ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥ प्रभो तूने अपने हृदयका दर्शन दिया और — कृष्णसे फिर कहता अर्जुन । श्रीकृष्ण तूने मेरे ही कारण । वाच्य किया था जो गुह्य कथन । कृपा करके ॥ ४४ ॥ महाभूत जब ब्रह्ममें विलीन । जीव महदादि भी होते हैं लीन । अंतिम वह जो है विश्रांति-स्थान । आपका रूप ॥ ४५ ॥ अंतःकरणके वह भीतर । रखा था वेदोंसे भी छिपाकर । कहता है कृष्णसे धनुर्धर । कृपणके भांति ॥ ४६ ॥ वह तूने आज श्री नारायण । दिया है मुझे हृदय-दर्शन । उसपे शिवने अध्यात्म-ध्यान । किया न्योच्छावर ॥ ४७ ॥ ऐसी वस्तु तूने मुझे दी है । क्षण भी विलंब न किया है । यदि हम ऐसे कहते हैं । तो मैं भिन्न हूं क्या ? ॥ ४८ ॥ भंवरमें मैं महा-मोहके । डुबा था शिखा तक देखके । श्रीहरि तूने स्वयं कूदके । उभार लिया मुझे ॥ ४९ ॥ तुझ एक बिना देव कभी कहीं । विश्वमें अन्य वस्तुका नाम नहीं । किंतु देख यहां दुर्दैव है यही । मानते "हम हैं" भिन्न ॥ ५० ॥ विश्वमें मैं कोयी एक अर्जुन । धर ऐसा देहका अभिमान । तथा कौरवको यहां स्वजन । कहता था मैं ॥ ५१ ॥ इस पर भी मैं इन्हें मारूंगा । इसका पाप-भोगी भी बनूंगा । ऐसे दुःस्वप्न रत मुझे जगा- । दिया तूने कृष्ण ॥ ५२ ॥ अर्जुनने कहा करके करुणा मेरी कहा तूने रहस्य जो । उस अध्यात्म विद्यासे मेरा जो मोह था गया ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ३३६