भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जैसे मेघ तलमें गगन । अंदर बाहर सूक्ष्म स्थान । आकाशमें इनका जनन । रहना भी वही ॥१७॥ फिर ये सब लय हो जाते । अकाश ही बनके रहते । वैसे आदि अंत लय होते । भूतमात्र मुझमें ॥ १८ ॥ ऐसा विविध व्यापक पन । मेरा विभूति विस्तार जान । जीवका कर तू अब कान । सुन जो सुना था ॥ १९ ॥ अब भी मेरी वे जो विभूति । सुनना है क्या सुभद्रापति । पुनरुक्ति करता सप्रीति । प्रधान रूपसे ॥ २२० ॥ आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् । मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥ भगवानकी प्रधान ऐसी पिचत्तर विभूतियां — यह कह बोला प्रेममें । मैं हूं विष्णु आदित्योंमें । तथा सूर्य ज्योतिर्वंतोंमें । जो है रश्मिवंत ॥ २१ ॥ मरीचि मैं मरुतोंमें । चंद्र मैं तारागणोंमें । बोले श्रीकृष्ण रणमें । गगन रंगके ॥ २२ ॥ वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानांमस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥ वेदोंमें मैं सामवेद । कहता वह गोविंद । देवोंमें मरुद्बंधु । महेंद्र हूँ मैं ॥ २३ ॥ इंद्रियोंमें मैं हूँ मन । जो है ग्यारहवा जान भूतमात्रोंमें चेतन । स्वभावसे मैं ॥ २४ ॥ आदित्योंमें महा विष्णु सूर्य मैं ज्योतिमानमें । मरीचि मुख्य वायुमें नक्षत्रोंमें शशांक मैं ॥ २१ ॥ मैं सामवेद वेदोंमें देवोंमें देव-राज मैं । मन हूँ इंद्रियोंमें मैं चेतना भूत-मात्रमें ॥ २२ ॥ ३१९ विभूति-चिंतनयोग