भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 388

भगवानकी अनंत विभूतियोंकी कल्पना— मैं हूँ पितामहका पिता । स्मरनेसे भी है भूलता । कहता बाबा पांडुसुत । अच्छा किया तूने ॥ ६ ॥ बाबा ! कहता वह अर्जुनको । इसमें विस्मय नहीं हमको । शिशु हो कहा नहीं क्या नंदको । बाबा ! उसने ॥ ७ ॥ यहांका प्रसंग है ऐसे । प्रेमोद्रेकमें होता वैसे । कृष्ण कहता अर्जुनसे । सुन धनंजय ॥ ८ ॥ तूने पूछा है मेरी विभूति । अनंत हैं वे सुभद्रापति । मेरी होकर भी मेरी मति । न जानती उन्हें ॥ ९॥ शरीरमें रोम हैं किती । जिसका उसे न गिनती । वैसी ही है मेरी विभूति । अनगिनत मुझे ॥ २१० ॥ वैसा भी मैं कैसा कितना । ज्ञान नहीं मुझे अपना । सबसे रूढ जो प्रधान । कहता हूं तुझे ॥ ११ ॥ जिनको जाननेसे हे पार्थ । सभी जान लिया होता । बीज जब हाथमें है आता । आया वृक्ष जैसा ॥ १२ ॥ या स्वाधीन होनेसे उपवन । आते सभी वृक्ष फल सुमन । वैसे जान लिया कर चिंतन । आता चित्तमें विश्व ॥ १३ ॥ वैसे सच ही है धनुर्धर । अनंत है जो मेरा विस्तार । आकाशका जो महा विस्तार । छिप जाता मुझमें ॥ १४ ॥ अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥ कुंतलालक मस्तक सुन । धनुर्वेद त्र्यंबक अर्जुन । बसा मैं हियमें आत्मा बन । भूतमात्रके ॥ १५ ॥ अंदर भी मैं हूँ अंतःकरणमें । बाहर भी मैं आवरण रूपमें । मैं ही हूँ आदिमें तथा निर्वाणमें । मैं मध्यमें भी ॥ १६ ॥ हियमें सबके मैं हूँ बसता आत्म रूपसे । मैं आदि भूत मात्रोंको मध्य मैं और अंत भी ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी ३१८