ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसब कोयी मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं इसलिये मुझे कोयी नहीं जानता— अजी ! गर्भ जो है उदरका । नहीं जानता पय माताका । वैसे ही ज्ञान-जात देवोंका । मेरे विषयमें ॥ ६५ ॥ जलचरोंको सागरका भान । गुरगुरेको जैसा है गगन । वैसा ही महर्षियोंका ज्ञान । मेरे विषयमें ॥ ६६ ॥ मैं हूँ कौन तथा हूँ कितना । कब किससे हुआ उत्पन्न । इसपे न कहा है वचन । युग-युगोंसे ॥ ६७ ॥ महर्षी तथा वे देव । ये भूतजात हैं सर्व । मैं अनादि हूँ पांडव । जान तू यह स्पष्ट ॥ ६८ ॥ उतरा हुआ नीर चढ़ेगा पर्वत । वृक्ष बढता जायेगा जड पर्यंत । जानेगा तब मुझसे बना जगत । मुझे पूर्ण ॥ ६९ ॥ या वटांकुरमें वृक्ष समायेगा । अथवा उर्मिमें सागर डूबेगा । या परमाणुमें ही समा जायेगा । ब्रह्मांड गोल ॥ ७० ॥ तो भी मुझसे बने थे जीव । महर्षी अथवा जो हैं देव । मुझे जाननेमें हैं पांडव । लेंगे समय बहुत ॥ ७१ ॥ मुझे जाननेके लिये इंद्रियोंको अंतरमुख करो— मुझे जानना है यद्यपि कठिन । कोई रखे इंद्रिय बहिर्गमन । कर उसको अंतर्मुख विलीन । अपनेमें ही ॥ ७२ ॥ बढ़ता है वह मेरी ओर । चढ़ भूतोंके सिरपर । छोड़के असत्य संसार । धनंजय ॥ ७३ ॥ यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ जाने जो मैं अजन्मा हूं स्वयम्भू विश्व-चालक । निर्मोही हो मनुष्योंमें छूटता सब पापसे ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०४