ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 417, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह स्वरूप यदि दिखाना होता । दी होती पहले ही यह योग्यता । बोलनेमें मैं प्रेमसे स्वभावता । भूल गया हूं ॥ ६१ ॥ पहले जुताईके बुवाईसे । थकावट भई व्यर्थ इससे । अब देता दिव्य-दृष्टि इससे । देखो निज-रूप ॥ ६२ ॥ इस दृष्टिसे फिर तू अर्जुन । हमारा ऐश्वर्य-योग संपूर्ण । देखके उसे करो संगोपन । अपने अनुभवमें ॥ ६३ ॥ ऐसा वह वेदांत-वेद्य । सकल लोकका जो आद्य । जगताका जो है आराध्य । कहने लगा ॥ ६४ ॥ संजय उवाच एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥ अर्जुनका महा-भाग्य- सुन तू कौरव-कुल-तिलक । विस्मय है मुझे इसी बातका । है क्या लक्ष्मीसे भुवनत्रयका । दूसरा भाग्यवान ॥ ६५ ॥ अथवा तत्व-विवेचनार्थ । है क्या कोई वेदसे समर्थ । सेवामें शेषसे भी विश्वस्थ । दूसरा कौन है ? ॥ ६६ ॥ उसके लिये ऐसे कष्ट सहन । करते हैं जो योगियोंके समान । अनुसरणमें बना है वाहन । गरुड सतत ॥ ६७ ॥ उन सबको है परे हटाया । जबसे पांडवोंका जन्म भया । कृष्ण-सुख सब सहज आया । इनके भागमें ॥ ६८ ॥ इन पांचोंमें भी जो अर्जुन । कृष्ण जैसे उसके आधीन । कामुक होता है अनुदिन । कामिनी-संग ॥ ६९ ॥ संजयने कहा ऐसा बोल कुरु-श्रेष्ठ महायोगेश कृष्णने । दिखाया अपना श्रेष्ठ ईश्वरी-रूप पार्थको ॥ ९ ॥ ३४७ विश्व रूप-दर्शनयोग