भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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गंधर्व-नगरकी बस्ती । छोड़ निकला मैं लक्ष्मी-पति । प्याससे पानीका था मैं प्रार्थी । औ' पीता था मृगजल ॥ ५३ ॥ अजी ! वरूके सर्प-दंशसे । चढती विष-ल्हरियोंसे । त्रस्त जीवको मृत्यु-भयसे । उभार लिया देव ॥ ५४ ॥ अपना प्रतिबिंब न जानकर । कूपमें कूदना सिंह देखकर । उसको बचा लिया पकड़कर । मेरी रक्षा की ऐसी ॥ ५५ ॥ मुझपर अपार कृपा करके मेरी रक्षा की - अब-- नही तो मेरा यहां तक । निश्चय हुवा था तू देख । सप्त-सागर हुये एक । मिलकर ॥ ५६ ॥ या डूबने दो युग संपूर्ण । या टूटने दो यह गगन । लड़ेगा नहीं कभी अर्जुन । स्व-गोत्रजोंसे ॥ ५७ ॥ ऐसी अहंकार-उर्मियोंमें उन्मत्त । आग्रह जलमें डूबा था मैं अनंत । उठा लिया है तूने हो स्नेहार्द्र-चित्त । कौन था अन्य मेरा ॥ ५८ ॥ नहीं था यह एक-मात्र अर्जुन । वैसे दूसरेको नाम दे स्वजन । सवार हुवा ऐसा पागलपन । तूने बचा लिया देव ! ॥ ५९ ॥ पहले होना था जब हमारा दहन । भय था तब देह जल जानेका सुन । अब चैतन्य सह होना था दहन । बचा लिया तूने दोनो बार ॥ ६० ॥ हिरण्यासुर दुराग्रहमें भरकर । मेरी बुद्धि-भूको बगलमें दबाकर । मोहार्णव-सिंधुके गवाक्षसे अंदर । जा बैठा था ॥ ६१ ॥ तेरे ही बलसे मधुसूदन । विवेकने ले लिया है स्व-स्थान । वराहका पुनरावतरण । लेना पडा यह ॥ ६२ ॥ अपार कृपा है तेरी मुझ पर । एक वाचासे ही बोलूं क्यों कर । पंच-प्राण किये तूने न्योच्छावर । मुझपर देव ॥ ६३ ॥ कुछ भी वह व्यर्थ नहीं गया । उसमें संपूर्ण यश भी आया । देव ! मैं साद्यंत रूपसे माया- । रहित हुवा जी ॥ ६४ ॥ आनंद सरोवरके कमल । वैसे हैं तेरे नयन निर्मल । अपने प्रसादके हैं महल । बना लेते हैं ॥ ६५ ॥ (43) ३३७ विश्व-रूप-दर्शनयोग