ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान उवाच पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥ विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपकी जड़में एक सृष्टिका दर्शन, स्वभाव-विविधता— तूने कहा अर्जुन दिखावो एक । उसीको दिखाया तो क्या रहा नेक । यहां भरा है जो सभी अब देख । मेरे ही रूपमें ॥ २३ ॥ एक कृश तो एक स्थूल । एक लघु एक विशाल । पृथुतर तथा विशाल । अमर्याद सब ॥ २४ ॥ एक अनावर तो एक प्रांजल । कुछ स-व्यापार तो कुछ निश्चल । कुछ उदासीन तो कुछ स्नेहल । कुछ हैं कठोर ॥ २५ ॥ कुछ उन्मन कुछ सावध । कुछ उथल कुछ अगाध । कुछ प्रसन्न तो कुछ क्रुद्ध । तथा मुक्त संकुचित ॥ २६ ॥ कुछ संत कुछ सदा-मद । कुछ स्तब्ध कुछ सानंद । गर्जन रत कुछ निःशब्द । तथा सौम्य भी ॥ २७ ॥ अभिलाषा-युत कुछ विरक्त । कुछ जागृत कुछ निद्रित । कुछ संतुष्ट कुछ है आर्त । अति उदार कुछ ॥ २८ ॥ कुछ अशस्त्र तो कुछ सशस्त्र । तथा अति रौद्र औ' अति-मित्र । कुछ तम-युत कुछ पवित्र । कुछ है समाधिस्थ ॥ २९ ॥ कयी जन लीला-विलास । औ' पालन-शील-लालस । संहारक कुछ सावेश । कुछ है साक्षि-भूत ॥ १३० ॥ नाना विध जो प्रकर्ष ऐसे । प्रकाशित जो दिव्य-तेजसे । वर्णमें भी जो एक एक-से । नहीं थे कोयी ॥ ३१ ॥ श्रीभगवानने कहा देखो मेरे सभी रूप दिव्य शत सहस्र तू । नाना प्रकार आकार वर्ण भी जिसमें बहु ॥ ५ ॥ ३४३ विश्व-रूप-दर्शनयोग