भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अजी ! तू विश्व-रूप यह सहसा । दिखायेगा इस बातका भरोसा । ऐसी बातोंमें उदार अपना-सा । नित्य-नूतन तू ॥ ९७ ॥ परमात्माकी असमान्य उदारताका वर्णन— तेरी उदारता है जो स्वतंत्र । न देखती देनेमें पात्रापात्र । कैवल्य-सा वर अति-पवित्र । दिया शत्रुओंको भी ॥ ९८ ॥ अजी ! मोक्ष है जो अति दुराराध्य । तेरे चरण हैं उसका आराध्य । होता है वह तेरी बातसे साध्य । सेवकके समान ॥ ९९ ॥ तूने सनकादिकके समान । पूतनाको दिया सायुज्यासन । कराके जो विषका स्तन-पान । मारने आयी थी ॥ १०० ॥ राजसूय सभा-सदनमें । त्रिभुवन जन-सम्मुखमें । जिसने शत दु-र्वचनमें । डुबोया तुझे ॥ १ ॥ ऐसा अपराधी जो शिशुपाल । पाता है तेरे चरणमें स्थल । या उत्थानपादका ध्रुवबाल । चाहता था क्या मोक्ष ॥ २ ॥ ध्रुवबाल आया था वनमें । बैठना है पिताकी गोदमें । उसको किया तूने जगतमें । सूर्य-चंद्रसे ऊंचा ॥ ३ ॥ ऐसे वनवासियोंको सकल । देनेवाला एक है तू धसाल । पुत्रको पुकारता अजामिल । किया चिद्रूप ॥ ४ ॥ जिसने मारी लात तेरी छाती पर । उसका पद-चिन्ह किया अलंकार । अब-तक है शत्रु का ही कलेवर । भूषण बना करमें ॥ ५ ॥ अपकारी पर भी तेरा उपकार । अपात्रों पर भी तू है अति उदार । द्वारपाल बना तू दान मांगकर । बलिके घरका ॥ ६ ॥ न सुनी जिसने आराधना । रिझाती थी जो तोता अपना । उस गणिकाको जनार्दन । तूने दिया वैकुंठ ॥ ७ ॥ दिखा कर ऐसे व्यर्थके कारण । निज-पद देता तू नारायण । न करेगा तू मुझे ऐसा श्रीकृष्ण । कभी निराश ॥ ८ ॥ जिससे इतने जगत सकल । पाता है शांति तुष्टि पुष्टि औ' बल । उस नंदिनीका बछडा व्याकुल । होगा क्या भूखसे ॥ ९ ॥ ३४१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

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