ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
मैं सर्व व्यापी हूँ इसलिये “जो जो मिला भूत । उसे मान भगवंत”— इसी लिये सुभद्रा-पति । ये भाव मेरी ही विभूति । तथा उसकी है ये व्याप्ति । संपूर्ण विश्व ॥ ४ ॥ इसीलिये सुन तू पार्थ । ब्रह्मादिसे चीटि पर्यंत । बिना मेरे दूसरी बात । नहीं है विश्वमें ॥ ५ ॥ ऐसे जो जानता यथार्थ । ज्ञान बोधसे हो जागृत । उसे नहीं दुःस्वप्न द्वैत । उत्तम-मध्यमादिक ॥ ६ ॥ मैं तथा मेरी विभूति । औ' विभूति व्याप्त व्यक्ति । एक है यह प्रतीति । करता वह ॥ ७ ॥ ऐसे जो संवेह रहित । अनुभव-ज्ञान सहित । मिलकर हुआ कृतार्थ । मनसे मुझमें ॥ ८ ॥ ऐसे जो मुझको भजता । अभेद दृष्टिसे जानता । भजन नादमें झूमता । उसके मैं ॥ ९ ॥ भक्तियोग यह भेद रहित । है अखंड तथा संशयातीत । आचारमें टूट भी शुभदाता । ऐसा कहा छठेमें ॥ ११० ॥ मेरा यह अभेद ज्ञान । जानना चाहता तो मन । कहता हूँ उसको सुन । ध्यान देकर ॥ ११ ॥ अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥८॥ मुझसे ही यह संपूर्ण । होता है विश्वका जनन । तथा है पालन पोषण । मुझसे ही ॥ १२ ॥ जैसे जल-कल्लोल माल । उसका जन्मदाता जल । औ' आधार भी वही जल । तथा जीवन भी ॥ १३ ॥ मुझमें सबका मूल प्रेरणा मुझसे सब । यह जान मुझे ज्ञानी भजता भक्ति-भावसे ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०८
जैसे यहां सर्वत्र कहीं । जलके बिना कछु नहीं । वैसे विश्वमें जहां कहीं । मेरे बिन ना कछु ॥ १४ ॥ मुझे ऐसे व्यापक मान । भजन करते सर्व स्थान । ये उनके भजन पूजन । प्रकट है प्रेम-भावसे ॥ १५ ॥ देशकाल वर्तमान । मुझमें देख अभिन्न । जैसे वायु हो गगन । फिरता गगन में ॥ १६ ॥ ऐसे निज-ज्ञान संपन्न । हो विचरते त्रिभुवन । मुझको जगद्रूप मान । अंतः करणमें ॥ १७ ॥ जो जहां मिलता है भूत । उसीको माना भगवंत । यह भक्ति-योग निश्चित । मेरा जान ॥ १८ ॥ मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥ दो भक्तोंकी भेंट आनंद-महोत्सव है— अन्तःकरण मैं बना । प्राण भी मद्रूप बना । भूला है जीव मरण । बोध-मूलसे ॥ १९ ॥ फिर बोधके नशेमें । औ' संवादके सुखमें । नाचते लेने देनेमें । ज्ञानानंदके ॥ २० ॥ जैसे समीपके दो सरोवर । उमड आते जब परस्पर । बनाते तब तरंग ही घर । तरंगको वैसे ॥ २१ ॥ होता जब भक्तसे भक्तका मिलन । मानो आनंदसे आनंदका गुंफन । ज्ञानसे करता ज्ञानका ही भूषण । ज्ञानके लिये ॥ २२ ॥ सूर्यसे सूर्यकी आरती उतारना । चंद्रने चंद्रका आलिंगन करना । या-गंगा यमुनाका है मिलन होना । वैसे ही धनंजय ॥ २३ ॥ चित्त प्राण मुझे मान बोध देते परस्पर । मेरे कीर्तनमें नित्य रमते तुष्ट होकर ॥ ९ ॥ ३०९ विभूति-चिंतनयोग
जैसे प्रयाग है समरसका । संगम प्रवाह सात्विकताका । हुआ जो सुसंवाद चौराहका । गणपति ही मानो ॥ २४ ॥ तब है महा सुखके नशेमें । उडे देह-ग्रामके बाहरमें । आत्म-तृप्तिके गर्जनानंदमें । गूंजता गगन ॥ २५ ॥ गुरु शिष्यका एकांत-स्थल । वहां भी देखके देश-काल । कहनेकी बात जो मंगल । गरजते हैं मेघ-से ॥ २६ ॥ पूरा खिला हुआ जो कमल । समा न सकता परिमळ । अभेद रूप देता प्रफुल्ल । आमोदोन्माद ॥ २७ ॥ सदा सर्वत्र मेरा गुणवर्णन । औ' वर्णनानंदमें खो जाता कथन । उस खोनेमें घुलते तन मन । जीव सहित ॥ २८ ॥ जीत लिया मत्सुख पूर्ण । प्रेमोत्कर्षमें हों बे-भान । भूले देश-काल भी पूर्ण । अपनेमें ही ॥ २९ ॥ तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥ भक्त केवल मेरा प्रेम-सुख चाहते हैं— हमको उन्हे जो कुछ देना था । उन्होने पहले ही पालिया था । हमारे दिये बिना कमाया था । फिर रहा क्या देनेको ॥ १३० ॥ उनका जो निश्चित पथ । उसके सम्मुख हे पार्थ । स्वर्ग-मोक्ष आदिके पथ । जैसी पगडंडियां ॥ ३१ ॥ अंगीकार किया उन्होंने प्रेम । दे देना है जो हमारा नियम । कर लिया उन्होंने वही काम । नाम लिया हमारा ॥ ३२ ॥ अनुदिन वह बढते जाये । कालकी दृष्टि नहीं पड पाये । इतना ही काम हमारे लिये । रहता है तब ॥ ३३ ॥ ऐसे मगन जो नित्य भजते प्रीति-पूर्वक । देता उन्हे बुद्धि योग जिससे मैं मिलूं उन्हे ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ३१०
अध्याय ७: ज्ञानविज्ञानयोग
ममता दृष्टिका आच्छादन कर । जैसे दौडती है माता धनुर्धर शिशुके पीछे सदा बद्ध होकर । रहता जो क्रीडारत ॥ ३४ ॥ शिशु जब जो जो खेल दिखाता । उसे स्वर्णमय करती माता । वैसे भक्तका प्रभुत्व बढाता । मैं उपासनामें ॥ ३५ ॥ उस उपासना पोषणसे । भक्त मिलन होगा मुझसे । देखता है इस भांतिसे । भाता है मुझे ॥ ३६ ॥ अजी ! भक्तकी मुझे है आस । उसकी एक-निष्ठाकी प्यास । प्रेमी भक्तोंका अकाल खास । रहता मेरे यहां ॥ ३७ ॥ स्वर्ग औ' मोक्षके पथ । छोड दिये उन्हींके हाथ । दिया तन लक्ष्मीके साथ । शेषके आधीन ॥ ३८ ॥ अपने पास केवल एक । रखा है निर्मल प्रेम-सुख । वह प्रेमियोंके लिये देख । किया जतन ॥ ३९ ॥ जैसे कहा मैंने अब तक । देखके अपनत्व नेक । लेते प्रेमियोंका प्रेम एक । जो शब्दसे परे ॥ ४० ॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥ मुझ आत्मामें ही प्रेम-भाव । जिन्होंने किया जीनेका ठाव । उसके बिना अन्य पांडव । सब है व्यर्थ ॥ ४१ ॥ ऐसे प्रिय तत्वज्ञोंके सम्मुख । कर्पूर मशाल हाथमें रख । चलता हूं मैं आगे आगे देख । राह दिखाते ॥ ४२ ॥ उनको अज्ञान रातमें । घिरे हुए घने तममें । दूर कर तम राहमें । करता नित्योदय ॥ ४३ ॥ अर्जुनको कृष्ण परब्रह्म होनेका भास --- प्रिय भक्तोंका प्रियतम । बोला जब पुरुषोत्तम । कहा अर्जुनने सप्रेम । मन हुआ शांत ॥ ४४ ॥ करुणा करके मैं ही हियमें रहके नित । तेजस्वी ज्ञान ज्योतीसे अज्ञान तम नाशता ॥ ११ ॥ ३११ विभूति-चिंतनयोग
अजी ! मुझे क्या सुना दिया । संसार तापसे दूर किया । जन्म-मरणसे है छुड़ाया । कृपाकर प्रभु ॥ ४५ ॥ यह नव-जन्म अपना । देखते अपने नयन । मेरे हाथ आया जीवन । मन भाया जो ॥ ४६ ॥ उज्ज्वल हुआ आज आयुष्य । हुआ दैव दशाका उदय । वाक्प्रसाद पाया हे सदय । दैव मुखसे ॥ ४७ ॥ तेरे वचनके प्रकाशसे । अंतर्बाह्य तम मिटनेसे । देखता हूं यथार्थ रूपसे । स्वरूप तेरा ॥ ४८ ॥ अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥ अजी ! वही है तू परब्रह्म । महाभूतोंका विश्राम-धाम । पवित्र तम अति परम । जगन्नाथ ॥ ४९ ॥ परम दैवत तू तीनोंका । पुरुष है तू पंचवीसका । दिव्य है तू प्रकृति भावका । परे है जो श्रेष्ठ ॥ १५० ॥ स्वामी तू है अनादि-सिद्ध । जन्म रहित जो प्रसिद्ध । हमने पाया अब शुद्ध । स्वरूप तेरा ॥ ५१ ॥ काल-यंत्रका तू सूत्रधार । जीवन कलाका कर्णधार । तू ही है ब्रह्मांडका आधार । जाना यह निश्चित ॥ ५२ ॥ आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥ यहां ओर ही एक भांति । आती है इसकी प्रतीति । ऋषियोंने भी इसी भांति । किया है वर्णन ॥ ५३ ॥ अर्जुनने कहा पवित्र तू पर-ब्रह्म श्रेष्ठ जो मोक्ष-धाम तू । आत्मा शाश्वत औ' दिव्य अजन्मा आदि औ' विभु ॥ १२ ॥ गाते हैं ऋषि जो सारे तथा असित देवल । व्यास नारद देवर्षि वैसे ही आपने कहा ॥ १३ ॥ ज्ञानेश्वरी ३१२
उन ऋषियोंने जो कहा था । अनुभवमें आयी सत्यता । कृपया आपने सुनाया था । इसीलिये अब ॥ ५४ ॥ आता था देव-ऋषि नारद । गाता था ऐसे बचन छंद । गानेका ही लेकर आनंद । खो देते थे अर्थ ॥ ५५ ॥ प्रकट हुए यदि भास्कर । अंधोंके ही गांवमें आकर । बिना उष्णताके तापकर । देखें प्रकाश कैसे ॥ ५६ ॥ सुन देवर्षि नारदका अध्यात्म-गान । उससे केवल नाद-माधुर्य ही सुन । चितसे न कर उसका सार-ग्रहण । छोड देते थे ॥ ५७ ॥ असित देवलके मुखसे । सुना है तेरा चरित्र ऐसे । किंतु चित्त विषय-विषसे । था अति ग्रस्त ॥ ५८ ॥ विषय-विष होता भयंकर । तीता विषय है अति मधुर । तथा परमार्थ होता मधुर । लगता तीता ही ॥ ५९ ॥ अजी ! औरोंका क्या कहना । भवनमें तेरा गुण गाना । व्यास देवका नित सुनाना । तेरा चरित्र श्रेष्ठ ॥ १६० ॥ अंधारमें चिंतामणि देखा । उपेक्षासे नहीं उठा सका । उजालेमें पहचान सका । ऐसे ही है यह ॥ ६१ ॥ वैसे व्यासादिकोंके वचन । मेरी भी जो चिद्रत्नोंकी खान । उपेक्षित पड़ी थी श्रीकृष्ण । बिना प्रकाशके ॥ ६२ ॥ सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । न हिते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥ फैले तेरे वाक्सूर्य किरण । ऋषि-वाक्योंका हुआ स्मरण । मिटा सब अपरिचितपन । तेरी कृपासे ॥ ६३ ॥ ज्ञान-बीज रूप थे उनके बोल । हृदय-भूमिमें जमे थे सकल । उसपे तेरी कृपाका यह ओल । संवाद फल आया ॥ ६४ ॥ मानता सत्य ये सारा स्वयं तू कहता मुझे । देव दानव कोयी भी तेरा रूप न जानते ॥ १४ ॥ (40) ३१३ विभूति-चिंतनयोग
अजी ! नारदादिक जो संत । उनकी उक्ति रूप सरिता । मैं महोदधि बना अनंत । संवाद सुखका ॥ ६५ ॥ मेरा अनेकानेक जन्म- । किया हुआ जो सत्कर्म । फला है यह अत्युत्तम । तू सद्गुरु रूप ॥ ६६ ॥ वैसे सुने थे वृद्धोंके वचन । सदैव तेरे ही गुण-वर्णन । हुई अब तेरी कृपा महान । तभी फले सब ॥ ६७ ॥ तभी भाग्य होता अनुकूल । उद्यम होते सब सफल । सुना था वह है जो सफल । हुआ गुरु कृपासे ॥ ६८ ॥ माली जिसमें जन्म बिताता । गाछ लगाकर जन्म देता । किंतु वसंतमें ही खिलता । अनायास ॥ ६९ ॥ जब विषम ज्वर उतरता । तभी रसनामें स्वाद आता । रसायन भी है जो फल देता । जब होता आरोग्य ॥ १७० ॥ वाचा श्रवण नयन प्राण । अनुभवते सार्थकपन । संचरता उसमें चेतन । तभी मात्र ॥ ७१ ॥ वैसे शब्दजातका अध्ययन । योगाभ्यासादि समस्त साधन । अपना कह सकते हैं जान । जब गुरु अनुकूल ॥ ७२ ॥ इस प्रतीतिके आनंदसे । नाचता अर्जुन निश्चयसे । कहता है हे देव ! कृष्णसे । तेरी बात मानी ॥ ७३ ॥ सच है यह कैवल्यपति । हुई मुझे त्रिशुद्ध प्रतीति । सुरासुर-नरादिकी मति । न जानती तुझे ॥ ७४ ॥ न सुनकर तेरा वचन । अपनेसे ही कर चिंतन । अशक्य है होना तेरा ज्ञान । हुआ मेरा निश्चय ॥ ७५ ॥ स्वयमेवात्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥ तू ही है अपने आप जानता पुरुषोत्तम । देव देव जगन्नाथ भूतेश-भूत भावन ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३१४
जीव स्व-सामर्थ्यसे ईश्वरको नहीं जान सकता— जैसे अपनी विशालता गगन । आप ही जानता संपूर्ण रूपेण । अथवा जैसे अपना हो सपना । जानती पृथ्वी ॥ ७६ ॥ वैसे अपनी सर्वशक्ति । जानता तू ही लक्ष्मीपति । यहां वेदादिककी मति । अकडती व्यर्थ ॥ ७७ ॥ दौडनेमें जीतना मनको । आंकना हाथसे पवनको । पार करना आदि शून्यको । कैसे संभव ॥ ७८ ॥ ऐसा है तुझे जानना । उसको कह सकना । असंभव तेरे बिना । अन्य किसीको ॥ ७९ ॥ तू ही जानता अपनी बात । कहनेमें भी तू ही समर्थ । देव ! मेरे माथे का तू आर्त- । पसीना पोंछ दे ॥ १८० ॥ सुना क्या यह भूत-भावन । त्रिभुवन-गज-पंचानन । सकल देव-देवतार्चन । जगन्नायक ॥ ८१ ॥ जानना चाहें तो तेरा बड़प्पन । उसके सम्मुख हम रजकण । यह जान हुए तो सलज्ज मौन । नहीं अन्य उपाय ॥ ८२ ॥ चहूँ ओर सरिता सागर भरा । किंतु चातक बेचारा रहा कोरा । स्वातीका बूंद ही उसका सहारा । वही उसका पानी ॥ ८३ ॥ वैसे गुरु है सर्वत्र चहूँ ओर । किंतु कृष्ण ! मुझे तेरा ही आधार । रहने दो यह वचन विस्तार । कहो विभूतियोग ॥ ८४ ॥ वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः । याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥ तेरी जो विभूति संपूर्ण । जिससे तू व्याप्त भुवन । कह तू दिव्य श्री कृष्ण । कृपा पूर्वक ॥ ८५ ॥ विभूति अपनी दिव्य मुझ अशेष तु कह । जिससे विश्व है सारा व्याप्त हो कर तू रहा ॥ १६ ॥ ३१५ विभूति-चिंतनयोग
विभूति जो यहां समस्त । लोगोंमें व्याप्त है अनंत । जो है प्रधान औ' विख्यात । कर तू प्रकट ॥ ८६ ॥ कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥ किस भांति जानूं तुझको । किस भांति गाऊं तुझको । विश्व रूप कहूँ तुझको । न होगा चिंतन ॥ ८७ ॥ अजी ! पीछे कहे जैसे । निज-भाव कहे वैसे । अभी सबिस्तर तैसे । कह तू एक बार ॥ ८८ ॥ किन भावोंका ले आधार । भजनेसे है सुखकर । कह वह मुझे सत्वर । विभूति-योग ॥ ८९ ॥ विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वंतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥ अर्जुनकी विभूति-विस्तार सुननेकी इच्छा— मैंने पूछा जो विभूति । वहि कहो भूतपति । पुनः इसकी पुनरुक्ति । करना क्या ॥ १९० ॥ ऐसी आवे तो भाव कल्पना । उसको जाने दो जनार्दन । मुझ जैसेको अमृत पान । ना न कहलाता ॥ ९१ ॥ कालकूटका जो सहोदर । मृत्यु भयसे पिये अपार । किंतु चतुर्वेश पुरंदर । होते जाते हैं ॥ ९२ ॥ ऐसा वह क्षीराब्धिका रस । उसमें है अमृतका बास । उसके जो माधुर्य मृष्टांश । नहीं छोडा जाता ॥ ९३ ॥ उस अल्पामृतकी यह महता । उस सामान्यकी वह मधुरता । यहां तेरा वचन परमामृत । कहना क्या ॥ ९४ ॥ योगेश जानूं मैं कैसे तुझे चिंतनमें नित । कौन कौन स्वरूपोंमें करूं मैं तब चिंतन ॥ १७ योग-विभूति-विस्तार कह तू अपना निज । सुनके न अघाता मैं वचनामृत पानसे ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३१६
मंदाराचलको न उतराना । क्षीर सागरको नहीं मथना । अनादि सिद्ध जो अमृत पीना । वह भी अनायास ॥ ९५ ॥ न है वह द्रव या बद्ध । न है वहां रस औ' गंध । वह मिलता नित्य-सिद्ध । स्मरते ही ॥ ९६ ॥ सुन कर होता निरास । निश्चित संसारका पाश । तथा आति नित्यता पास । अपने आप ॥ ९७ ॥ मिटती जन्म-मृत्युकी भाषा । भूल जाता सर्वस निःशेष । अंतर्बाह्य वह महा-सुख । बढ़ता जाता ॥ ९८ ॥ तथा दैवयोगसे होता सेवन । सेवनसे अमृत होता है प्राण । देता है स्वयं श्री कृष्ण भगवान । ना न कहता चित्त ॥ ९९ ॥ सहज भाता है चित्तको नाम । दर्शन होता रहता परम । तथा ज्ञान देता अमृतोपम । आनंद मगन हो ॥ २०० ॥ अनुभवता मैं कैसा सुख । कह न सकता परितोष । कथित कथन कृष्णमुख- । करता है आनंद ॥ १ ॥ आनादि भास्कर क्या बासी होता । अस्नात अग्नि अमंगल होता । नदी प्रवाह क्या पुराना होता । समय बीतनेसे ॥ २ ॥ सुन तेरे मंगल वचन । किया है नाद-ब्रह्म दर्शन । तथा कृष्णागरुके 'सुमन । बटोर लिये हैं ॥ ३ ॥ सुनकर पार्थके वचन । डुला कृष्णका अंतःकरण । कहता है भक्ति ज्ञान पूर्ण । सागर बना यह ॥ ४ ॥ प्रिय सखाके प्रेममें मस्त । उमड़ते स्नेहमें हो त्रस्त । कष्टसे संयत हो अनंत । बोलता क्या ॥ ५ ॥ भगवान उवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥ सुन मैं कहता दिव्य मुख्य मुख्य विभूतियां । मेरा विभूति-विस्तार न टूटता कभी कहीं ॥ १९ ॥ ३१७ विभूति-चिंतनयोग
भगवानकी अनंत विभूतियोंकी कल्पना— मैं हूँ पितामहका पिता । स्मरनेसे भी है भूलता । कहता बाबा पांडुसुत । अच्छा किया तूने ॥ ६ ॥ बाबा ! कहता वह अर्जुनको । इसमें विस्मय नहीं हमको । शिशु हो कहा नहीं क्या नंदको । बाबा ! उसने ॥ ७ ॥ यहांका प्रसंग है ऐसे । प्रेमोद्रेकमें होता वैसे । कृष्ण कहता अर्जुनसे । सुन धनंजय ॥ ८ ॥ तूने पूछा है मेरी विभूति । अनंत हैं वे सुभद्रापति । मेरी होकर भी मेरी मति । न जानती उन्हें ॥ ९॥ शरीरमें रोम हैं किती । जिसका उसे न गिनती । वैसी ही है मेरी विभूति । अनगिनत मुझे ॥ २१० ॥ वैसा भी मैं कैसा कितना । ज्ञान नहीं मुझे अपना । सबसे रूढ जो प्रधान । कहता हूं तुझे ॥ ११ ॥ जिनको जाननेसे हे पार्थ । सभी जान लिया होता । बीज जब हाथमें है आता । आया वृक्ष जैसा ॥ १२ ॥ या स्वाधीन होनेसे उपवन । आते सभी वृक्ष फल सुमन । वैसे जान लिया कर चिंतन । आता चित्तमें विश्व ॥ १३ ॥ वैसे सच ही है धनुर्धर । अनंत है जो मेरा विस्तार । आकाशका जो महा विस्तार । छिप जाता मुझमें ॥ १४ ॥ अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥ कुंतलालक मस्तक सुन । धनुर्वेद त्र्यंबक अर्जुन । बसा मैं हियमें आत्मा बन । भूतमात्रके ॥ १५ ॥ अंदर भी मैं हूँ अंतःकरणमें । बाहर भी मैं आवरण रूपमें । मैं ही हूँ आदिमें तथा निर्वाणमें । मैं मध्यमें भी ॥ १६ ॥ हियमें सबके मैं हूँ बसता आत्म रूपसे । मैं आदि भूत मात्रोंको मध्य मैं और अंत भी ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी ३१८
जैसे मेघ तलमें गगन । अंदर बाहर सूक्ष्म स्थान । आकाशमें इनका जनन । रहना भी वही ॥१७॥ फिर ये सब लय हो जाते । अकाश ही बनके रहते । वैसे आदि अंत लय होते । भूतमात्र मुझमें ॥ १८ ॥ ऐसा विविध व्यापक पन । मेरा विभूति विस्तार जान । जीवका कर तू अब कान । सुन जो सुना था ॥ १९ ॥ अब भी मेरी वे जो विभूति । सुनना है क्या सुभद्रापति । पुनरुक्ति करता सप्रीति । प्रधान रूपसे ॥ २२० ॥ आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् । मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥ भगवानकी प्रधान ऐसी पिचत्तर विभूतियां — यह कह बोला प्रेममें । मैं हूं विष्णु आदित्योंमें । तथा सूर्य ज्योतिर्वंतोंमें । जो है रश्मिवंत ॥ २१ ॥ मरीचि मैं मरुतोंमें । चंद्र मैं तारागणोंमें । बोले श्रीकृष्ण रणमें । गगन रंगके ॥ २२ ॥ वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानांमस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥ वेदोंमें मैं सामवेद । कहता वह गोविंद । देवोंमें मरुद्बंधु । महेंद्र हूँ मैं ॥ २३ ॥ इंद्रियोंमें मैं हूँ मन । जो है ग्यारहवा जान भूतमात्रोंमें चेतन । स्वभावसे मैं ॥ २४ ॥ आदित्योंमें महा विष्णु सूर्य मैं ज्योतिमानमें । मरीचि मुख्य वायुमें नक्षत्रोंमें शशांक मैं ॥ २१ ॥ मैं सामवेद वेदोंमें देवोंमें देव-राज मैं । मन हूँ इंद्रियोंमें मैं चेतना भूत-मात्रमें ॥ २२ ॥ ३१९ विभूति-चिंतनयोग
रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् । वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥ मैं हूँ रुद्रोंमें शंकर । कामसे जिसका वैर । निःसंशय धनुर्धर । निष्भ्रांत मान तू ॥ २५ ॥ यक्ष-रक्ष गणमें विख्यात । शंभुका मित्र जो धनवंत । वह कुबेर मैं हूँ अनंत । कहने लगा ॥ २६ ॥ वैसे ही मैं वसुओंमें । अग्नि हूँ जान मनमें । सर्वोव्य मैं शिखरोंमें । मेरू हूं गिरीश जो ॥ २७ ॥ पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिं । सेनानिनामहं स्कंदः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥ महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥ स्वर्ग सिंहासन सहायक । सर्वश्रेष्ठ सर्वज्ञ जो नेक । पुरोहित स्वर्गका प्रमुख । मैं वह बृहस्पति ॥ २८ ॥ त्रिभुवनका श्रेष्ठ सेनापति । कहलाता स्कंद जो महामति । अग्नि कृत्तिका जान जो विभूति । शिव वीर्य से ॥ २९ ॥ विश्वके सकल सरोवरमें । जल राशिमें समुद्र रूपमें । तपोराशि हूँ मैं महर्षियोंमें । कहलाता भृगु मुनि ॥ ३० ॥ सकल अक्षरोंमें जो है श्रेष्ठ । जहां सत्योत्कर्ष परमोत्कट । ज्ञानी जन जिससे एक निष्ठा । वह ओंकार मैं हूँ ॥ ३१ ॥ कुबेर यक्ष रक्षोंमें रुद्रोंमें मैं सदाशिव । मेरू मैं गिरि-मालामें अग्नि मैं वसु वर्गमें ॥ २३ ॥ बृहस्पति मुझे जान पुरोहित प्रधान जो । स्कंद सेनाधिपोंमें मैं समुद्र जल-राशिमें ॥ २४ ॥ मैं एकाक्षर वाणीमें भृगु मैं ऋषि-वृंदमें । जप हूं सब यज्ञोंमें स्थावरोंमें हिमालय ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३२०
जो है समस्त यज्ञोंमें । जपयज्ञ मैं लोकमें । कर्म-त्याग प्रणवादिमें । नित्य होता ॥ ३२ ॥ अजी ! जप यज्ञ जो परम । बांध न सकते यज्ञादि कर्म । नामसे पावन धर्म-अधर्म । परब्रह्म वेदार्थ ॥ ३३ ॥ स्थावरोंमें जो पर्वत । पुण्य रूप रहा स्थित । पुण्य-पुंज हिमवंत । मैं हूँ जान तू ॥ ३४ ॥ अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् देवर्षीणां च नारदः । गंधर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलोमुनिः ॥ २६ ॥ उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेंद्राणाम् नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥ कल्पद्रुम औ' पारिजात । गुणमें चंदन है ख्यात । फिर भी वृक्षोंमें अश्वत्थ । मेरी विभूति है ॥ ३५ ॥ देवऋषियोंमें मुझे पार्थ । जानना तू नारद यथार्थ । तथा गंधर्वोंमें चित्ररथ । मुझे ही जान ॥ ३६ ॥ सभी सिद्धोंमें महासिद्ध । कपिलाचार्य जो प्रबुद्ध । तुरंगोंमें जो हैं प्रसिद्ध । उच्चैःश्रव मैं ॥ ३७ ॥ गजोंमें मैं हूं राज-भूषण । ऐरावत स्वर्ग-भूषण । पय-राशि कर मंथन । निकाला अमृतांश ॥ ३८ ॥ यहां मैं नरोंमें जो राजा । विभूति विशेष सहज । जन कहलाते हैं प्रजा । जिसकी सब ॥ ३९ ॥ अश्वत्थ सब वृक्षोंमें देवर्षि बोच नारद । चित्ररथ गंधर्वों में सिद्धोंमें कपिलमुनि ॥ २६ ॥ उच्चैश्रवा अश्वोंमें मैं निकला जो अमृतसे । ऐरावत गजेंद्रोंमें नरोंमें मैं नराधिप ॥ २७ ॥ ३२१ विभूति-चिंतनयोग (41)
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । प्रजनश्चास्मि कंदर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥ अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥ वज्र हूँ मैं हथियारोंमें । पकड़ता इंद्र करमें । जो शतमख करनेमें । होता है उत्तीर्ण ॥ ४० ॥ धेनुओंमें मैं कामधेनु । कहता कृष्ण भगवान । जन्मदात्रोंमें मैं मदन । जान तू यह ॥ ४१ ॥ सर्प कुलका अधिष्ठाता । वासुकि हूँ मैं कुंति-सुत । नागोंमें जो कहलाता । वह अनंत मैं हूँ ॥ ४२ ॥ जलराशी में पांडुसुत । पश्चिम प्रमदाका कांत । कहता है देवकी सुत । मैं हूँ वरुण ॥ ४३ ॥ तथा पितृगणोंमें समस्त । जो है अर्यमा पितृ-देवता । वह मैं ही यह तत्वता । जान तू अर्जुन ॥ ४४ ॥ जगका कर शुभाशुभ लेखन । तथा प्राणियोंके मनका दर्शन । तदनुरूप करते नियमन । पाप-पुण्य फलका ॥ ४५ ॥ उन नियमितोंमें यम । सर्व साक्षी रूप मैं धर्म । कहता यह आत्माराम । मैं हूँ वह ॥ ४६ ॥ प्रल्हादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् मृगानां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥ मैं कामधेनु गायोंमें शस्त्रोंमें वज्र मैं रहा । उत्पत्ति हेतु मैं काम मैं सर्पोत्तम वासुकी ॥ २८ ॥ मैं हूँ वरुण पानीमें नागोंमें शेष-नाग मैं । पितरोंमें अर्यमा हूँ यम संयम-कारक ॥ २९ ॥ मैं हूँ प्रह्लाद दैत्योंमें काल हूँ गणितज्ञमें । मृगोंमें मैं मृगराज पक्षियोंमें खगेंद्र हूँ ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी ३२२
दानव कुल तिलक। भक्त प्रल्हाद मैं नेक। आसुरी गुणोंमें देख। न हुआ जो लिप्त ॥ ४७ ॥ ग्रासनेमें मैं महाकाल। कहता है वह गोपाल। श्वापदोंमें मैं शार्दूल। जान तू यह ॥ ४८ ॥ पक्षि-जातिमें तू सुन। गरुड हूं मैं अर्जुन। तभी तो वह आसन। हो सका मेरा ॥ ४९ ॥ पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥ पृथिवीका है जो पसारा। क्षण भरमें धनुर्धर। उङ्घाण जो सप्तसागर। करते रहते ॥ २५० ॥ ऐसे रहते जो गतिवंत। उनमें पवन मैं पांडुसुत। शस्त्र-धारियोंमें जो हैं समस्त। श्रीराम मैं हूं ॥ ५१ ॥ पक्ष लेके संकटग्रस्त धर्मका। सहारा मात्र अपने धनुष्यका। मोड़ लिया मुख विजय लक्ष्मीका। जिसने अपनी ओर ॥ ५२ ॥ चढ़कर पर्वत मस्तक सुवेली। प्रताप लंकेश्वरकी मस्तकावली। आकाशस्त भूतोंको दी हस्त-बलि। जो चीखते थे ॥ ५३ ॥ बढाया उन्होंने देवोंका मान। किया धर्मका जीर्णोद्धार जान। जनमा सूर्यवंशको महान। मानो सूर्य रूप ही ॥ ५४ ॥ ऐसा जो धनुर्बाण हस्त। रामचंद्र मैं सीता-कांत। तथा मकर पुच्छवंत। मैं हूं जलचरोंमें ॥ ५५ ॥ अजी ! जान तू सकल जल ओघ। उसमें भगीरथकी लायी गंगा। उसको निगले जन्हुकी जांघ। फाड आयी जो ॥ ५६ ॥ वह त्रिभुवनैक सरिता। जाह्नवी है सुन पांडुसुत। जल प्रवाहोंमें समस्त। मेरी विभूति है ॥ ५७ ॥ राम मैं शस्त्र-वीरोंमें वायु मैं वेगवानमें। मत्स्योंमें मैं बना नक्र नदियोंमें गंगा नदी ॥ ३१ ॥ ३२३ विभूति-चिंतनयोग
ऐसी मेरी विभूति अनेक । उनका नाम लूं मैं एकेक । बीतेंगे सहस्र जन्म देख । सुननेमें ही ॥ ५८ ॥ सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥ अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥ नक्षत्र चुनना आकाशके पूर्ण । ऐसी अपेक्षा जब करेगा मन । तब पोटलीमें बांधना गगन । यही है अच्छा ॥ ५९ ॥ यदि पृथ्वीके परमाणु गिनना । तो पृथ्वीको ही बगलमें दबाना । वैसा विस्तार यदि मेरा जानना । तो मेरे ही ज्ञानसे ॥ २६० ॥ जैसे शाखाओंके फूल फल । बटोरना चाहे तो सकल । उखाडना वृक्ष सहमूल । लेना हाथमें ॥ ६१ ॥ वैसी मेरी विभूति विशेष । जानना चाहे यदि अशेष । मेरा स्वरूप एक निर्दोष । जानना होगा ॥ ६२ ॥ अन्यथा भिन्न भिन्न विभूति । कहूँ कितनी सुभद्रापति । एक बातमें ही जान महामति । मैं हूँ सर्वस्व ॥ ६३ ॥ मैं हूं संपूर्ण सृष्टिमें । अजी ! आदि मध्यांतमें । होते हैं जैसे पटमें । तंतु ही तंतु ॥ ६४ ॥ व्यापक ऐसे मुझे जानना । विभूति-भेद है क्या करना । तुझमें योग्यताका न होना । सो कहना पड़ा ॥ ६५ ॥ या तूने पूछ लिया है पार्थ । इसीलिये कहता विस्तृत । विद्याओंमें जान तू प्रस्तुत । मैं हूँ आत्म-विद्या ॥ ६६ ॥ आदि मध्य तथा अंत मैं चराचर सृष्टिका । विद्यामें आत्म-विद्या मैं वादिका तत्व-वाद मैं ॥ ३२ ॥ मैं हूँ द्वंद्व समासोंमें अक्षरोंमें अकार मैं । मैं ही अक्षय जो काल विश्वकर्ता विराट् स्वयम् ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ३२४
वाद जो है बोलनेवालोंमें । जान तू वह हूँ मैं संक्षेपमें । कभी न आते एक मतमें । जिससे शास्त्र ॥ ६७ ॥ विषय-निश्चयमें जो बढता । सुनके तर्कका जोर चढता । तथा वाणीका रस है बढता । औ' होता मधुर भाषण ॥ ६८ ॥ ऐसे प्रतिपादनमें वाद । कहता है मैं ही हूँ गोविंद । औ' अक्षरोंमें जो विशद् । वह अकार मैं हूँ ॥ ६९ ॥ वैसे समासमें अर्जुन । द्वंद्व समास मैं हूँ जान । करता जो सर्व भक्षण । वह काल मैं हूँ ॥ २७० ॥ जिसमें मेरु मंदार सहित । पृथिवी भी हो जाती द्रवित । उस एकार्णवको भी जो पार्थ । पचाता अपनेमें ॥ ७१ ॥ उस प्रलय तेजको भी ग्रासता । तथा महा अनिलको निगलता । आकाशको भी अपनेमें समाता । धनंजय ॥ ७२ ॥ ऐसा है जो असीम काल । मैं हूँ कहता है गोपाल । सृजता विश्व जो निर्मल । वह ब्रह्मा मैं हूँ ॥ ७३ ॥ मृत्युः सर्व हरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् । कीर्तिः श्रीवाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४॥ तथा उत्पन्न भूतोंका धारण । सबका जीवन भी संपूर्ण । अंतमें सबको देता मरण । वह भी मैं हूँ ॥ ७४ ॥ स्त्री जातिमें अर्जुन । सात मेरी है सुन । कहता वह कौन । सकौतुक ॥ ७५ ॥ सुन नित्य नूतन कीर्ति । अर्जुन वह मेरी मूर्ति । तथा स-औदार्य संपत्ति । मैं हूँ जान ॥ ७६ ॥ तथा वह है जो वाणी । न्याय सुआसन वासिनी । औ' विवेक-पथ गामिनी । मेरा ही रूप ॥ ७७ ॥ सर्व नाशक मैं मृत्यु जन्म भी मैं भविष्यका । वाणी श्री कीर्ति नारीमें क्षमा मेधा धृति स्मृति ॥ ३४॥ ३२५ विभूति-चिंतनयोग
देख विश्वका पदार्थ । देता मेरा यथार्थ । ज्ञान जो है वह पार्थ । स्मृति मैं विशुद्ध ॥ ७८ ॥ स्वहितके अनुकूल । मेधा हूं मैं जो निर्मल । त्रिभुवन धृति-शील । तथा क्षमा मैं ॥ ७९ ॥ नारि जातिमें सात । शक्तियां हैं जो पार्थ । मैं हूं कही है बात । श्रीकृष्णने यह ॥ २८० ॥ बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥ वेद-राशिमें बृहत्साम । मैं हूं सुन तू प्रियोत्तम । कहता है पुरुषोत्तम । धनंजयसे ॥ ८१ ॥ छंदमें गायत्री छंद । मेरा स्वरूप है विशद । जान यह अप्रमाद । अर्जुन तू ॥ ८२ ॥ मासोंमें जो मगसिर । जान यह धनुर्धर । ऋतुमें कुसुमाकर । वसंत मैं हूं ॥ ८३ ॥ द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्वं सत्ववतामहम् ॥३६॥ वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पांडवानां धनंजयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥ कपट कारस्थानमें द्यूत । मैं हूं जान यह पांडुसुत । तभी चौरस्तेका है प्रशस्त । चलता यह चौर्य ॥ ८४ ॥ तेजस्वियोंका तेज निश्चय । मैं ही हूं जान तू धनंजय । कार्योद्देश्यमें जो है विजय । वह भी मैं हूं ॥ ८५ ॥ गायत्री सब छंदोंमें मैं बृहत्साम साममें । मैं मार्गशीर्ष मासोंमें ऋतुओंमें वसंत मैं ॥ ३५ ॥ द्यूत मैं छलियोंमें हूं तेज तेजस्विका बना । सत्व मैं सात्विकोंमें हूँ जय मैं व्यवसायमें ॥ ३६ ॥ मैं वासुदेव वृष्णीमें पांडवोंमें धनंजय । मुनियोंमें मुनी व्यास कविमें उशना कवि ॥ ३७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३२६
उद्योगमें जो है धनंजय । उद्योगसे दीखता है न्याय । मेरा रूप यह यदुराय । कहता है ॥ ८६ ॥ सत्व है जो सत्वस्थमें । कृष्ण है यदुवंशमें । तथा श्री संपन्नतामें । मैं हूं जान ॥ ८७ ॥ वसुदेव देवकीसे मैं उत्पन्न । कुमारि स्थानमें गोकुल गमन । प्राणोसह चूस लिय मैंने स्तन । पूतनाके ॥ ८८ ॥ मिटा नहीं था अभी कौमार्य । किया अदानव सृष्टिकार्य । गिरिधर बन कूता आर्य । इंद्रकी महिमा ॥ ८९ ॥ मिटाया कालिंदी-हृदय शूल । बचा लिया ज्वाला ग्रस्त गोकुल । बनाया मैने ब्रह्माको पागल । बछडे बनाके ॥ २९० ॥ होते ही बाल्यका प्रभात । कंसादि प्रचंड अत्यंत । मिटाये दुष्ट जो ज्वलंत । सहज लीलासे ॥ ९१ ॥ कहना मेरा कार्य कितना । तूने स्वयं देखा है अर्जुन । यादवोंमें श्रीकृष्ण जानना । मेरा रूप ॥ ९२ ॥ पांडव जो हैं सोम वंशस्थ । उनमें मैं अर्जुन हूं पार्थ । हमारा प्रेम भाव विध्वस्थ । कभी न टूटता ॥ ९३ ॥ नहीं तो विचार कर देख अर्जुन । संन्यासी हो चूराई तूने बहन । किंतु विकल्प न हुआ मेरा मन । क्यों कि हम एक हैं ॥ ९४ ॥ मुनियोंमें मैं व्यासराय । मैं कहता है यादवराय । तथा मैं हूं उषनाचार्य । कवीश्वरोंमें ॥ ९५ ॥ दंडो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥ चींटीसे ब्रह्मतक समान । चलता है जो सुनियमन । उसमें अनिवार्य शासन । मैं हूं पार्थ ॥ ९६ ॥ दंड मैं दमवंतोंमें धर्म मैं विजयर्थिका । ज्ञान हूँ ज्ञानियोंमें में गूढोंमें श्रेष्ठ मौन हूँ ॥ ३८ ॥ ३२७ विभूति-चिंतनयोग