भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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भली भांति यहां रह कर । स्व-प्रकाशमें ही जानकर । देखता अजत्व जो प्रखर । मेरे नयनों से ॥ ७४ ॥ मैं हूं अनादिसे पर । सर्व लोक महेश्वर । मुझको ऐसा जो नर । जानता है ॥ ७५ ॥ पाषाणमें वह पारस । रसमें है जो सिद्धरस । मनुष्याकृतिमें जो अंश । मेरा ही जान ॥ ७६ ॥ जंगम बिंब है वह ज्ञानका । अवयव सुखके अंकुरका । प्रकाश है वह मानवताका । लोकदृष्टिका है भ्रम ॥ ७७ ॥ कर्पूरमें हिरा मिला । उस पर पानी डाला । कर्पूर सब पिघला । प्रकटा हीरा ॥ ७८ ॥ रूपमें है वह मानुष । देखनेमें अन्य सदृश । न स्पर्शते प्रकृति-दोष । उसको कभी ॥ ७९ ॥ उसको छोड़ जाते हैं सब पाप । जैसे जलता चंदन वृक्ष साप । वैसे ब्रह्म-ज्ञानीको कोई संकल्प । कभी छूता नहीं ॥ ८० ॥ होना यदि मेरा ज्ञान । ऐसा चाहता है मन । मैं कैसा हूँ यह जान । तथा मज्जन्य वस्तु ॥ ८१ ॥ सभी है मेरे ही विकार । भूतमात्रके रूप धर । फैले हैं त्रिलोकमें भर । धनंजय ॥ ८२ ॥ बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥ अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥ बुद्धि ज्ञान क्षमा शांति सत्य निर्मोह निग्रह । जन्म-मृत्यु सुख-दुःख लाभालाभ भयामय ॥ ४ ॥ अहिंसा समता तुष्टि तप दान यशायश । हुये ये मुझसे भाव भूतोंमें भिन्न भिन्न जो ॥ ५ ॥ (३१) ३०५ विभूति-चिंतनयोग