ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसारासार कर निर्णय । धर्म-ज्ञानका जो निश्चय । सभी शास्त्रोंमें धनंजय । मैं हूँ नीति शास्त्र ॥ ९७ ॥ सब गुह्योंमें अर्जुन । मौन है अति महान । गूँगोंके सम्मुख जान । होता अज्ञानी ब्रह्म ॥ ९८ ॥ अजी ! मैं हूँ ज्ञानियोंमें । श्रेष्ठ है जो जगतमें । ज्ञान जान तू इसमें । अंत नहीं पार्थ ॥ ९९ ॥ यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान् मया भूतं चराचरं ॥ ३९ ॥ नांतोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । एषतूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥ अजी ! पर्जन्यकी धार । गिनेगा क्या धनुर्धर । या पृथ्वीके तृणाँकुर । होंगे क्या गिनके ॥ ३०० ॥ लहरें क्या महा सागरकी । किसीने कभी क्या गिननेकी । मेरी अनंत विभूतियोंकी । कहूँ कैसा ॥ १ ॥ फिर भी पचत्तर प्रधान । विभूतियां तुझसे अर्जुन । ऊपर ऊपरकी तू जान । कहीं तुझसे ॥ २ ॥ मेरे विभूति-विस्तारका कहीं । आदि अंत यहां कुछ भी नहीं । तभी तू सुनेगा कितनी यहीं । और मैं कहूँगा कितनी ॥ ३ ॥ इसीलिये एक वाक्यमें तुझ । मर्म कहता हूँ अब मैं निज । तभी तू सब भूतांकुर-बीज । जान मुझको ही ॥ ४ ॥ तभी छोटा बडा न मानना । नीच उच्च भावको तजना । भूतमात्रमें मुझे देखना । सम भावसे ॥ ५ ॥ वैसे ही सब भूतोंका मुझको बीज जान तू । बिना मेरे नहीं कोई कहीं भी कुछ भी यहां ॥ ३९ ॥ नहीं अंत कभी आता मेरी दिव्य समृद्धिका । तो भी विभूति विस्तार मैंने जो अल्पमें कहा ॥ ४० ॥ ज्ञानेश्वरी ३२८