भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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दानव कुल तिलक। भक्त प्रल्हाद मैं नेक। आसुरी गुणोंमें देख। न हुआ जो लिप्त ॥ ४७ ॥ ग्रासनेमें मैं महाकाल। कहता है वह गोपाल। श्वापदोंमें मैं शार्दूल। जान तू यह ॥ ४८ ॥ पक्षि-जातिमें तू सुन। गरुड हूं मैं अर्जुन। तभी तो वह आसन। हो सका मेरा ॥ ४९ ॥ पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥ पृथिवीका है जो पसारा। क्षण भरमें धनुर्धर। उङ्घाण जो सप्तसागर। करते रहते ॥ २५० ॥ ऐसे रहते जो गतिवंत। उनमें पवन मैं पांडुसुत। शस्त्र-धारियोंमें जो हैं समस्त। श्रीराम मैं हूं ॥ ५१ ॥ पक्ष लेके संकटग्रस्त धर्मका। सहारा मात्र अपने धनुष्यका। मोड़ लिया मुख विजय लक्ष्मीका। जिसने अपनी ओर ॥ ५२ ॥ चढ़कर पर्वत मस्तक सुवेली। प्रताप लंकेश्वरकी मस्तकावली। आकाशस्त भूतोंको दी हस्त-बलि। जो चीखते थे ॥ ५३ ॥ बढाया उन्होंने देवोंका मान। किया धर्मका जीर्णोद्धार जान। जनमा सूर्यवंशको महान। मानो सूर्य रूप ही ॥ ५४ ॥ ऐसा जो धनुर्बाण हस्त। रामचंद्र मैं सीता-कांत। तथा मकर पुच्छवंत। मैं हूं जलचरोंमें ॥ ५५ ॥ अजी ! जान तू सकल जल ओघ। उसमें भगीरथकी लायी गंगा। उसको निगले जन्हुकी जांघ। फाड आयी जो ॥ ५६ ॥ वह त्रिभुवनैक सरिता। जाह्नवी है सुन पांडुसुत। जल प्रवाहोंमें समस्त। मेरी विभूति है ॥ ५७ ॥ राम मैं शस्त्र-वीरोंमें वायु मैं वेगवानमें। मत्स्योंमें मैं बना नक्र नदियोंमें गंगा नदी ॥ ३१ ॥ ३२३ विभूति-चिंतनयोग

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