भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें वर्ण-विविधता— कुछ तो तप्त सुवर्णसे । कुछ भूरे मट-मैलेसे । कुछ सराग चित्रितसे । सिंधुसे नभ ॥ ३२ ॥ कुछ जो सहज स्वाभाविक कांतिके । कुछ रत्न-जडित ब्रह्मांड दीप्तिके । कुछ तो अरुणोदय-प्रभा सरीखे । कुंकुमके समान ॥ ३३ ॥ कुछ शुद्ध स्फटिकोज्ज्वल । कुछ इंद्र-नील सुनील । कुछ काले अंजनाचल । कुछ रक्त-वर्ण ॥ ३४ ॥ कुछ लसित-कंचनसे पीले । कुछ शामल बादलसे नीले । कुछ चंपक-गौर सम पीले । कुछ थे हरे ॥ ३५ ॥ कुछ लाल तप्त-ताम्र सम । कुछ सुंदर जो चंद्र-सम । नाना वर्णके रूप असीम । देख लो भरे ॥ ३६ ॥ जैसे हैं ये अनेक वर्ण । रूपमें भी नहीं प्रमाण । लज्जासे कंदर्प-शरण । रूप होंगे देख ॥ ३७ ॥ विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें रूप विविधता— कुछ अति लावण्य साकार । स्निग्ध-तन कुछ मनोहर । कुछ श्रृंगार-श्रीके-भांडार । खुला प्रदर्शनार्थ ॥ ३८ ॥ कुछ पीनाकवयव मांसल । कुछ शुष्क अति-विकराल । कुछ दीर्घ-कंठ और शिथिल । कुछ अति घिनौने ॥ ३९ ॥ ऐसे नाना-विध वर्ण आकृति । पार नहीं यहां सुभद्रा-पति । यहां प्रत्येक अंगकी आकृति । दिखाती विश्व ॥ १४० ॥ पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥ वसु रुद्र तथा वायु देखो आदित्य अश्विनी । देखो अनेक आश्चर्य न देखे पहले कभी ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४४