ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसीलिये मैंने कही पीछे जो बात । देव न करेंगे अस्वीकार निश्चित । उसकी योग्यता देना मुझे अच्युत । यह है विनय ॥ ११० ॥ तेरे विश्व-रूपका आकलन । कर सकेंगे तो मेरे नयन । प्यास बुझावो हे जनार्दन । इन नयनोंकी ॥ ११ ॥ श्री कृष्णकी भक्त-वत्सलता— करता है जब ऐसी विनती । लीन हो करके सुभद्रापति । तब वह षड्गुण-चक्रवर्ति । होता है उतावला ॥ १२ ॥ वह है कृपा-पीयूष सजल । पास आया है यहां वर्षा-काल । अथवा है श्रीकृष्ण कोकिल । अर्जुन बसंत ॥ १३ ॥ देखकर जैसे चंद्र-बिंब वर्तुल । उछल आता है क्षीर-सागर-जल । वैसे प्रेम-बलसे हृदय-कमल । खिला श्री हरिका ॥ १४ ॥ प्रसन्नताके उस उमंगसे । गरज कर कहता कृपासे । पार्थ तू देख देख आनंदसे । स्वरूप मेरा ॥ १५ ॥ केवल विश्व-रूपको देखना । इतनी थी पार्थकी मनो-कामना । यहां विश्व रूपमय त्रिभुवन । किया श्री हरिने ॥ १६ ॥ धन्य-धन्य उदार अपरिमित । याचकको देता देव दिन-रात । चाहता जो उससे अनगिनत । अपना सर्वस्व ॥ १७ ॥ शेषसे भी जो था चुराया । वेदोंको जिससे छकाया । लक्ष्मीसे भी जो था छिपाया । वह हृदय-गुह्य ॥ १८ ॥ प्रकट करेंगे अनेक दर्शन । बनायेंगे विश्व-रूप प्रदर्शन । भाग्यशाली है यह बडा अर्जुन । धन्य धन्य ॥ १९ ॥ स्वप्नमें जाता जैसे मनुष्य जागृत । स्वप्नमें बनता है स्वयं वस्तु जात । वैसे स्वयं बना विराट्-विश्व अनंत । अपने आपमें ॥ १२० ॥ यकायक वह मुद्रा छोडी । स्थूल-दृष्टि थी यवनिका जो फाडी । अथवा खोलकर दिखायी बडी । अपनी योग-सिद्धि ॥ २१ ॥ किंतु यह देखेगा या नहीं । ऐसा विचार कुछ भी नहीं । किया और देख कहना है यही । हो स्नेहातुर ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४२