ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह सुन कर अंधा धृतराष्ट्र अंतःकरणसे भी अंधा ही रहा— राजन् कहता है यहां अर्जुन । वह अद्वयानुभव वरण । संजयका शब्द कर श्रवण । स्तब्ध है धृतराष्ट्र ॥ २८ ॥ संजयका दुखी अंतःकरण । जैसे हैं इसके बाह्य नयन । वैसे ही अंधा है अंतःकरण । कहता संजय ॥ २९ ॥ किंतु वहां वह अर्जुन । बढाता है स्वहित मान । - दूसरा जागृत महान । संकल्प एक ॥ ३० ॥ सोचता यह हृदयानभव । बना लेना है नयनका भाव । बुद्धिमें हुआ इच्छाका उद्भव । सहज भावसे ॥ ३१ ॥ मेरे यही दोनों नयन । करें विश्व-रूप दर्शन । ळालसा हुई दैववान । सहज भावसे ॥ ३२ ॥ आज वह् है कल्पतरुकी शाख । उसकी इच्छा व्यर्थ न होती देख । जो जो कहेगा आज उसका मुख । सिद्ध करेगा दैव ॥ ३३ ॥ सुन कर प्रल्हादका बोल । प्रसन्न हुआ वन सकल । वह सद्गुरु मिला कुशल । अर्जुनको ॥ ३४ ॥ विश्वरूप दर्शनार्थ वैसे । पूछेगा अर्जुन श्रीकृष्णसे । कहूँगा कहता श्रोताओंसे । निवृत्तिदास ज्ञानदेव ॥ ३३५ ॥ गीता श्लोक ४२ ज्ञानेश्वरी ओवी ३३५.