भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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सबको त्रिवेणी-स्नान सुलभ हो इसलिये देश-भाषाका घाट बांधा है— अजी ! यहां श्रवणके द्वारसे । तीर्थमें प्रवेश सुलभ हो ऐसे । करवाया है श्री गुरुने मुझसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ८ ॥ अजी ! संस्कृतका तीर है गहन । उसको देशीके ये शब्द सोपान । निर्माण कराये हैं धर्म-निधान । निवृत्तिनाथने ॥ ९ ॥ यहां करना सबको सद्भाव-स्नान । प्रयाग-माधव विश्व-रूप-दर्शन । तथा करना यहां संसार-तर्पण । तिलोदकका ॥ १० ॥ ऐसे हैं यह सावयव । स्वरूप लाये रस-भाव । औ' श्रवण-सुखका चाव । मिला विश्वको ॥ ११ ॥ यहां प्रत्यक्ष शांत-अद्भुत । अन्य रसोंको शोभा प्राप्त । साथ ही हुआ है मोक्ष-प्राप्त । स्पष्ट रूपसे ॥ १२ ॥ यह ग्यारहवां अध्याय है । वेदोंका जो विश्राम-धाम है । सुदैवियोंमें पार्थ श्रेष्ठ है। पहुंचा जो वहां ॥ १३ ॥ पार्थ वहां पहुंचा भला क्यों अकेला । जिसे माता है उसका हुवा सुकाल । गीता-भाव उभरा देशीमें सकल । इसी समय ॥ १४ ॥ संत जनोंसे कविकी विनय — मेरी बात यह इसीलिये । विनय करता सुन-लीजिये । जरासा ध्यानसे चित्त दीजिये । आप सज्जन ॥ १५ ॥ अजी ! यह है संतोंकी परिषद । ऐसा लगाव यहां अ-शोभास्पद । किंतु आपत्य बन आनंद-स्पंद । कहता मैं यह ॥ १६ ॥ आप ही पहले तोतेको पढाते । वह बोलता तब आप डुलते । या बच्चेसे नकल करा रीझते । माता पिता जैसे ॥ १७ ॥ वैसे जो जो कुछ मैं बोलता । प्रभु आपने ही सिखाया था । जो आपने ही जो है दिया था । सुनिये चित्त देकर ॥ १८ ॥ अजी ! गाछ है यह सारस्वतका । आपने ही जो लगाया था उसका । सिंचन कर अवधानामृतका । बढाया कीजिये ॥ १९ ॥ ३३३ विश्व रूप-दर्शनयोग