ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिखाया गया पंछी ऐसा न बोलता । क्रीड़ा-रंत मृग भी ऐसा न चलता । पार्थके दैवका उत्कर्ष जो दीखता । यहां अकथनीय ॥ १७० ॥ पर-ब्रह्म यह आज है संपूर्ण । भोगार्थ सिद्ध इसके ही नयन । इसकी बातका दुलार श्रीकृष्ण । करता है यहां ॥ ७१ ॥ पार्थ कोपता तब वह शांत रहता । यह रूसता तब वह है समझाता । अर्जुनसे पगलाया है जगन्नाथ । निश्चित रूपसे ॥ ७२ ॥ जनमें हैं वैसे विषय जीतकर । शुकादि पुरुष जो श्रेष्ठ मुनिवर । रह गये हैं लीला गाकर सुंदर । भाटोंके समान ॥ ७३ ॥ और योगियोंका समाधि-धन । हो रहा है पार्थके आधीन । देख यह विस्मित होता है मन । महाराज मेरा ॥ ७४ ॥ संजय कहता है कौरवेश । इसमें विस्मय नहीं खास । कृष्ण करलें जिसे अपना-सा । भाग्योदय उसका ॥ ७५ ॥ कहता है इसलिये देवराज । यह दिव्य-दृष्टि ले तू पार्थ आज । इससे देख विश्व-रूप सहज । पूर्ण रूपसे ॥ ७६ ॥ श्रीमुखके ऐसे अक्षर । निकले जिस अवसर । मिटा अविद्याका अंधार । उसी क्षणमें ॥ ७७ ॥ अक्षर नहीं थे वे देख । था ब्रह्म-साम्राज्य-दीपक । अर्जुनार्थ थी चित्कलिका । जगादी श्रीकृष्णने ॥ ७८ ॥ संपूर्ण ब्रह्मांड ही विश्व-रूपसे भर गया— प्रकटे जो दिव्य-चक्षु फिर । ज्ञान-दृष्टिका फूटा अंकुर । तथा दिखाया है सविस्तर । ऐश्वर्य-योग ॥ ७९ ॥ अवतार हैं ये जो सकल । उस महा-सिंधुके कल्लोल । विश्व दीखता है मृगजल । उसके किरणोंसे ॥ १८० ॥ उचित उस अनादि भूमिका पर । प्रकट होता है चित्र स-चराचर । अपने आप अपनेमें दामोदर । दिखाता उसको ॥ ८१ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४८