ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 405, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंहमने सेवा की है बहुत नेक । किंतु क्या गरुड़से भी अधिक। इसमें वह भी न पूछता एक । चुपचाप बैठा है ॥ ३३ ॥ मैं क्या सनकादिकसे अधिक। वे भी झमेला करते न देख । मैं हूँ क्या गोपियोंसे भी भावुक । प्रिय-जन उन्हें ? ॥ ३४ ॥ उन प्रिय-जनोंको भी छकाया । दस गर्भ वास भी सहन किया । विश्व-रूप नहीं दिखाया । किसीको भी ॥ ३५ ॥ ऐसी यह गुपित बात । छिपायी जो हृदय-गत । पूछना क्या मुझे उचित । क्या कैसे ॥ ३६ ॥ यदि मैं यह प्रश्न नहीं पूछता । उसके बिन सुख नहीं मिलता । जान लेना भी संभव नहीं होता । यह बात कभी ॥ ३७ ॥ श्री कृष्णका भक्त-प्रेम— पूछें अब अल्पसी बात । फिर देखें हरिका मत । सोचकर हो भीति-युक्त । पूछता अर्जुन ॥ ३८ ॥ तब अर्जुनका यह भाव । सुन एक दो शब्दमें देख । दिखाता विश्व-रूप-वैभव । पूर्ण-रूपसे ॥ ३९ ॥ गाय जो बछडेको देखकर । ऊठ जाती है हडबडाकर । मुखमें ले स्तन चूसने पर । न स्त्रवेगी क्या दूध ? ॥ ४० ॥ जहां आता है पांडवोंका नाम । रक्षार्थ दौडना जिसका काम । पूछना अर्जुनका सप्रेम । सहेगा कैसे ? ॥ ४१ ॥ श्रीकृष्ण सहज प्रेमावतरण । अर्जुन प्रेम-नशाको उत्तेजन । समरस होनेमें यहां अभिन्न । भिन्नता भान विस्मय ॥ ४२ ॥ अर्जुनके बोलनेसे अब महज । कृष्ण विश्व-रूप दिखायेग सहज । ऐसा अद्भुत प्रसंग आया है आज । सुनियोगा ॥ ४३ ॥ ३३५ विश्व-रूप-दर्शनयोग