तू । आत्मा शाश्वत औ' दिव्य अजन्मा आदि औ' विभु ॥ १२ ॥ गाते हैं ऋषि जो सारे तथा असित देवल । व्यास नारद देवर्षि वैसे ही आपने कहा ॥ १३ ॥ ज्ञानेश्वरी ३१२

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