ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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प्रथम है जान तू बुद्धि । फिर ज्ञान जो निरवधि । असंमोह सहन सिद्धि । क्षमा सत्य ॥ ८३ ॥ तब इंद्रिय मन दमन । सुख दुखमें समवर्तन । भाव अभाव मान अर्जुन । मेरे ही विकार ॥ ८४ ॥ भय तथा अभयता । अहिंसा तथा समता । मेरा रूप पांडुसुत । जान तू यह ॥ ८५ ॥ दान यश अपकीर्ति । इन भावोंकी वसती । मेरी ओरसे है होती । सब भूतोंमें ॥ ८६ ॥ जैसे भूत जात भिन्न भिन्न । वैसे मेरे गुण भी है जान । होते मेरे ज्ञानसे उत्पन्न । कुछ अज्ञानसे भी ॥ ८७ ॥ जैसे प्रकाश औ' अंधार । लेकर सूर्यका ही आधार । फैलता अस्तमें है अंधार । उदयमें वैसे प्रकाश ॥ ८८ ॥ मेरा ज्ञान और अज्ञान । है जो दैवके ही कारण । तभी भूतोंमें भाव जान । कम और अधिक ॥ ८९ ॥ तभी जीव सृष्टि संपूर्ण । मेरे ही विकारमें तू जान । उलझी हुई यहां अर्जुन । जान तू यह ॥ ९० ॥ अब इस सृष्टिके पालक । जिसके आधीन होते लोक । वे ग्यारह भाव भिन्न देख । कहता तुझे ॥ ९१ ॥ महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥ संपूर्ण गुणसे जो वृद्ध । औ' महर्षियोंमें प्रबुद्ध । जो हैं कश्यपादि प्रसिद्ध । सप्त-ऋषी ॥ ९२ ॥ चौदह मनु जो विख्यात । उसमें चार प्रतिष्ठित । स्वयंभू आदि ख्याति प्राप्त । कहे हैं अन्य ॥ ९३ ॥
महर्षि सात आदीके मनु जो चार हैं तथा । मेरे संकल्पसे भाव लोकमें उनकी प्रजा ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०६