ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । प्रजनश्चास्मि कंदर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥ अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥ वज्र हूँ मैं हथियारोंमें । पकड़ता इंद्र करमें । जो शतमख करनेमें । होता है उत्तीर्ण ॥ ४० ॥ धेनुओंमें मैं कामधेनु । कहता कृष्ण भगवान । जन्मदात्रोंमें मैं मदन । जान तू यह ॥ ४१ ॥ सर्प कुलका अधिष्ठाता । वासुकि हूँ मैं कुंति-सुत । नागोंमें जो कहलाता । वह अनंत मैं हूँ ॥ ४२ ॥ जलराशी में पांडुसुत । पश्चिम प्रमदाका कांत । कहता है देवकी सुत । मैं हूँ वरुण ॥ ४३ ॥ तथा पितृगणोंमें समस्त । जो है अर्यमा पितृ-देवता । वह मैं ही यह तत्वता । जान तू अर्जुन ॥ ४४ ॥ जगका कर शुभाशुभ लेखन । तथा प्राणियोंके मनका दर्शन । तदनुरूप करते नियमन । पाप-पुण्य फलका ॥ ४५ ॥ उन नियमितोंमें यम । सर्व साक्षी रूप मैं धर्म । कहता यह आत्माराम । मैं हूँ वह ॥ ४६ ॥ प्रल्हादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् मृगानां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥ मैं कामधेनु गायोंमें शस्त्रोंमें वज्र मैं रहा । उत्पत्ति हेतु मैं काम मैं सर्पोत्तम वासुकी ॥ २८ ॥ मैं हूँ वरुण पानीमें नागोंमें शेष-नाग मैं । पितरोंमें अर्यमा हूँ यम संयम-कारक ॥ २९ ॥ मैं हूँ प्रह्लाद दैत्योंमें काल हूँ गणितज्ञमें । मृगोंमें मैं मृगराज पक्षियोंमें खगेंद्र हूँ ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी ३२२