भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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विश्वरूपमें अनेक देवताओंका दर्शन— खुलती है जहां दृष्टि । फैलती है आदित्य-सृष्टि । मिटती है जहां दृष्टि । होता अस्त ॥ ४१ ॥ मुखसे निकल हुआ फूत्कार । लेकरके ज्वालाओंका आकार । पावक आदि वसु समाधार । निर्माण करते ॥ ४२ ॥ जहां भ्रू-लताओंका अवसान । क्रोधसे होता रहता मिलन । वहां रुद्रोंके समूह उत्पन्न । होते हैं देख ॥ ४३ ॥ सौम्य आर्द्रतामें यहां सदैव । निर्माण होते हैं अश्विनी देव । तथा श्रोत्रोंमें होते हैं पांडव । वायु अनेक ॥ ४४ ॥ एकेक रूपके ऐसे खेल । सृजते सुर-सिद्धके कुल । ऐसे अपार तथा विशाल । देखो वहां रूप ॥ ४५ ॥ जिसको कहनेमें वेद तुतलाता । देखनेमें कालका आयुष्य खूटता । विधाताको भी उसका नहीं लगता । ठौर ठिकान ॥ ४६ ॥ तीनों देवोंने न सुनी एक । उसको तू प्रत्यक्षमें देख । भोग जो अचरज अनेक । योग-वैभव महा ॥ ४७ ॥ इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥ इस आकृतिके तू किरीटी । रोम-मूलमें है देख सृष्टि । सुर-तरुके तलकी मिट्टी । सृजती तृणांकुर ॥ ४८ ॥ तथा पवनका प्रकाश जैसे । दिखाता उड़ते परमाणु-से । भ्रमते यहां ब्रह्मांड भी वैसे । अंगके सांधोंमें ॥ ४९ ॥ यहांका प्रत्येक अवयव । दिखाता है सविस्तर विश्व । औ' विश्वके पार भी पांडव । देखना चाहो ॥ १५० ॥

देखो अब यहां सारा विश्व तू सचराचर । एकत्र देहमें मेरे इच्छा दर्शन है तुझे ॥ ७ ॥ (44) ३४५ विश्व-रूप-दर्शनयोग