भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 378

मैं सर्व व्यापी हूँ इसलिये “जो जो मिला भूत । उसे मान भगवंत”— इसी लिये सुभद्रा-पति । ये भाव मेरी ही विभूति । तथा उसकी है ये व्याप्ति । संपूर्ण विश्व ॥ ४ ॥ इसीलिये सुन तू पार्थ । ब्रह्मादिसे चीटि पर्यंत । बिना मेरे दूसरी बात । नहीं है विश्वमें ॥ ५ ॥ ऐसे जो जानता यथार्थ । ज्ञान बोधसे हो जागृत । उसे नहीं दुःस्वप्न द्वैत । उत्तम-मध्यमादिक ॥ ६ ॥ मैं तथा मेरी विभूति । औ' विभूति व्याप्त व्यक्ति । एक है यह प्रतीति । करता वह ॥ ७ ॥ ऐसे जो संवेह रहित । अनुभव-ज्ञान सहित । मिलकर हुआ कृतार्थ । मनसे मुझमें ॥ ८ ॥ ऐसे जो मुझको भजता । अभेद दृष्टिसे जानता । भजन नादमें झूमता । उसके मैं ॥ ९ ॥ भक्तियोग यह भेद रहित । है अखंड तथा संशयातीत । आचारमें टूट भी शुभदाता । ऐसा कहा छठेमें ॥ ११० ॥ मेरा यह अभेद ज्ञान । जानना चाहता तो मन । कहता हूँ उसको सुन । ध्यान देकर ॥ ११ ॥ अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥८॥ मुझसे ही यह संपूर्ण । होता है विश्वका जनन । तथा है पालन पोषण । मुझसे ही ॥ १२ ॥ जैसे जल-कल्लोल माल । उसका जन्मदाता जल । औ' आधार भी वही जल । तथा जीवन भी ॥ १३ ॥ मुझमें सबका मूल प्रेरणा मुझसे सब । यह जान मुझे ज्ञानी भजता भक्ति-भावसे ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०८