भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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किसी भी बातकी अपूर्णता । कोई नहीं है यहां सर्वथा । देख सुखसे जो तुझे भाता । मेरे तनमें तू ॥ ५१ ॥ विश्व-मूर्ति उससे ऐसे । बोली जो अति कारुण्यसे । तो दीखता या नहीं ऐसे । न कहता रहा मौन ॥ ५२ ॥ रहा क्यों भला यह ऐसा मौन । सोचकर देखता यह जनार्दन । तब भी इच्छा-भूषित अर्जुन । खडा है उत्कंठित ॥ ५३ ॥ न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामिते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥ उतरा नहीं है उत्कंठोन्माद । न मिला अब भी स्वर्ग सुखद । आकलन नहीं होता विशद् । मेरा रूप ॥ ५४ ॥ अर्जुनको विश्व-रूप देखनेके लिये दिव्य-दृष्टि दी— हंसा देव यह सोचकर । कहने लगा जो हंसकर । “हमने दिखाया रूप पर । तू देखता ही नहीं” ॥ ५५ ॥ बोला तब अर्जुन विलक्षण । यह किसके दोषके कारण । बगलेको देता है सुलक्षण । चंद्रामृत तू ॥ ५६ ॥ दिखाता सुंदर दर्पण । जन्मांधको तू है श्रीकृष्ण । सुनाता तू मधुर बीन । बहरेको जो ॥ ५७ ॥ मकरंद-कणोंका चारा । कहता है तू दादुरसे चर । व्यर्थ मानकर क्यों शार्गधर । बिगडता अब ॥ ५८ ॥ शास्त्रोंसे यह अतींद्रिय घोषित । ज्ञान-दृष्टिका जो विषय निश्चित । कहता इसे देखेंगे कैसे पार्थ । चर्म-चक्षु ॥ ५९ ॥ यह मेरा व्यंग नहीं बोलना । मुझे अपना सहन करना । यह सुन कहता जनार्दन । सच है यह ॥ १६० ॥ किंतु तू चर्म-चक्षूसे न देख सकता मुझे । ले दिव्य दृष्टि है मेरी ईश्वरी योग देख तू ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४६