ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११ विश्व-रूप-दर्शनयोग यह अध्याय शांत अद्भुत रसोंका प्रयागराज है— एकादश है इसके अनंतर । कथा भरी है दो रसोंका भंडार । वहां दर्शन करेगा धनुर्धर । विश्व-रूपका ॥ १ ॥ जहां शांत-रसके सदन । अद्भुत आया अतिथि -वत्त । मिला पंगतका बहुमान । अन्य रसोंको ॥ २ ॥ होता जब वधु-वरोंका मिलन । तब होता बारातियोंका सन्मान । वैसे मिला है देशीका सिंहासन । अन्य रसोंको भी ॥ ३ ॥ किंतु उत्तम जो शांत अद्भुत । जंचेंगे आखोंको कर तृप्त । जैसे हैं प्रेम-भावालिंगित । हरिहर दोनों ॥ ४ ॥ अथवा जैसे अमावासके दिन । करते हैं दोनों बिंब आलिंगन । वैसे दोनों रसोंका सम्मेलन । हुआ इस स्थलमें ॥ ५ ॥ मिले हैं गंगा-यमुनाके ओघ । वैसे रसोंका हुआ है प्रयाग । इसीलिये यहां सुस्नात जग । संपूर्ण-रूपसे ॥ ६ ॥ इसमें गीता-सरस्वती गुप्त । तथा ये दोनों रस-ओघ मूर्त । इसीलिये त्रिवेणी है उचित । सबको प्राप्त है ॥ ७ ॥