ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउद्योगमें जो है धनंजय । उद्योगसे दीखता है न्याय । मेरा रूप यह यदुराय । कहता है ॥ ८६ ॥ सत्व है जो सत्वस्थमें । कृष्ण है यदुवंशमें । तथा श्री संपन्नतामें । मैं हूं जान ॥ ८७ ॥ वसुदेव देवकीसे मैं उत्पन्न । कुमारि स्थानमें गोकुल गमन । प्राणोसह चूस लिय मैंने स्तन । पूतनाके ॥ ८८ ॥ मिटा नहीं था अभी कौमार्य । किया अदानव सृष्टिकार्य । गिरिधर बन कूता आर्य । इंद्रकी महिमा ॥ ८९ ॥ मिटाया कालिंदी-हृदय शूल । बचा लिया ज्वाला ग्रस्त गोकुल । बनाया मैने ब्रह्माको पागल । बछडे बनाके ॥ २९० ॥ होते ही बाल्यका प्रभात । कंसादि प्रचंड अत्यंत । मिटाये दुष्ट जो ज्वलंत । सहज लीलासे ॥ ९१ ॥ कहना मेरा कार्य कितना । तूने स्वयं देखा है अर्जुन । यादवोंमें श्रीकृष्ण जानना । मेरा रूप ॥ ९२ ॥ पांडव जो हैं सोम वंशस्थ । उनमें मैं अर्जुन हूं पार्थ । हमारा प्रेम भाव विध्वस्थ । कभी न टूटता ॥ ९३ ॥ नहीं तो विचार कर देख अर्जुन । संन्यासी हो चूराई तूने बहन । किंतु विकल्प न हुआ मेरा मन । क्यों कि हम एक हैं ॥ ९४ ॥ मुनियोंमें मैं व्यासराय । मैं कहता है यादवराय । तथा मैं हूं उषनाचार्य । कवीश्वरोंमें ॥ ९५ ॥ दंडो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥ चींटीसे ब्रह्मतक समान । चलता है जो सुनियमन । उसमें अनिवार्य शासन । मैं हूं पार्थ ॥ ९६ ॥ दंड मैं दमवंतोंमें धर्म मैं विजयर्थिका । ज्ञान हूँ ज्ञानियोंमें में गूढोंमें श्रेष्ठ मौन हूँ ॥ ३८ ॥ ३२७ विभूति-चिंतनयोग