भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जैसे यहां सर्वत्र कहीं । जलके बिना कछु नहीं । वैसे विश्वमें जहां कहीं । मेरे बिन ना कछु ॥ १४ ॥ मुझे ऐसे व्यापक मान । भजन करते सर्व स्थान । ये उनके भजन पूजन । प्रकट है प्रेम-भावसे ॥ १५ ॥ देशकाल वर्तमान । मुझमें देख अभिन्न । जैसे वायु हो गगन । फिरता गगन में ॥ १६ ॥ ऐसे निज-ज्ञान संपन्न । हो विचरते त्रिभुवन । मुझको जगद्रूप मान । अंतः करणमें ॥ १७ ॥ जो जहां मिलता है भूत । उसीको माना भगवंत । यह भक्ति-योग निश्चित । मेरा जान ॥ १८ ॥ मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥ दो भक्तोंकी भेंट आनंद-महोत्सव है— अन्तःकरण मैं बना । प्राण भी मद्रूप बना । भूला है जीव मरण । बोध-मूलसे ॥ १९ ॥ फिर बोधके नशेमें । औ' संवादके सुखमें । नाचते लेने देनेमें । ज्ञानानंदके ॥ २० ॥ जैसे समीपके दो सरोवर । उमड आते जब परस्पर । बनाते तब तरंग ही घर । तरंगको वैसे ॥ २१ ॥ होता जब भक्तसे भक्तका मिलन । मानो आनंदसे आनंदका गुंफन । ज्ञानसे करता ज्ञानका ही भूषण । ज्ञानके लिये ॥ २२ ॥ सूर्यसे सूर्यकी आरती उतारना । चंद्रने चंद्रका आलिंगन करना । या-गंगा यमुनाका है मिलन होना । वैसे ही धनंजय ॥ २३ ॥ चित्त प्राण मुझे मान बोध देते परस्पर । मेरे कीर्तनमें नित्य रमते तुष्ट होकर ॥ ९ ॥ ३०९ विभूति-चिंतनयोग