ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो है समस्त यज्ञोंमें । जपयज्ञ मैं लोकमें । कर्म-त्याग प्रणवादिमें । नित्य होता ॥ ३२ ॥ अजी ! जप यज्ञ जो परम । बांध न सकते यज्ञादि कर्म । नामसे पावन धर्म-अधर्म । परब्रह्म वेदार्थ ॥ ३३ ॥ स्थावरोंमें जो पर्वत । पुण्य रूप रहा स्थित । पुण्य-पुंज हिमवंत । मैं हूँ जान तू ॥ ३४ ॥ अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् देवर्षीणां च नारदः । गंधर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलोमुनिः ॥ २६ ॥ उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेंद्राणाम् नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥ कल्पद्रुम औ' पारिजात । गुणमें चंदन है ख्यात । फिर भी वृक्षोंमें अश्वत्थ । मेरी विभूति है ॥ ३५ ॥ देवऋषियोंमें मुझे पार्थ । जानना तू नारद यथार्थ । तथा गंधर्वोंमें चित्ररथ । मुझे ही जान ॥ ३६ ॥ सभी सिद्धोंमें महासिद्ध । कपिलाचार्य जो प्रबुद्ध । तुरंगोंमें जो हैं प्रसिद्ध । उच्चैःश्रव मैं ॥ ३७ ॥ गजोंमें मैं हूं राज-भूषण । ऐरावत स्वर्ग-भूषण । पय-राशि कर मंथन । निकाला अमृतांश ॥ ३८ ॥ यहां मैं नरोंमें जो राजा । विभूति विशेष सहज । जन कहलाते हैं प्रजा । जिसकी सब ॥ ३९ ॥ अश्वत्थ सब वृक्षोंमें देवर्षि बोच नारद । चित्ररथ गंधर्वों में सिद्धोंमें कपिलमुनि ॥ २६ ॥ उच्चैश्रवा अश्वोंमें मैं निकला जो अमृतसे । ऐरावत गजेंद्रोंमें नरोंमें मैं नराधिप ॥ २७ ॥ ३२१ विभूति-चिंतनयोग (41)