भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 404

रस-भाव तब पुष्प-सा खिलेगा । नाना अर्थ फल-भारसे फलेगा । आपके ही धर्मका सुकाल होगा । सारे जगतमें ॥ २० ॥ इस बातसे रीझ उठे सब संत । "भल कहा" कह कर हो प्रमुदित । अब कहो कृष्णार्जुनमें क्या बात । हुयी जो वहां ॥ २१ ॥ तब निवृत्तिदास कहता । कृष्णार्जुनकी मैं क्या जानता । सामान्य क्या मैं कह सकता । कहलाते सब आप ॥ २२ ॥ अजी ! जंगलका जो पात खाते । रावण पर वे विजय पाते । पार्थ अक्षोहिणी सैन्य जीतते । अकेले ही ॥ २३ ॥ तभी जो जो करते हैं समर्थ । चराचरमें होता वह सार्थ । मुझसे कहलाते हैं तदर्थ । संत जन आप ॥ २४ ॥ सुनिये अब यह बोल । गीता भावार्थके निर्मल । वैकुंठ-पतिके सरल । निकल मुखसे ॥ २५ ॥ धन्य धन्य वह ग्रंथ गीता । वेद-प्रतिपाद्य जो देवता । बना है श्रीकृष्ण महा-वक्ता । इस ग्रंथका ॥ २६ ॥ कैसे करें उस गौरवका वर्णन । न होता शिव-बुद्धिको भी आकलन । जीव-भावसे करना उसे वंदन । यही भला है ॥ २७ ॥

बुद्धिने जो स्वीकार किया उसको आंखोंसे देखनेकी इच्छा-अर्जुनका संकोच-

सुनिये अब वह किरीटी । विश्व-रूपपे रख दृष्टि । करने लगा है कैसे गोष्ठि । श्रीकृष्णसे ॥ २८ ॥ सकल ही है यह सर्वेश्वर । अनुभव है यह रुचिकर । होना यह नयनसे गोचर । प्रत्यक्ष रूपमें ॥ २९ ॥ आशा है यह अंतःकरणकी । विवंचना है कैसे कहनेकी । विश्व-रूपके महा-गुपितकी । अर्जुनको यहां ॥ ३० ॥ सोचता पीछे कभी कहीं । प्रिय-जनने पूछा नहीं । सहसा मैं इनको यहीं । पूछूं कैसे ? ॥ ३१ ॥ यद्यपि है हमारा स्नेह चांग । तो क्या लक्ष्मी मातासे अंतरंग । वह भी डरती ऐसा प्रसंग । पूछनेमें ॥ ३२ ॥

ज्ञानेश्वरी ३३४