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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

गंधर्व-नगरकी बस्ती । छोड़ निकला मैं लक्ष्मी-पति । प्याससे पानीका था मैं प्रार्थी । औ' पीता था मृगजल ॥ ५३ ॥ अजी ! वरूके सर्प-दंशसे । चढती विष-ल्हरियोंसे । त्रस्त जीवको मृत्यु-भयसे । उभार लिया देव ॥ ५४ ॥ अपना प्रतिबिंब न जानकर । कूपमें कूदना सिंह देखकर । उसको बचा लिया पकड़कर । मेरी रक्षा की ऐसी ॥ ५५ ॥ मुझपर अपार कृपा करके मेरी रक्षा की - अब-- नही तो मेरा यहां तक । निश्चय हुवा था तू देख । सप्त-सागर हुये एक । मिलकर ॥ ५६ ॥ या डूबने दो युग संपूर्ण । या टूटने दो यह गगन । लड़ेगा नहीं कभी अर्जुन । स्व-गोत्रजोंसे ॥ ५७ ॥ ऐसी अहंकार-उर्मियोंमें उन्मत्त । आग्रह जलमें डूबा था मैं अनंत । उठा लिया है तूने हो स्नेहार्द्र-चित्त । कौन था अन्य मेरा ॥ ५८ ॥ नहीं था यह एक-मात्र अर्जुन । वैसे दूसरेको नाम दे स्वजन । सवार हुवा ऐसा पागलपन । तूने बचा लिया देव ! ॥ ५९ ॥ पहले होना था जब हमारा दहन । भय था तब देह जल जानेका सुन । अब चैतन्य सह होना था दहन । बचा लिया तूने दोनो बार ॥ ६० ॥ हिरण्यासुर दुराग्रहमें भरकर । मेरी बुद्धि-भूको बगलमें दबाकर । मोहार्णव-सिंधुके गवाक्षसे अंदर । जा बैठा था ॥ ६१ ॥ तेरे ही बलसे मधुसूदन । विवेकने ले लिया है स्व-स्थान । वराहका पुनरावतरण । लेना पडा यह ॥ ६२ ॥ अपार कृपा है तेरी मुझ पर । एक वाचासे ही बोलूं क्यों कर । पंच-प्राण किये तूने न्योच्छावर । मुझपर देव ॥ ६३ ॥ कुछ भी वह व्यर्थ नहीं गया । उसमें संपूर्ण यश भी आया । देव ! मैं साद्यंत रूपसे माया- । रहित हुवा जी ॥ ६४ ॥ आनंद सरोवरके कमल । वैसे हैं तेरे नयन निर्मल । अपने प्रसादके हैं महल । बना लेते हैं ॥ ६५ ॥ (43) ३३७ विश्व-रूप-दर्शनयोग

उसका तथा मोहका मिलन । है यह व्यर्थ-बातका कथन । मृगजलसे होगा क्या शमन । वडवानलका ॥ ६६ ॥ तथा जो मैं हूं तब श्रीकृष्ण । पाके कृपाका अंतःकरण । करता हूं सानंद भोजन । ब्रह्म-रसका ॥ ६७ ॥ इससे हुवा मेरा मोह निवारण । इसमें क्या भला विस्मयका कारण । इससे हुवा मेरा उद्धार श्रीकृष्ण । तेरे चरणोंकी सौगंध ॥ ६८ ॥ भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥ अर्जुनकी आंतरिक द्विविधा— अजी ! हे कमल-नयन । कोटि-सूर्य-तेज वदन । मैंने तुझसे जनार्दन । सुना है आज ॥ ६९ ॥ प्रकृतिसे उत्पन्न भूत-जात । वैसे प्रकृतिमें उसका अंत । कैसा होता है जो प्राकृत । कहा है देवने ॥ ७० ॥ प्रकृतिका दिया संपूर्ण-ज्ञान । बताया ब्रह्मका वसति-स्थान । जिसको ओढ करके महान् । हुए हैं वेद ॥ ७१ ॥ ज्ञान-राशीको जो बढाता । धर्म-रत्नोंको प्रसवता । वेद है आश्रय करता । तेरे स्वरूपका ॥ ७२ ॥ ऐसा अगाध है महात्म्य । जो सकल मार्गैक्य-गम्य । तथा है स्वानुभव रम्य । दिखाया मुझे ॥ ७३ ॥ हटाकरके सब बादल । दिखाते जैसे सूर्य-मंडल । सेवार हटाकर निर्मल । जल दिखाते हैं ॥ ७४ ॥ छुडानेसे सांपकी जकडन । होता जैसे चंदन-दर्शन । या करनेसे पिशाचोच्चाटन । मिलती भूमिस्थ निधि ॥ ७५ ॥ उत्पत्ति नाश भूतोंका सुना मैंने सविस्तर । अभंग महिमा वैसे तेरे ही मुखसे प्रभु ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ३३८

वैसे थी प्रकृतिकी अडचन । हटाया तूने उसे जनार्दन । पर-तत्वमें की है फिर लीन । बुद्धि मेरी ॥ ७६ ॥ इस विषयमें मेरा देव । हुवा संदेह रहित जीव । किंतु और एक संकल्प-भाव । हुआ उत्पन्न ॥ ७७ ॥ रहने दिया इसे संकोचकर । किससे पूछें कहो चक्रधर । तेरे बिना नहीं अन्य आधार । जानता मैं ॥ ७८ ॥ जलचर माने जलका आभार । या बालक स्तन्यका संकोच कर । जीनेका वह दूसरा क्या आधार । ढूंढेगा देव ! ॥ ७९ ॥ तो संकोच नहीं करना । मनकी जो बात कहना । कहे तब कृष्ण अर्जुन । कह तू चाह ॥ ८० ॥ एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥ स-संकोच विश्व-रूप दर्शनकी प्रार्थना - तब कहता किरीटी । कही थी तूने जो गोष्टि । उससे प्रतीति दृष्टि । शांत हुई मेरी ॥ ८१ ॥ संकल्प जहांसे है निकलता । लोक-क्रमका उदयास्त होता । जिस स्थानको है तू 'मैं कहता । जनार्दन ॥ ८२ ॥ वह वास्तविक रूप है तेरा । जहांसे आता तू ले अवतार । सुर-कार्यार्थ तू है चक्रधर । द्विभुज या चतुर्भुज हो ॥ ८३ ॥ क्षीर-शयनाभिनय समाप्त कर । मत्स्य-कूर्मका अलंकार छोड़कर । लीला-साधन सबको तू छिपाकर । रखता लपेटके ॥ ८४ ॥ उपनिषद करते गायन । योगी-जन हृदयमें दरशन । सनकादिक नित आलिंगन । करते जिसके ॥ ८५ ॥ , तेरा जो ईश्वरी रूप मानना हूँ यथार्थ है । वही मैं देखना चाहूँ प्रत्यक्ष पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥ ३३९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

ऐसा तेरा असीम जनार्दन । विश्व-रूप कथा सुनके मन । देखना चाहते वही नयन । प्यासे होकर ॥ ८६ ॥ मेरा संकोच करके दूर । स-स्नेह पूछी चाह श्रीधर । यही एक चाह चक्रधर । पूर्ण करना ॥ ८७ ॥ तेरा विश्व-रूप संपूर्ण । देखना चाहता स-तृष्ण । होकर तन-मन प्राण । एकमात्र ॥ ८८ ॥ मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥ और एक बात केशव । विश्व-रूप दर्शनास्तव । मेरी योग्यता है वास्तव । या नहीं है ॥ ८९ ॥ यह मैं आप नहीं जानता । यह क्यों है यदि तू पूछता । अपने रोगका क्या जानता । निदान रोगी ? ॥ ९० ॥ अजी ! होती जब इच्छाकी तीव्रता । भूलते हैं तब अपनी योग्यता । प्यासा मनुष्य है सदैव मानता । अपर्याप्त समुद्र ॥ ९१ ॥ इच्छाकी है ऐसी जो तीव्रता । भुला देती है मेरी योग्यता । जानती किंतु शिशुको माता । सहज-भावसे ॥ ९२ ॥ वैसा तू भक्त जन रंजन । जानता है मेरी संभावना । फिर तू विश्व-रूप दर्शन । देगा हो सदय ॥ ९३ ॥ किंतु मेरी योग्यतानुसार । ना हो तो ना कह कृपाकर । गाके लाभ क्या पंचम स्वर । बहरेके सम्मुख ॥ ९४ ॥ एक प्यासेकेलिये वर्षा होती । उससे पृथ्वीकी प्यास बुझती । किंतु वही चट्टान पर होती । व्यर्थ जाती है ॥ ९५ ॥ चकोरको चंद्रामृत मिलता । अन्योंको क्या इनकार करता । किंतु दृष्टि न होनेसे होता । व्यर्थ ही सब ॥ ९६ ॥ यदि तू मानता शक्य तेरा जो रूप देखना । तभी योगेश्वर देव दिखावो वह अव्यय ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४०

अजी ! तू विश्व-रूप यह सहसा । दिखायेगा इस बातका भरोसा । ऐसी बातोंमें उदार अपना-सा । नित्य-नूतन तू ॥ ९७ ॥ परमात्माकी असमान्य उदारताका वर्णन— तेरी उदारता है जो स्वतंत्र । न देखती देनेमें पात्रापात्र । कैवल्य-सा वर अति-पवित्र । दिया शत्रुओंको भी ॥ ९८ ॥ अजी ! मोक्ष है जो अति दुराराध्य । तेरे चरण हैं उसका आराध्य । होता है वह तेरी बातसे साध्य । सेवकके समान ॥ ९९ ॥ तूने सनकादिकके समान । पूतनाको दिया सायुज्यासन । कराके जो विषका स्तन-पान । मारने आयी थी ॥ १०० ॥ राजसूय सभा-सदनमें । त्रिभुवन जन-सम्मुखमें । जिसने शत दु-र्वचनमें । डुबोया तुझे ॥ १ ॥ ऐसा अपराधी जो शिशुपाल । पाता है तेरे चरणमें स्थल । या उत्थानपादका ध्रुवबाल । चाहता था क्या मोक्ष ॥ २ ॥ ध्रुवबाल आया था वनमें । बैठना है पिताकी गोदमें । उसको किया तूने जगतमें । सूर्य-चंद्रसे ऊंचा ॥ ३ ॥ ऐसे वनवासियोंको सकल । देनेवाला एक है तू धसाल । पुत्रको पुकारता अजामिल । किया चिद्रूप ॥ ४ ॥ जिसने मारी लात तेरी छाती पर । उसका पद-चिन्ह किया अलंकार । अब-तक है शत्रु का ही कलेवर । भूषण बना करमें ॥ ५ ॥ अपकारी पर भी तेरा उपकार । अपात्रों पर भी तू है अति उदार । द्वारपाल बना तू दान मांगकर । बलिके घरका ॥ ६ ॥ न सुनी जिसने आराधना । रिझाती थी जो तोता अपना । उस गणिकाको जनार्दन । तूने दिया वैकुंठ ॥ ७ ॥ दिखा कर ऐसे व्यर्थके कारण । निज-पद देता तू नारायण । न करेगा तू मुझे ऐसा श्रीकृष्ण । कभी निराश ॥ ८ ॥ जिससे इतने जगत सकल । पाता है शांति तुष्टि पुष्टि औ' बल । उस नंदिनीका बछडा व्याकुल । होगा क्या भूखसे ॥ ९ ॥ ३४१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

इसीलिये मैंने कही पीछे जो बात । देव न करेंगे अस्वीकार निश्चित । उसकी योग्यता देना मुझे अच्युत । यह है विनय ॥ ११० ॥ तेरे विश्व-रूपका आकलन । कर सकेंगे तो मेरे नयन । प्यास बुझावो हे जनार्दन । इन नयनोंकी ॥ ११ ॥ श्री कृष्णकी भक्त-वत्सलता— करता है जब ऐसी विनती । लीन हो करके सुभद्रापति । तब वह षड्गुण-चक्रवर्ति । होता है उतावला ॥ १२ ॥ वह है कृपा-पीयूष सजल । पास आया है यहां वर्षा-काल । अथवा है श्रीकृष्ण कोकिल । अर्जुन बसंत ॥ १३ ॥ देखकर जैसे चंद्र-बिंब वर्तुल । उछल आता है क्षीर-सागर-जल । वैसे प्रेम-बलसे हृदय-कमल । खिला श्री हरिका ॥ १४ ॥ प्रसन्नताके उस उमंगसे । गरज कर कहता कृपासे । पार्थ तू देख देख आनंदसे । स्वरूप मेरा ॥ १५ ॥ केवल विश्व-रूपको देखना । इतनी थी पार्थकी मनो-कामना । यहां विश्व रूपमय त्रिभुवन । किया श्री हरिने ॥ १६ ॥ धन्य-धन्य उदार अपरिमित । याचकको देता देव दिन-रात । चाहता जो उससे अनगिनत । अपना सर्वस्व ॥ १७ ॥ शेषसे भी जो था चुराया । वेदोंको जिससे छकाया । लक्ष्मीसे भी जो था छिपाया । वह हृदय-गुह्य ॥ १८ ॥ प्रकट करेंगे अनेक दर्शन । बनायेंगे विश्व-रूप प्रदर्शन । भाग्यशाली है यह बडा अर्जुन । धन्य धन्य ॥ १९ ॥ स्वप्नमें जाता जैसे मनुष्य जागृत । स्वप्नमें बनता है स्वयं वस्तु जात । वैसे स्वयं बना विराट्-विश्व अनंत । अपने आपमें ॥ १२० ॥ यकायक वह मुद्रा छोडी । स्थूल-दृष्टि थी यवनिका जो फाडी । अथवा खोलकर दिखायी बडी । अपनी योग-सिद्धि ॥ २१ ॥ किंतु यह देखेगा या नहीं । ऐसा विचार कुछ भी नहीं । किया और देख कहना है यही । हो स्नेहातुर ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४२

भगवान उवाच पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥ विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपकी जड़में एक सृष्टिका दर्शन, स्वभाव-विविधता— तूने कहा अर्जुन दिखावो एक । उसीको दिखाया तो क्या रहा नेक । यहां भरा है जो सभी अब देख । मेरे ही रूपमें ॥ २३ ॥ एक कृश तो एक स्थूल । एक लघु एक विशाल । पृथुतर तथा विशाल । अमर्याद सब ॥ २४ ॥ एक अनावर तो एक प्रांजल । कुछ स-व्यापार तो कुछ निश्चल । कुछ उदासीन तो कुछ स्नेहल । कुछ हैं कठोर ॥ २५ ॥ कुछ उन्मन कुछ सावध । कुछ उथल कुछ अगाध । कुछ प्रसन्न तो कुछ क्रुद्ध । तथा मुक्त संकुचित ॥ २६ ॥ कुछ संत कुछ सदा-मद । कुछ स्तब्ध कुछ सानंद । गर्जन रत कुछ निःशब्द । तथा सौम्य भी ॥ २७ ॥ अभिलाषा-युत कुछ विरक्त । कुछ जागृत कुछ निद्रित । कुछ संतुष्ट कुछ है आर्त । अति उदार कुछ ॥ २८ ॥ कुछ अशस्त्र तो कुछ सशस्त्र । तथा अति रौद्र औ' अति-मित्र । कुछ तम-युत कुछ पवित्र । कुछ है समाधिस्थ ॥ २९ ॥ कयी जन लीला-विलास । औ' पालन-शील-लालस । संहारक कुछ सावेश । कुछ है साक्षि-भूत ॥ १३० ॥ नाना विध जो प्रकर्ष ऐसे । प्रकाशित जो दिव्य-तेजसे । वर्णमें भी जो एक एक-से । नहीं थे कोयी ॥ ३१ ॥ श्रीभगवानने कहा देखो मेरे सभी रूप दिव्य शत सहस्र तू । नाना प्रकार आकार वर्ण भी जिसमें बहु ॥ ५ ॥ ३४३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें वर्ण-विविधता— कुछ तो तप्त सुवर्णसे । कुछ भूरे मट-मैलेसे । कुछ सराग चित्रितसे । सिंधुसे नभ ॥ ३२ ॥ कुछ जो सहज स्वाभाविक कांतिके । कुछ रत्न-जडित ब्रह्मांड दीप्तिके । कुछ तो अरुणोदय-प्रभा सरीखे । कुंकुमके समान ॥ ३३ ॥ कुछ शुद्ध स्फटिकोज्ज्वल । कुछ इंद्र-नील सुनील । कुछ काले अंजनाचल । कुछ रक्त-वर्ण ॥ ३४ ॥ कुछ लसित-कंचनसे पीले । कुछ शामल बादलसे नीले । कुछ चंपक-गौर सम पीले । कुछ थे हरे ॥ ३५ ॥ कुछ लाल तप्त-ताम्र सम । कुछ सुंदर जो चंद्र-सम । नाना वर्णके रूप असीम । देख लो भरे ॥ ३६ ॥ जैसे हैं ये अनेक वर्ण । रूपमें भी नहीं प्रमाण । लज्जासे कंदर्प-शरण । रूप होंगे देख ॥ ३७ ॥ विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें रूप विविधता— कुछ अति लावण्य साकार । स्निग्ध-तन कुछ मनोहर । कुछ श्रृंगार-श्रीके-भांडार । खुला प्रदर्शनार्थ ॥ ३८ ॥ कुछ पीनाकवयव मांसल । कुछ शुष्क अति-विकराल । कुछ दीर्घ-कंठ और शिथिल । कुछ अति घिनौने ॥ ३९ ॥ ऐसे नाना-विध वर्ण आकृति । पार नहीं यहां सुभद्रा-पति । यहां प्रत्येक अंगकी आकृति । दिखाती विश्व ॥ १४० ॥ पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥ वसु रुद्र तथा वायु देखो आदित्य अश्विनी । देखो अनेक आश्चर्य न देखे पहले कभी ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४४

विश्वरूपमें अनेक देवताओंका दर्शन— खुलती है जहां दृष्टि । फैलती है आदित्य-सृष्टि । मिटती है जहां दृष्टि । होता अस्त ॥ ४१ ॥ मुखसे निकल हुआ फूत्कार । लेकरके ज्वालाओंका आकार । पावक आदि वसु समाधार । निर्माण करते ॥ ४२ ॥ जहां भ्रू-लताओंका अवसान । क्रोधसे होता रहता मिलन । वहां रुद्रोंके समूह उत्पन्न । होते हैं देख ॥ ४३ ॥ सौम्य आर्द्रतामें यहां सदैव । निर्माण होते हैं अश्विनी देव । तथा श्रोत्रोंमें होते हैं पांडव । वायु अनेक ॥ ४४ ॥ एकेक रूपके ऐसे खेल । सृजते सुर-सिद्धके कुल । ऐसे अपार तथा विशाल । देखो वहां रूप ॥ ४५ ॥ जिसको कहनेमें वेद तुतलाता । देखनेमें कालका आयुष्य खूटता । विधाताको भी उसका नहीं लगता । ठौर ठिकान ॥ ४६ ॥ तीनों देवोंने न सुनी एक । उसको तू प्रत्यक्षमें देख । भोग जो अचरज अनेक । योग-वैभव महा ॥ ४७ ॥ इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥ इस आकृतिके तू किरीटी । रोम-मूलमें है देख सृष्टि । सुर-तरुके तलकी मिट्टी । सृजती तृणांकुर ॥ ४८ ॥ तथा पवनका प्रकाश जैसे । दिखाता उड़ते परमाणु-से । भ्रमते यहां ब्रह्मांड भी वैसे । अंगके सांधोंमें ॥ ४९ ॥ यहांका प्रत्येक अवयव । दिखाता है सविस्तर विश्व । औ' विश्वके पार भी पांडव । देखना चाहो ॥ १५० ॥

देखो अब यहां सारा विश्व तू सचराचर । एकत्र देहमें मेरे इच्छा दर्शन है तुझे ॥ ७ ॥ (44) ३४५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

किसी भी बातकी अपूर्णता । कोई नहीं है यहां सर्वथा । देख सुखसे जो तुझे भाता । मेरे तनमें तू ॥ ५१ ॥ विश्व-मूर्ति उससे ऐसे । बोली जो अति कारुण्यसे । तो दीखता या नहीं ऐसे । न कहता रहा मौन ॥ ५२ ॥ रहा क्यों भला यह ऐसा मौन । सोचकर देखता यह जनार्दन । तब भी इच्छा-भूषित अर्जुन । खडा है उत्कंठित ॥ ५३ ॥ न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामिते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥ उतरा नहीं है उत्कंठोन्माद । न मिला अब भी स्वर्ग सुखद । आकलन नहीं होता विशद् । मेरा रूप ॥ ५४ ॥ अर्जुनको विश्व-रूप देखनेके लिये दिव्य-दृष्टि दी— हंसा देव यह सोचकर । कहने लगा जो हंसकर । “हमने दिखाया रूप पर । तू देखता ही नहीं” ॥ ५५ ॥ बोला तब अर्जुन विलक्षण । यह किसके दोषके कारण । बगलेको देता है सुलक्षण । चंद्रामृत तू ॥ ५६ ॥ दिखाता सुंदर दर्पण । जन्मांधको तू है श्रीकृष्ण । सुनाता तू मधुर बीन । बहरेको जो ॥ ५७ ॥ मकरंद-कणोंका चारा । कहता है तू दादुरसे चर । व्यर्थ मानकर क्यों शार्गधर । बिगडता अब ॥ ५८ ॥ शास्त्रोंसे यह अतींद्रिय घोषित । ज्ञान-दृष्टिका जो विषय निश्चित । कहता इसे देखेंगे कैसे पार्थ । चर्म-चक्षु ॥ ५९ ॥ यह मेरा व्यंग नहीं बोलना । मुझे अपना सहन करना । यह सुन कहता जनार्दन । सच है यह ॥ १६० ॥ किंतु तू चर्म-चक्षूसे न देख सकता मुझे । ले दिव्य दृष्टि है मेरी ईश्वरी योग देख तू ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४६

यह स्वरूप यदि दिखाना होता । दी होती पहले ही यह योग्यता । बोलनेमें मैं प्रेमसे स्वभावता । भूल गया हूं ॥ ६१ ॥ पहले जुताईके बुवाईसे । थकावट भई व्यर्थ इससे । अब देता दिव्य-दृष्टि इससे । देखो निज-रूप ॥ ६२ ॥ इस दृष्टिसे फिर तू अर्जुन । हमारा ऐश्वर्य-योग संपूर्ण । देखके उसे करो संगोपन । अपने अनुभवमें ॥ ६३ ॥ ऐसा वह वेदांत-वेद्य । सकल लोकका जो आद्य । जगताका जो है आराध्य । कहने लगा ॥ ६४ ॥ संजय उवाच एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥ अर्जुनका महा-भाग्य- सुन तू कौरव-कुल-तिलक । विस्मय है मुझे इसी बातका । है क्या लक्ष्मीसे भुवनत्रयका । दूसरा भाग्यवान ॥ ६५ ॥ अथवा तत्व-विवेचनार्थ । है क्या कोई वेदसे समर्थ । सेवामें शेषसे भी विश्वस्थ । दूसरा कौन है ? ॥ ६६ ॥ उसके लिये ऐसे कष्ट सहन । करते हैं जो योगियोंके समान । अनुसरणमें बना है वाहन । गरुड सतत ॥ ६७ ॥ उन सबको है परे हटाया । जबसे पांडवोंका जन्म भया । कृष्ण-सुख सब सहज आया । इनके भागमें ॥ ६८ ॥ इन पांचोंमें भी जो अर्जुन । कृष्ण जैसे उसके आधीन । कामुक होता है अनुदिन । कामिनी-संग ॥ ६९ ॥ संजयने कहा ऐसा बोल कुरु-श्रेष्ठ महायोगेश कृष्णने । दिखाया अपना श्रेष्ठ ईश्वरी-रूप पार्थको ॥ ९ ॥ ३४७ विश्व रूप-दर्शनयोग

सिखाया गया पंछी ऐसा न बोलता । क्रीड़ा-रंत मृग भी ऐसा न चलता । पार्थके दैवका उत्कर्ष जो दीखता । यहां अकथनीय ॥ १७० ॥ पर-ब्रह्म यह आज है संपूर्ण । भोगार्थ सिद्ध इसके ही नयन । इसकी बातका दुलार श्रीकृष्ण । करता है यहां ॥ ७१ ॥ पार्थ कोपता तब वह शांत रहता । यह रूसता तब वह है समझाता । अर्जुनसे पगलाया है जगन्नाथ । निश्चित रूपसे ॥ ७२ ॥ जनमें हैं वैसे विषय जीतकर । शुकादि पुरुष जो श्रेष्ठ मुनिवर । रह गये हैं लीला गाकर सुंदर । भाटोंके समान ॥ ७३ ॥ और योगियोंका समाधि-धन । हो रहा है पार्थके आधीन । देख यह विस्मित होता है मन । महाराज मेरा ॥ ७४ ॥ संजय कहता है कौरवेश । इसमें विस्मय नहीं खास । कृष्ण करलें जिसे अपना-सा । भाग्योदय उसका ॥ ७५ ॥ कहता है इसलिये देवराज । यह दिव्य-दृष्टि ले तू पार्थ आज । इससे देख विश्व-रूप सहज । पूर्ण रूपसे ॥ ७६ ॥ श्रीमुखके ऐसे अक्षर । निकले जिस अवसर । मिटा अविद्याका अंधार । उसी क्षणमें ॥ ७७ ॥ अक्षर नहीं थे वे देख । था ब्रह्म-साम्राज्य-दीपक । अर्जुनार्थ थी चित्कलिका । जगादी श्रीकृष्णने ॥ ७८ ॥ संपूर्ण ब्रह्मांड ही विश्व-रूपसे भर गया— प्रकटे जो दिव्य-चक्षु फिर । ज्ञान-दृष्टिका फूटा अंकुर । तथा दिखाया है सविस्तर । ऐश्वर्य-योग ॥ ७९ ॥ अवतार हैं ये जो सकल । उस महा-सिंधुके कल्लोल । विश्व दीखता है मृगजल । उसके किरणोंसे ॥ १८० ॥ उचित उस अनादि भूमिका पर । प्रकट होता है चित्र स-चराचर । अपने आप अपनेमें दामोदर । दिखाता उसको ॥ ८१ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४८

बचपनमें श्रीपतिने जब । इकबार माटी खायी थी तब । माताने क्रोधसे पकड़ी खज्ज । कड़ाई इसकी ॥ ८२ ॥ इसने तब डरके ऐसे । मुख दिखानेके बहानेसे । माताको दिखाया था धीरेसे । ब्रह्मांड सारा ॥ ८३ ॥ या मधु-वनमें ध्रुवको जैसे । गंडस्थलको शंख लगानेसे । वेद-मति भी कुंठित हो ऐसे । स्तवन किया उसने ॥ ८४ ॥ अनुग्रह वैसे कुरुपति । पार्थ पर करता श्रीपति । जानती नहीं है अब मति । माया उसकी ॥ ८५ ॥ प्रकट हुवा यकायक योगैश्वर्य । कल्पांतमें होता जैसे जल-प्रलय । विस्मयमें डूबा चित उस समय । धनंजयका ॥ ८६ ॥ आ-ब्रह्म उदकसे जैसे व्याप्त था । अकेला मार्कडेय ही तैरता था । विश्व-रूप विस्मयमें वैसे पार्थ । लगा लोटने ॥ ८७ ॥ अजी ! कितना था यहां गगन । कौन ले गया वह जो महान । कहें सब चराचर अर्जुन । औ' महाभूत भी ॥ ८८ ॥ मिट गया दिशाओंका नाम-निशान । तना नहीं होता अध-ऊर्ध्वका ज्ञान । जागृतिसे लुप्त होता है स्वप्न । वैसे लोकाकार ॥ ८९ ॥ जैसे अनेक सूर्य-तेज प्रताप । करता स-चंद्र तारागण लोप । वैसे निगल गया है विश्व-रूप । प्रपंच सर्वस्व ॥ १९० ॥ नहीं स्फुरता मनमें तब मनत्व । नहीं संभालता अपनेको बुद्धित्व । लौट आया इंद्रियोंका इंद्रियत्व । हृदयमें ही ॥ ९१ ॥ केवळ वहां स्तब्ध स्तब्धता । एकाग्र है स्वयं एकाग्रता । पडी जैसे संमोहनावस्था । विचारोंपर ॥ ९२ ॥ देखता था वह ऐसा हो विस्मित । सम्मुख था चतुर्भुज रूप स्थित । नाना रूप ले वही था सुसज्जित । चहूँ ओर ॥ ९३ ॥ होते जैसे वर्षा-ऋतुके बादल । या महा-प्रलयके तेजोमंडल । वह रूप वैसा सर्वत्र सकल । भर रहा था एक-मात्र ॥ ९४ ॥ ३४९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

प्रथम स्वरूप समाधान । होकर रहा वह अर्जुन । खुले फिर उसने लोचन । देखा विश्व-रूप ॥ ९५ ॥ देखना इन्ही नयनोंसे । विश्व-रूप संपूर्ण ऐसे । वह दुलार भी कृष्णसे । हुआ पूर्ण ॥ ९६ ॥ अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥ विश्व-रूपकी अद्भुतता-- देखता तब वहां अनेक वदन । जैसे रमा-रमणके राज-भवन । प्रकट हुए अनेकानेक निधान । लावण्य श्रियाके ॥ ९७ ॥ या आनंद-वनमें आया बहार । या सौंदर्य राज्य मिले हैं अपार । वैसे देखता वदन मनोहर । श्रीहरिका वह ॥ ९८ ॥ उसमें भी थे जो अनेक । सहज अति भयानक । प्रलय-रात्रीके कटक । उठ आया है ॥ ९९ ॥ या मृत्युके ये मुख उत्पन्न । भयके दुर्ग रचे विभिन्न । या प्रलयाग्निके ये हवन- । कुंड खुले हैं ॥ २०० ॥ ऐसे अद्भुत औ' भयंकर । देखता है रूप धनुर्धर । कई सालंकृत औ' सुंदर । तथा सौम्य भी ॥ १ ॥ ज्ञान-चक्षुसे किया अवलोकन । किंतु न होता मुखोंका अंत न जान । स-कौतुक देखने लगा नयन । विश्व रूपके ॥ २ ॥ नाना वर्णका मानो कमल-वन । विकसित हो रहा था यह जान । आदित्य-समुदायसे वे नयन । देखने लगा पार्थ ॥ ३ ॥ जैसे कृष्ण मेघ-घटाओंमें । कौंधती बिजली प्रलयमें । वैसी देखी भ्रू-भंग तलमें । पिंगलानलकी ॥ ४ ॥ अनेक मुख औ' आंखें जिसमें अति अद्भुत । बहु दिव्य अलंकार अनेक दिव्य आयुध ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ३५०

देखनेमें आश्चर्य एकैक । उसी विश्व-रूपमें जो एक । अनेकताका दर्शन-सुख । हुआ फल-प्रद ॥ ५ ॥ कहां हैं इसके चरण । कहां है मुकुट विस्तीर्ण । बढ़ती इच्छा प्रतिक्षण । देखनेकी ॥ ६ ॥ रखी वहां भाग्य-निधि पार्थ । होंगे कैसे निष्फल मनोरथ । रखता क्या भातेमें बाण व्यर्थ । पिनाकपाणी ॥ ७ ॥ नहीं तो ब्रह्मदेवकी गिरापर । होते हैं क्या झूटे अक्षर । इसीलिये साद्यंत जो है अपार । देखा विश्व-रूप ॥ ८ ॥ नहीं होता जो वेदको आकलन । उसका सकलावयव दर्शन । एक समय करते हैं नयन । धनंजयके ॥ ९ ॥ चरणोंसे मुकुट पर्यंत । देखता है रूप-श्रेष्ठ पार्थ । नाना रत्नालंकार भूषित । झलक सुंदर ॥ २१० ॥ पर-ब्रह्म बना स्वयं भूषण । सजानेके लिये अपना तन । उन अलंकारोंका मैं वर्णन । करूं कैसे ॥ ११ ॥ उसकी जो प्रभा अतीव उज्ज्वल । निखारती थी चंद्रादित्य मंडल । थी जो वह महातेजकी चित्कला । उससे प्रकटता विश्व ॥ १२ ॥ वह जो दिव्य-तेज शृंगार । किसीकी बुद्धिको हो गोचर । पहना हरि ने अलंकार । देखता पार्थ ॥ १३ ॥ शरीर था वही अलंकार । जो है हाथ वही हथियार । जो है शरीरी वही शरीर । स-चराचरमें वही ॥ १४ ॥ वही फिर ज्ञान दृष्टिसे निर्मल । देखता कर-पल्लव जो सरल । वहां तोडते जो कल्पांतक ज्वाल । ऐसे शस्त्र करमें ॥ १५ ॥ उसके किरणोंके स्फुलिंग । नक्षत्रोंको बनाते जो मूंग । उसके तेजमें छिपी आग । घुसती सिंधुमें ॥ १६ ॥ फिर कालकूट कल्लोलके तरंग । अथवा विद्युतवनके विस्फुलिंग । दीखते हैं कर-पल्लव अभंग । उचितायुध-युक्त ॥ १७ ॥ ३५१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥ विश्वरूपकी भयानकतासे विह्वल होकर दृष्टि मूंद लेना— उस भयसे हटाकर दृष्टि । देखता कंठ मुकुट किरीटी । हुई है सुरतरुकी जो सृष्टि । मानो वहींसे ॥ १८ ॥ मूल-सिद्धीका जहां महा-पीठ । शांत कमलाका विश्राम मठ । ऐसे सुमनों से वह किरीट । सजा हुआ ॥ १९ ॥ मुकुट पर पुष्प स्तवक । तथा पूजा अंध जो अनेक । गलेमें झूलते अलौकिक । पुष्पहार ॥ २२० ॥ सूर्य तेजसे स्वर्गको लपेटना । मेरु-गिरिको सुवर्णसे ओढ़ना । वैसा था उसका भव्य पहनना । पीतांबर सुंदर ॥ २१ ॥ शंकरको कर्पूरसे लेपना । कैलासको पारदसे पोतना । अथवा सागरको ही ओढ़ना । क्षीरार्णवसे ॥ २२ ॥ अजी ! चंद्रमाकी तह खोलकर । आवरण डालना आकाशपर । वैसे ही था उसके सर्वांग पर । चंदन लेपन ॥ २३ ॥ स्व-प्रकाशकी आभा जिससे बढ़ती । तथा ब्रह्मानंदकी उष्णता मिटती । पृथ्वी है अपना अस्तित्व टिकाती । उस सुगंधसे ॥ २४ ॥ ब्रह्मा जिसका लेपन करता । अनंग भी उबटन करता । उस परिमलकी जो महत्ता । बखाने कौन ॥ २५ ॥ ऐसी अंगर शोभा देखकर । विस्मित-सा रहा पांडुकुमार । यह भी न समझा देखकर । देव बैठा है या सोया है ? ॥ २६ ॥ दृष्टि खोलकर देखता बाहर । जब वही विश्व-रूप सभी ओर । आंख मूंदकर देखता ऊपर । तब भी वही रूप ॥ २७ ॥ सम्मुख देखें मुख अगणित । पीछे मुड देखा हो भयग्रस्त । वहां भी वही मुख पाया हाथ । तथा दिव्य-रूप ॥ २८ ॥ दिव्य वस्त्र पुष्प माला भूषित दिव्य गंधसे । सब आश्चर्यसे पूर्ण विश्व-व्यापी अनंत जो ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी ३५२

देखनेसे दीखना है स्वाभाविक । ना कछु इसमें विस्मय-जनक । किंतु न देखते भी दीखना एक । महादाश्चर्य ॥ २९ ॥ अनुग्रहकी यह कैसी करतूत । देखता या नहीं देखता वह पार्थ । उसके सह कर लिया आच्छादित । नारायणने ॥ २३० ॥ पड़कर विस्मय प्रवाहमें । निकलकर किनारा छूनेमें । उलझता आश्चर्य सागरमें । अनायास ॥ ३१ ॥ ऐसे ही उस अनंत-रूपके । अलौकिक दर्शन-कौशल्यके । जालमें धनंजय उलझके । हो रहा विस्मित ॥ ३२ ॥ श्री कृष्ण विश्वतोमुख स्वभावसे । दर्शनार्थी जो पार्थकी प्रार्थनासे । विश्वरूप हुआ है संपूर्णतासे । इस समय ॥ ३३ ॥ दीप या सूर्य-तेजमें है देखती । या आंख मूंदनेसे नहीं देखती । वह दिव्य-दृष्टि ऐसी नहीं थी । दी जो श्रीकृष्णने ॥ ३४ ॥ पार्थ देखता तब दोनों ओर । आंख खोलकर या मूंदकर । कहता नगरमें बैठकर । संजय राजासे ॥ ३५ ॥ कहता है “सुनो” यह संजय । विश्व-रूप देखता धनंजय । नानाभरणयुत स-विस्मय । विश्वतोमुख ॥ ३६ ॥ दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥ अनंत सूर्योंसे भी वह तेजस्वी रूप -- उस देवके जो अंग-प्रभाकी । बात कहनी है सो कहनेकी । जैसे द्वादशादित्य मिलनकी । प्रभा-सी कल्पांतमें ॥ ३७ ॥ अजी ! सहस्रावधि दिव्य-सूर्य । उदय हुए एक ही समय । फिर भी है वह अनुपमेय । उस दिव्य-प्रभासे ॥ ३८ ॥ प्रभा सहस्र सूर्योंकी नभमें एक हो दिखे । तभी उस महात्माकी प्रभासे तुल्य है नहीं ॥ १२ ॥ ३५३ (45) विश्व-रूप-दर्शनयोग

सभी विद्युल्लताओका हो मिलन । तथा प्रलयाग्निके सारे सामान । उसीमें जो दश-तेजोंका मिलान । करने पर भी ॥ ३९ ॥ उस शरीर-कांतिके सम्मुख । पास पास आएगा देख । किंतु उसके सम नहीं चोख । यह निश्चित ॥ २४० ॥ ऐसा महात्म्य उसका सहज । फैलता है अंगका सब तेज । व्यासकी कृपासे मैं वह आज । यहां देखता हूँ ॥ ४१ ॥ तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥ दृश्य और दृष्टाका अद्वय-भाव— उस विश्व-रूपमें एक ओर । जगत है अपना सविस्तर । रहते जैसे बुल्ले ठौर ठौर । महा-सागरमें ॥ ४२ ॥ अथवा आकाशमें गंधर्व-नगर । भूतलमें पिपीलिका बांधती घर । तथा परमणु मेरु-पर्वतपर । उड़ते रहते हैं ॥ ४३ ॥ इस भांति विश्व अपरंपार । देव चक्रवर्तिके तन पर । उस अवसर पांडुकुमार । देखता है ॥ ४४ ॥ ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४ ॥ एक विश्व वहां और एक आप । ऐसा दुजा भाव था जो अल्प स्वल्प । उसका भी अंतःकरणमें लोप । हुवा अचानक ॥ ४५ ॥ जागृत हुआ ब्रह्मानंद अंदर । शरीर बल खोया यहां बाहर । डूबा आनंद पुलकमें शरीर । अपाद्-मस्तक ॥ ४६ ॥ विश्वके जो सभी भेद जैसे घुल गये तब । अर्जुनने वहां देखे देहमें देवदेवके ॥ १३ ॥ फिर अर्जुन साश्चर्य हर्ष रोमांच गात्रसे । प्रभुसे जोडके हाथ बोला हो नत मस्तक ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ३५४

वर्षाका जैसे प्रथम काल । सर्वांग हरा होता है शैल । वैसे रोम-कूपमें सकल । खिले रोमद्रुम ॥ ४७ ॥ स्पर्श होते ही चंद्रकिरण । होता सोम-कांतका द्रवण । तन पर वैसे स्वेद-कण । उमड़ आये ॥ ४८ ॥ फंस जानेसे जैसे अलिकुल । झूलती कमल कलि सकल । हृदय-आनंदोर्मियोंके बल । सिहरता वैसे ॥ ४९ ॥ कर्पूर-केलिका गर्भ-पुट जैसे । छीलकर कर्पूर चूता वैसे । अर्जुनके नयन-कमलोंसे । चूते अश्रुकण ॥ २५० ॥ सात्त्विकताके ये जब अष्ट भाव । परस्परमें करते हैं उछाह । पाता है तब ब्रह्मानंदका जीव । दिव्य-साम्राज्य ॥ ५१ ॥ उदित होते ही सुधाकर । सानंद उमड़ता सागर । बार बार वैसे ऊर्मि भर । आती हृदयमें ॥ ५२ ॥ अजी ! सुखानुभवके कारण । कृपासे किया था द्वैत रक्षण । आह भर करके प्रतिक्षण । देखता पार्थ ॥ ५३ ॥ मुख कर बैठा था जिस ओर । उसी ओर मस्तक नवाकर । प्रणाम किया हाथ जोड कर । औ' किया स्तवन ॥ ५४ ॥ अर्जुन उवाच पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् । ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ- मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥ अर्जुनने कहा हे देव देखूं तव देहमें मैं हैं देव औ' भूत समूह सारा । ध्यानस्थ ब्रह्मा कमलासनस्थ महर्षि औ' नाग हैं एक साथ ॥ १५ ॥ ३५५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

सर्वत्र सभी तू ही तू भरा है प्रभो— कहता है प्रभो तेरी जय जय । तब कृपासे ही यह धनंजय । दर्शन कर सका इस समय । यह विश्व-रूप ॥ ५५ ॥ सच ही प्रभो तूने भला किया । हृदय यह आनंदित भया । तू ही है यह मैंने देख लिया । आश्रय विश्वका ॥ ५६ ॥ अनेक वन जैसे मंदार पर । श्वापदों सह लगे हैं ठौर ठौर । वैसे ही यहाँ तेरे शरीर पर । भुवन हैं अनेक ॥ ५७ ॥ अथवा गोदमें आकाशके । दीखते हैं मंडल ग्रहोंके । होते हैं झुण्ड पक्षी-कुलके । वृक्ष पर ॥ ५८ ॥ उसी भांति हे चक्रधर । विश्वात्मक तेरा शरीर । स्वर्गकेलिये भी है घर । देव गणोंके ॥ ५९ ॥ स्वामी ! महाभूतोंका पंचक । देखता हूं मैं यहां अनेक । तथा भूत-ग्राम जो अनेक । भूत-सृष्टिके ॥ २६० ॥ तुझमें दीखता है सत्य-लोक । बैठा है ब्रह्म-देव चतुर्मुख । वहां उस ओर कैलास एक । देखता मैं ॥ ६१ ॥ भवानी सह महादेव । तुझमें तू दीखता केशव । एकांशमें तुझमें ये सर्व । दीखते यहां ॥ ६२ ॥ वैसे ही कश्यपादि ऋषि-कुल । दीखते इस मूर्तिमें सकल । दीखते हैं यहां सप्त पाताल । शेष-नाग सह ॥ ६३ ॥ अथवा मानो त्रिभुवन-पति । तेरे अंगांगकी एकेक भित्ति । चतुर्दश भुवन चित्राकृति । सजाती है ॥ ६४ ॥ तथा यहां दीखते जो जो लोक । मानो चित्र रचना है अनेक । गोचर होता यहां अलौकिक । तेरा गांभीर्य ॥ ६५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३५६