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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

सिखाया गया पंछी ऐसा न बोलता । क्रीड़ा-रंत मृग भी ऐसा न चलता । पार्थके दैवका उत्कर्ष जो दीखता । यहां अकथनीय ॥ १७० ॥ पर-ब्रह्म यह आज है संपूर्ण । भोगार्थ सिद्ध इसके ही नयन । इसकी बातका दुलार श्रीकृष्ण । करता है यहां ॥ ७१ ॥ पार्थ कोपता तब वह शांत रहता । यह रूसता तब वह है समझाता । अर्जुनसे पगलाया है जगन्नाथ । निश्चित रूपसे ॥ ७२ ॥ जनमें हैं वैसे विषय जीतकर । शुकादि पुरुष जो श्रेष्ठ मुनिवर । रह गये हैं लीला गाकर सुंदर । भाटोंके समान ॥ ७३ ॥ और योगियोंका समाधि-धन । हो रहा है पार्थके आधीन । देख यह विस्मित होता है मन । महाराज मेरा ॥ ७४ ॥ संजय कहता है कौरवेश । इसमें विस्मय नहीं खास । कृष्ण करलें जिसे अपना-सा । भाग्योदय उसका ॥ ७५ ॥ कहता है इसलिये देवराज । यह दिव्य-दृष्टि ले तू पार्थ आज । इससे देख विश्व-रूप सहज । पूर्ण रूपसे ॥ ७६ ॥ श्रीमुखके ऐसे अक्षर । निकले जिस अवसर । मिटा अविद्याका अंधार । उसी क्षणमें ॥ ७७ ॥ अक्षर नहीं थे वे देख । था ब्रह्म-साम्राज्य-दीपक । अर्जुनार्थ थी चित्कलिका । जगादी श्रीकृष्णने ॥ ७८ ॥ संपूर्ण ब्रह्मांड ही विश्व-रूपसे भर गया— प्रकटे जो दिव्य-चक्षु फिर । ज्ञान-दृष्टिका फूटा अंकुर । तथा दिखाया है सविस्तर । ऐश्वर्य-योग ॥ ७९ ॥ अवतार हैं ये जो सकल । उस महा-सिंधुके कल्लोल । विश्व दीखता है मृगजल । उसके किरणोंसे ॥ १८० ॥ उचित उस अनादि भूमिका पर । प्रकट होता है चित्र स-चराचर । अपने आप अपनेमें दामोदर । दिखाता उसको ॥ ८१ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४८

बचपनमें श्रीपतिने जब । इकबार माटी खायी थी तब । माताने क्रोधसे पकड़ी खज्ज । कड़ाई इसकी ॥ ८२ ॥ इसने तब डरके ऐसे । मुख दिखानेके बहानेसे । माताको दिखाया था धीरेसे । ब्रह्मांड सारा ॥ ८३ ॥ या मधु-वनमें ध्रुवको जैसे । गंडस्थलको शंख लगानेसे । वेद-मति भी कुंठित हो ऐसे । स्तवन किया उसने ॥ ८४ ॥ अनुग्रह वैसे कुरुपति । पार्थ पर करता श्रीपति । जानती नहीं है अब मति । माया उसकी ॥ ८५ ॥ प्रकट हुवा यकायक योगैश्वर्य । कल्पांतमें होता जैसे जल-प्रलय । विस्मयमें डूबा चित उस समय । धनंजयका ॥ ८६ ॥ आ-ब्रह्म उदकसे जैसे व्याप्त था । अकेला मार्कडेय ही तैरता था । विश्व-रूप विस्मयमें वैसे पार्थ । लगा लोटने ॥ ८७ ॥ अजी ! कितना था यहां गगन । कौन ले गया वह जो महान । कहें सब चराचर अर्जुन । औ' महाभूत भी ॥ ८८ ॥ मिट गया दिशाओंका नाम-निशान । तना नहीं होता अध-ऊर्ध्वका ज्ञान । जागृतिसे लुप्त होता है स्वप्न । वैसे लोकाकार ॥ ८९ ॥ जैसे अनेक सूर्य-तेज प्रताप । करता स-चंद्र तारागण लोप । वैसे निगल गया है विश्व-रूप । प्रपंच सर्वस्व ॥ १९० ॥ नहीं स्फुरता मनमें तब मनत्व । नहीं संभालता अपनेको बुद्धित्व । लौट आया इंद्रियोंका इंद्रियत्व । हृदयमें ही ॥ ९१ ॥ केवळ वहां स्तब्ध स्तब्धता । एकाग्र है स्वयं एकाग्रता । पडी जैसे संमोहनावस्था । विचारोंपर ॥ ९२ ॥ देखता था वह ऐसा हो विस्मित । सम्मुख था चतुर्भुज रूप स्थित । नाना रूप ले वही था सुसज्जित । चहूँ ओर ॥ ९३ ॥ होते जैसे वर्षा-ऋतुके बादल । या महा-प्रलयके तेजोमंडल । वह रूप वैसा सर्वत्र सकल । भर रहा था एक-मात्र ॥ ९४ ॥ ३४९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

प्रथम स्वरूप समाधान । होकर रहा वह अर्जुन । खुले फिर उसने लोचन । देखा विश्व-रूप ॥ ९५ ॥ देखना इन्ही नयनोंसे । विश्व-रूप संपूर्ण ऐसे । वह दुलार भी कृष्णसे । हुआ पूर्ण ॥ ९६ ॥ अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥ विश्व-रूपकी अद्भुतता-- देखता तब वहां अनेक वदन । जैसे रमा-रमणके राज-भवन । प्रकट हुए अनेकानेक निधान । लावण्य श्रियाके ॥ ९७ ॥ या आनंद-वनमें आया बहार । या सौंदर्य राज्य मिले हैं अपार । वैसे देखता वदन मनोहर । श्रीहरिका वह ॥ ९८ ॥ उसमें भी थे जो अनेक । सहज अति भयानक । प्रलय-रात्रीके कटक । उठ आया है ॥ ९९ ॥ या मृत्युके ये मुख उत्पन्न । भयके दुर्ग रचे विभिन्न । या प्रलयाग्निके ये हवन- । कुंड खुले हैं ॥ २०० ॥ ऐसे अद्भुत औ' भयंकर । देखता है रूप धनुर्धर । कई सालंकृत औ' सुंदर । तथा सौम्य भी ॥ १ ॥ ज्ञान-चक्षुसे किया अवलोकन । किंतु न होता मुखोंका अंत न जान । स-कौतुक देखने लगा नयन । विश्व रूपके ॥ २ ॥ नाना वर्णका मानो कमल-वन । विकसित हो रहा था यह जान । आदित्य-समुदायसे वे नयन । देखने लगा पार्थ ॥ ३ ॥ जैसे कृष्ण मेघ-घटाओंमें । कौंधती बिजली प्रलयमें । वैसी देखी भ्रू-भंग तलमें । पिंगलानलकी ॥ ४ ॥ अनेक मुख औ' आंखें जिसमें अति अद्भुत । बहु दिव्य अलंकार अनेक दिव्य आयुध ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ३५०

देखनेमें आश्चर्य एकैक । उसी विश्व-रूपमें जो एक । अनेकताका दर्शन-सुख । हुआ फल-प्रद ॥ ५ ॥ कहां हैं इसके चरण । कहां है मुकुट विस्तीर्ण । बढ़ती इच्छा प्रतिक्षण । देखनेकी ॥ ६ ॥ रखी वहां भाग्य-निधि पार्थ । होंगे कैसे निष्फल मनोरथ । रखता क्या भातेमें बाण व्यर्थ । पिनाकपाणी ॥ ७ ॥ नहीं तो ब्रह्मदेवकी गिरापर । होते हैं क्या झूटे अक्षर । इसीलिये साद्यंत जो है अपार । देखा विश्व-रूप ॥ ८ ॥ नहीं होता जो वेदको आकलन । उसका सकलावयव दर्शन । एक समय करते हैं नयन । धनंजयके ॥ ९ ॥ चरणोंसे मुकुट पर्यंत । देखता है रूप-श्रेष्ठ पार्थ । नाना रत्नालंकार भूषित । झलक सुंदर ॥ २१० ॥ पर-ब्रह्म बना स्वयं भूषण । सजानेके लिये अपना तन । उन अलंकारोंका मैं वर्णन । करूं कैसे ॥ ११ ॥ उसकी जो प्रभा अतीव उज्ज्वल । निखारती थी चंद्रादित्य मंडल । थी जो वह महातेजकी चित्कला । उससे प्रकटता विश्व ॥ १२ ॥ वह जो दिव्य-तेज शृंगार । किसीकी बुद्धिको हो गोचर । पहना हरि ने अलंकार । देखता पार्थ ॥ १३ ॥ शरीर था वही अलंकार । जो है हाथ वही हथियार । जो है शरीरी वही शरीर । स-चराचरमें वही ॥ १४ ॥ वही फिर ज्ञान दृष्टिसे निर्मल । देखता कर-पल्लव जो सरल । वहां तोडते जो कल्पांतक ज्वाल । ऐसे शस्त्र करमें ॥ १५ ॥ उसके किरणोंके स्फुलिंग । नक्षत्रोंको बनाते जो मूंग । उसके तेजमें छिपी आग । घुसती सिंधुमें ॥ १६ ॥ फिर कालकूट कल्लोलके तरंग । अथवा विद्युतवनके विस्फुलिंग । दीखते हैं कर-पल्लव अभंग । उचितायुध-युक्त ॥ १७ ॥ ३५१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥ विश्वरूपकी भयानकतासे विह्वल होकर दृष्टि मूंद लेना— उस भयसे हटाकर दृष्टि । देखता कंठ मुकुट किरीटी । हुई है सुरतरुकी जो सृष्टि । मानो वहींसे ॥ १८ ॥ मूल-सिद्धीका जहां महा-पीठ । शांत कमलाका विश्राम मठ । ऐसे सुमनों से वह किरीट । सजा हुआ ॥ १९ ॥ मुकुट पर पुष्प स्तवक । तथा पूजा अंध जो अनेक । गलेमें झूलते अलौकिक । पुष्पहार ॥ २२० ॥ सूर्य तेजसे स्वर्गको लपेटना । मेरु-गिरिको सुवर्णसे ओढ़ना । वैसा था उसका भव्य पहनना । पीतांबर सुंदर ॥ २१ ॥ शंकरको कर्पूरसे लेपना । कैलासको पारदसे पोतना । अथवा सागरको ही ओढ़ना । क्षीरार्णवसे ॥ २२ ॥ अजी ! चंद्रमाकी तह खोलकर । आवरण डालना आकाशपर । वैसे ही था उसके सर्वांग पर । चंदन लेपन ॥ २३ ॥ स्व-प्रकाशकी आभा जिससे बढ़ती । तथा ब्रह्मानंदकी उष्णता मिटती । पृथ्वी है अपना अस्तित्व टिकाती । उस सुगंधसे ॥ २४ ॥ ब्रह्मा जिसका लेपन करता । अनंग भी उबटन करता । उस परिमलकी जो महत्ता । बखाने कौन ॥ २५ ॥ ऐसी अंगर शोभा देखकर । विस्मित-सा रहा पांडुकुमार । यह भी न समझा देखकर । देव बैठा है या सोया है ? ॥ २६ ॥ दृष्टि खोलकर देखता बाहर । जब वही विश्व-रूप सभी ओर । आंख मूंदकर देखता ऊपर । तब भी वही रूप ॥ २७ ॥ सम्मुख देखें मुख अगणित । पीछे मुड देखा हो भयग्रस्त । वहां भी वही मुख पाया हाथ । तथा दिव्य-रूप ॥ २८ ॥ दिव्य वस्त्र पुष्प माला भूषित दिव्य गंधसे । सब आश्चर्यसे पूर्ण विश्व-व्यापी अनंत जो ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी ३५२

देखनेसे दीखना है स्वाभाविक । ना कछु इसमें विस्मय-जनक । किंतु न देखते भी दीखना एक । महादाश्चर्य ॥ २९ ॥ अनुग्रहकी यह कैसी करतूत । देखता या नहीं देखता वह पार्थ । उसके सह कर लिया आच्छादित । नारायणने ॥ २३० ॥ पड़कर विस्मय प्रवाहमें । निकलकर किनारा छूनेमें । उलझता आश्चर्य सागरमें । अनायास ॥ ३१ ॥ ऐसे ही उस अनंत-रूपके । अलौकिक दर्शन-कौशल्यके । जालमें धनंजय उलझके । हो रहा विस्मित ॥ ३२ ॥ श्री कृष्ण विश्वतोमुख स्वभावसे । दर्शनार्थी जो पार्थकी प्रार्थनासे । विश्वरूप हुआ है संपूर्णतासे । इस समय ॥ ३३ ॥ दीप या सूर्य-तेजमें है देखती । या आंख मूंदनेसे नहीं देखती । वह दिव्य-दृष्टि ऐसी नहीं थी । दी जो श्रीकृष्णने ॥ ३४ ॥ पार्थ देखता तब दोनों ओर । आंख खोलकर या मूंदकर । कहता नगरमें बैठकर । संजय राजासे ॥ ३५ ॥ कहता है “सुनो” यह संजय । विश्व-रूप देखता धनंजय । नानाभरणयुत स-विस्मय । विश्वतोमुख ॥ ३६ ॥ दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥ अनंत सूर्योंसे भी वह तेजस्वी रूप -- उस देवके जो अंग-प्रभाकी । बात कहनी है सो कहनेकी । जैसे द्वादशादित्य मिलनकी । प्रभा-सी कल्पांतमें ॥ ३७ ॥ अजी ! सहस्रावधि दिव्य-सूर्य । उदय हुए एक ही समय । फिर भी है वह अनुपमेय । उस दिव्य-प्रभासे ॥ ३८ ॥ प्रभा सहस्र सूर्योंकी नभमें एक हो दिखे । तभी उस महात्माकी प्रभासे तुल्य है नहीं ॥ १२ ॥ ३५३ (45) विश्व-रूप-दर्शनयोग

सभी विद्युल्लताओका हो मिलन । तथा प्रलयाग्निके सारे सामान । उसीमें जो दश-तेजोंका मिलान । करने पर भी ॥ ३९ ॥ उस शरीर-कांतिके सम्मुख । पास पास आएगा देख । किंतु उसके सम नहीं चोख । यह निश्चित ॥ २४० ॥ ऐसा महात्म्य उसका सहज । फैलता है अंगका सब तेज । व्यासकी कृपासे मैं वह आज । यहां देखता हूँ ॥ ४१ ॥ तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥ दृश्य और दृष्टाका अद्वय-भाव— उस विश्व-रूपमें एक ओर । जगत है अपना सविस्तर । रहते जैसे बुल्ले ठौर ठौर । महा-सागरमें ॥ ४२ ॥ अथवा आकाशमें गंधर्व-नगर । भूतलमें पिपीलिका बांधती घर । तथा परमणु मेरु-पर्वतपर । उड़ते रहते हैं ॥ ४३ ॥ इस भांति विश्व अपरंपार । देव चक्रवर्तिके तन पर । उस अवसर पांडुकुमार । देखता है ॥ ४४ ॥ ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४ ॥ एक विश्व वहां और एक आप । ऐसा दुजा भाव था जो अल्प स्वल्प । उसका भी अंतःकरणमें लोप । हुवा अचानक ॥ ४५ ॥ जागृत हुआ ब्रह्मानंद अंदर । शरीर बल खोया यहां बाहर । डूबा आनंद पुलकमें शरीर । अपाद्-मस्तक ॥ ४६ ॥ विश्वके जो सभी भेद जैसे घुल गये तब । अर्जुनने वहां देखे देहमें देवदेवके ॥ १३ ॥ फिर अर्जुन साश्चर्य हर्ष रोमांच गात्रसे । प्रभुसे जोडके हाथ बोला हो नत मस्तक ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ३५४

वर्षाका जैसे प्रथम काल । सर्वांग हरा होता है शैल । वैसे रोम-कूपमें सकल । खिले रोमद्रुम ॥ ४७ ॥ स्पर्श होते ही चंद्रकिरण । होता सोम-कांतका द्रवण । तन पर वैसे स्वेद-कण । उमड़ आये ॥ ४८ ॥ फंस जानेसे जैसे अलिकुल । झूलती कमल कलि सकल । हृदय-आनंदोर्मियोंके बल । सिहरता वैसे ॥ ४९ ॥ कर्पूर-केलिका गर्भ-पुट जैसे । छीलकर कर्पूर चूता वैसे । अर्जुनके नयन-कमलोंसे । चूते अश्रुकण ॥ २५० ॥ सात्त्विकताके ये जब अष्ट भाव । परस्परमें करते हैं उछाह । पाता है तब ब्रह्मानंदका जीव । दिव्य-साम्राज्य ॥ ५१ ॥ उदित होते ही सुधाकर । सानंद उमड़ता सागर । बार बार वैसे ऊर्मि भर । आती हृदयमें ॥ ५२ ॥ अजी ! सुखानुभवके कारण । कृपासे किया था द्वैत रक्षण । आह भर करके प्रतिक्षण । देखता पार्थ ॥ ५३ ॥ मुख कर बैठा था जिस ओर । उसी ओर मस्तक नवाकर । प्रणाम किया हाथ जोड कर । औ' किया स्तवन ॥ ५४ ॥ अर्जुन उवाच पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् । ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ- मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥ अर्जुनने कहा हे देव देखूं तव देहमें मैं हैं देव औ' भूत समूह सारा । ध्यानस्थ ब्रह्मा कमलासनस्थ महर्षि औ' नाग हैं एक साथ ॥ १५ ॥ ३५५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

सर्वत्र सभी तू ही तू भरा है प्रभो— कहता है प्रभो तेरी जय जय । तब कृपासे ही यह धनंजय । दर्शन कर सका इस समय । यह विश्व-रूप ॥ ५५ ॥ सच ही प्रभो तूने भला किया । हृदय यह आनंदित भया । तू ही है यह मैंने देख लिया । आश्रय विश्वका ॥ ५६ ॥ अनेक वन जैसे मंदार पर । श्वापदों सह लगे हैं ठौर ठौर । वैसे ही यहाँ तेरे शरीर पर । भुवन हैं अनेक ॥ ५७ ॥ अथवा गोदमें आकाशके । दीखते हैं मंडल ग्रहोंके । होते हैं झुण्ड पक्षी-कुलके । वृक्ष पर ॥ ५८ ॥ उसी भांति हे चक्रधर । विश्वात्मक तेरा शरीर । स्वर्गकेलिये भी है घर । देव गणोंके ॥ ५९ ॥ स्वामी ! महाभूतोंका पंचक । देखता हूं मैं यहां अनेक । तथा भूत-ग्राम जो अनेक । भूत-सृष्टिके ॥ २६० ॥ तुझमें दीखता है सत्य-लोक । बैठा है ब्रह्म-देव चतुर्मुख । वहां उस ओर कैलास एक । देखता मैं ॥ ६१ ॥ भवानी सह महादेव । तुझमें तू दीखता केशव । एकांशमें तुझमें ये सर्व । दीखते यहां ॥ ६२ ॥ वैसे ही कश्यपादि ऋषि-कुल । दीखते इस मूर्तिमें सकल । दीखते हैं यहां सप्त पाताल । शेष-नाग सह ॥ ६३ ॥ अथवा मानो त्रिभुवन-पति । तेरे अंगांगकी एकेक भित्ति । चतुर्दश भुवन चित्राकृति । सजाती है ॥ ६४ ॥ तथा यहां दीखते जो जो लोक । मानो चित्र रचना है अनेक । गोचर होता यहां अलौकिक । तेरा गांभीर्य ॥ ६५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३५६

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥

देखता मैं दिव्य चक्षुसे । जहां तहां सभी ओरसे । भुजदंडमें भरे जैसे । महा आकाश ॥ ६६ ॥ वैसे एक ही निरंतर । देखनेसे हैं तेरे कर । करते संपूर्ण व्यापार । एक कालमें ॥ ६७ ॥ तथा ब्रह्मका है विस्तार । खोलता ब्रह्मांड भांडार । वैसा दीखता उदर । तेरा असीम ॥ ६८ ॥ कहते हैं सहस्रशीर्ष पुरुष । देखता मैं अनंत-शीर्ष पुरुष । लगता पर-ब्रह्म हो आया मुख । इसं समय ॥ ६९ ॥ जहां तहां देखता तेरे वदन । विश्व-रूपमें जो है विराजमान । वहीं दीखते हैं अनंत नयन । पंक्ति बद्ध हो ॥ २७० ॥ रहने दो यह स्वर्ग पाताल । तथा धरणी दिशा अंतराल । इसी रूपमें भरा है सकल । मूर्तिमय हो ॥ ७१ ॥ कहीं नहीं है तेरे बिन । परमाणु-सा रिक्त स्थान । यह देख कहता मन । कितना व्यापक तू ॥ ७२ ॥ नाना प्राणि जात सहित । भरे हुए जो महाभूत । तूने व्यापलिये अनंत । देखता मैं ॥ ७३ ॥

विश्व-रूपके संबंधमें अर्जुनकी जिज्ञासा—

अनेक आंखें मुख हाथ पेट जहां तहां देखूं अनंत मूर्ति । दीखे नहीं अंत न मध्य मूल विश्वेश्वरा जो तव विश्वरूप ॥ १६ ॥

३५७ विश्व-रूप-दर्शनयोग

ऐसा तू कहांसे आया है। बैठा है खड़ा या सोया है। तेरी आकृति कितनी है। किस मांके उदरमें ? ॥ ७४ ॥ तेरा रूप कैसा वय कितना । तेरे आदि औ' अंतकी भावना । तू किस भांति है यह जानना । चाहता अब ॥ ७५ ॥ देख लिया मैने यह संपूर्ण । तू ही है अपना स्थान श्रीकृष्ण । न तू किसीका औ' न है कारण । अनादि सिद्ध तू ॥ ७६ ॥ न तू बैठा है न खड़ा है । न छोटा है या न बड़ा है। नीचे ऊपर सर्वत्र है । केवल तू ही ॥ ७७ ॥ रूपमें है तू अपनासा । वयमें भी तू है तुझ-सा । उदर पीठ भी परेशा । तेरा तू है ॥ ७८ ॥ क्या कहना है अब बात । तुझमें तू पूर्ण अनंत । बार बार सोचके ज्ञात । हुवा यह मुझको ॥ ७९ ॥ किंतु तेरे इस रूपमें एक । रह गया व्यंग कहता देख । आदि मध्य अंतका निकष । नहीं दीखता ॥ २८० ॥ देखा मैंने सर्वत्र कहीं । इन बातोंका पता नहीं । तुझमें तीनों कहीं नहीं । ये विशुद्ध रूप ॥ ८१ ॥ ऐसा आदि मध्यांत रहित । विश्वेश्वर तू अपरिमित । देखा है मैंने आज तत्वतः । विश्व-रूप ॥ ८२ ॥ तू है ऐसा महा विश्व-रूप । तेरे तनमें हैं अन्य रूप । तभी नाना वस्त्र अपरूप । पहने हैं तूने ॥ ८३ ॥ अथवा नाना रूप द्रुमांकुर । तेरे स्वरूप-महाचल पर । दिव्यालंकार फल पुष्प धर । उमड आये हैं ॥ ८४ ॥ अथः तू है स्वरूप सागर । अनेक रूप मात्र ये लहर । या तू एक महा-वृक्ष सुंदर । फला रूप-फलोंसे ॥ ८५ ॥ भूतोंसे भरा जैसे भूतल । या नक्षत्रोंसे नभ-मंडल । वैसे तू मूर्ति-मय सकल । बना स्वामी ॥ ८६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३५८

तेरा एकेक अंग-प्रांत । होता जाता है त्रि-जगत । विश्व-रूप ऐसा है मूर्त । रोम रोममें भरा ॥ ८७ ॥ लगाकर तू ऐसा विश्व-पसारा । कौन कहांसे ले आया है शरीर । सोच देखा तो सारथी तू हमारा । वही जो जनार्दन ॥ ८८ ॥ सोचना हूं तब तू मुकुंद । ऐसा ही व्यापक सर्वदा । भक्तानुकंपार्थ तू हो मुग्ध । बना है सारथी ॥ ८९ ॥ चतुर्भुज तू शाम मनमोहन । देखकर होते हैं तृप्त नयन । करनेमें तब प्रेमालिंगन । आना भुजाओंमें ॥ २९० ॥ ऐसी सुंदर मूर्ति तू स्रूप । भक्तसे हो आता है विश्व-रूप । किंतु हमारी दृष्टि है सलेप । देखते हम सामान्य ॥ ९१ ॥ गयी है अब दृष्टिकी मलीनता । सहज दी तूने दृष्टिमें दिव्यता । इसीलिये जाना मैंने यथार्थता । महिमा तेरी ॥ ९२ ॥ उस मरियलके उस पार । छिपा था रूप जो ना ओर छोर । वह सम्मुख आया भयंकर । पहचाना मैंने ॥ ९३ ॥ किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोरार्शि सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥ वही मुकुट जो पस्तक पर । दीखता है यहां धरणी धर । अज है उसका तेज अपार । है अति विस्मय ॥ ९४ ॥ प्रभो गदा चक्र किरीट धारी प्रकाश सर्वत्र भरा प्रचंड । देखा न जाता वह अप्रमेय जला रहे सूरज अग्नि ज्योति ॥ १७ ॥ ३५९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

भक्त मनोरथार्थ विश्व-रूप बना ऋषिकेश— ऊपरका जो यह हाथ । चक्रचलानेमें है रत । वह चिन्ह स्पष्ट है तात । विश्व-मूर्तिका ॥ ९५ ॥ वहीं दूसरे हाथमें गदा । नीचेका हाथ है निरायुध । रास संभालते है गोविंद । सरसाते जो ॥ ९६ ॥ तथा उसी वेगसे तू सहसा । मेरे मनोरथार्थ ऋषीकेश । विश्व-रूप बना है विश्वेश । जानता हूं मैं ॥ ९७ ॥ किंतु है क्या यह अतिओज । मौका है न सोचनेका आज । हुवा है मेरा चित्त अबूझ । अतिशय तात ॥ ९८ ॥ यह विश्व-रूप है भी या नहीं । सोच ऐसा श्वास चलता नहीं । अंग-प्रभाकी जो यह नवाई । भरी है सर्वत्र ॥ ९९ ॥ इस तेजसे नयन झुलसता । सूर्य मलिन खद्योतसा भासता । ऐसी तीव्र है जिसकी अद्भुतता । यहां आज ॥ ३०० ॥ यह मानो महा-तेजका महार्णव । विश्वको डुबो देता है कर तांडव । युगांतका वज्रपात जैसे देख । ढक देता है ॥ १ ॥ अथवा संहार तेजकी जो ज्वाल । तोड़के मंडप बांधा अंतराल । दिव्य-चक्षुसे अब नभ-मंडल । देखा नहीं जाता ॥ २ ॥ अधिकाधिक प्रकाश उज्ज्वल । जलाता बनकर महाज्वाल । देखनेसे होती दृष्टि व्याकुल । दिव्यता होने पर भी ॥ ३ ॥ अथवा महा-प्रलयका प्रचंड । होता है जो कालाग्निरुद्रमें गूढ़ । उस तीसरे नयनके प्रगाढ़ । खुले हैं पलक ॥ ४ ॥ तथा फैला यह प्रकाश । पंचाग्नि-ज्वालाओंके पाश । करते ब्रह्मांडका शोष । अळकर ॥ ५ ॥ तेजाराशी है जो ऐसी अद्भुत । देखता मैं आज ही हो चकित । तेरी कांतिकी व्याप्ति है अनंत । विश्व-रूप ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६०

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥ अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम् स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥ तेरे तेजसे सारा विश्व संतप्त है प्रभो— हे देव तू है अक्षर । त्रिअर्थ मात्रासे पर । श्रुति है जिसका घर । ढूंढती है ॥ ७ ॥ आकारका तू आयतन । विश्व निक्षेपका निधान । वह अव्यय तू गहन । अविनाशी जो ॥ ८ ॥ धर्मका है तू जीवन । अनादि नित्य-नूतन । सैंतीसवा तू महान । पुरुष विशेष ॥ ९ ॥ तू है आदि मध्यांत रहित । सर्व सामर्थ्यसे तू है अनंत । विश्व-बाहु तू अपरिमित । विश्व-चरण तू ॥ ३१० ॥ असीम तू अक्षर जाननेका तू ही महा आश्रय विश्वका है । तू राखता शाश्वत-धर्म नित्य मैं जानता तू परमात्म तत्व ॥ १८ ॥ अनादि मध्यांत अनंत शक्ति अनेक भुजा मुख अग्नि-ज्योति । आंखें दिखे उज्ज्वल चन्द्र सूर्य स्वतेजसे तू जगको तपाता ॥ १९ ॥ (46) ३६१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

मानो सूर्य चंद्रकी जो कला । तेरी कोप-प्रसाद लीला । कृपा दृष्टिसे कर संभाल । कोप कटाक्षसे क्रोध ॥ ११ ॥ इस भांति मैं अब देखता । प्रख्याग्नि तेज-सा अनंत । तेरे बदनकी जो दिव्यता । विस्मित होकर ॥ १२ ॥ आगसे धधकते पर्वत । निकलती ज्वालायें अद्भुत । जैसे चाटते हैं दाढं दांत । ज्वाला जिव्हा ॥ १३ ॥ इस बदनकी जो है ऊब । तथा सर्वांग-कांतिकी प्रभा । करती विश्वमें अति क्षोभ । अकुलाहट भरा ॥ १४ ॥ द्यावापृथिव्योरिदमंतरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥ जो देख अकुला रहा त्रिलोक — भूलोक और पाताल । पृथ्वी तथा अंतराल । दश दिशायें आकुल । है दिशा चक्र ॥ १५ ॥ तुझसे है जो यह संपूर्ण एक । भरा हुवा देखता मैं सकौतुक । गगन सह डूबा है, भयानक । विश्व-रूपमें ॥ १६ ॥ या रस लहरोंसे अद्भुत । चतुर्दश भुवन हैं व्याप्त । वैसे मैं हो अत्यंत विस्मित । देखूं क्या क्या ॥ १७ ॥ अनाकलित व्याप्ति जो असाधारण । सही न जाती रूपकी उग्रता-तीक्ष्ण । सुख गया दूर, यहां विश्वके प्राण । निकले भयसे ॥ १८ ॥ सभी दिशा विस्तृत अंतरिक्ष सर्वत्र तू एक हि छा रहा है । तेरा यही अद्भुत उग्र रूप जो देख अकुला रहा त्रिलोक ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी ३६२

तुझको देखकर हे विश्वेश्वर । न जाने आया कैसे भय उभर । डूब रहा है अब दुःख सागर । लहरियोंमें त्रिलोक ॥ १९ ॥ वैसे तुझ महात्माका दरशन । वहां क्या है भय दुःखका स्थान । जिससे न होता सुखका ज्ञान । इसका भान है मुझे ॥ ३२० ॥ जब तक तेरा रूप नहीं देखा । तब तक जगको संसार चोखा । देखने पर विजय विष चरखा । हुई अरुचि ॥ २१ ॥ आगे रूप नहीं होता आकलन । जिससे नहीं होता प्रेमालिंगन । पीछे दीखता है संसार मलिन । ऐसा उभय संकट ॥ २२ ॥ तभी पीछे हठे तो संसार । जो है रुकावट अनिवार । आगे तू अनिवार अपार । न होता आकलन ॥ २३ ॥ ऐसा है उभय संकटग्रस्त । त्रिभुवन होता है अतित्रस्त । मेरा मत हुव ऐसा निश्चित । यह रूप देखके ॥ २४ ॥ संतापसे जो ऐसा झुरसा हुआ । उपशमार्थ सिंधुपे आया हुआ । तरंग तांडव देख डरा हुआ । रहता है जैसे ॥ २५ ॥ ऐसा हुआ यह विश्व समस्त । तुझे देख तड़पनेमें रत । उससे भला पैर तीर प्राप्त । ज्ञान-संपन्न देव ॥ २६ ॥ अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥ अविद्या-सिंधु और स्वर्ग संसार फंदोंसे मुक्तिके लिये तेरी प्रार्थना— ये देव सारे तुझमें समाये कोई भयग्रस्त हो बद्ध-हस्त । मांगल्य गाके तब सिद्ध-संत स्तवते तुझीको अनेक भांति ॥ २१ ॥ ३६३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

तेरे शरीरका यह जो तेज । जलाता है सारे कर्मका बीज । जिससे तुझमें मिलते निज । सद्भावनासे ॥ २७ ॥ तथा जो हैं सहज भय-भीत । होकर तेरे पथके अमित । गाते हैं तेरी प्रार्थनाके गीत । कर जोड करके ॥ २८ ॥ देव ! डूबे हैं अविद्या-सिंधुमें । फंसे हैं विषय-विष-जालमें । फंसे हैं स्वर्ग-संसार फंडोंमें । दोनों ओरसे ॥ २९ ॥ ऐसे हमको करनेमें मुक्त । कौन हैं त्रिभुवनमें समस्त । आये हैं हम सो शरणागत । कहते हैं ये ॥ ३० ॥ तथा महर्षि अथवा सिद्ध । विद्याधर संघ जो विविध । गाते हैं तेरा ही स्वस्तिवाद । तथा शुभ-स्तवन ॥ ३१ ॥ रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गंधर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥ रुद्र-आदित्योंके ये समुदाय । वसु साध्य आदि ये देव । अश्विनी विश्वे-देव स-वैभव । मरुत भी वहां ॥ ३२ ॥ सुनो अग्नि तथा गंधर्व । यक्ष राक्षस गण सर्व । महेंद्रादि जो मुख्य देव । तथा सिद्धादिक ॥ ३३ ॥ ये सब धर अपना स्वस्थान । विस्मित करते अवलोकन । महा-मूर्तिका है दिव्य-दर्शन । देखता हूँ मैं ॥ ३४ ॥ आदित्य विश्वे वसु रुद्र साध्य कुमार दोनों पितृ-देव वायु । गंधर्व दैत्यों सह यक्ष सिद्ध सारे तुझे विस्मित देखते हैं ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६४

फिर देखते हैं क्षणक्षण । विस्मययुत अंतःकरण । नत-मस्तक हो समर्पण । करते निज मुकुट ॥ ३५ ॥ जय घोषके कलरव मधुर । गूंजते हैं स्वर्गमें जो सुंदर । रखे हैं ललाट पर सुंदर । कर संपुट नमनार्थ ॥ ३६ ॥ वह नम्रता-वृक्ष बन सकळ । खिला सात्विक वसंतसे सकाळ । तभी उस कर-संपुटमें फल । लगा यह तेरा ॥ ३७ ॥ रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥ नयनोंका हुवा यह भाग्योदय । या जीवोंका सुख सुकाळ उदय । तभी हुवा तेरे रूपका सदय । भव्य दर्शन ॥ ३८ ॥ रूप है जो यह लोक-व्यापक । चहूं ओरसे देखता सम्मुख । देवोंके लिये भी जो भयानक । देखके चौंकते हैं ॥ ३९ ॥ ऐसा एक किंतु है विचित्र । तथा भयानक हैं वक्त्र । बहु लोचन तथा सशस्त्र । भुजा असंख्य ॥ ३४० ॥ अनेक जो चारु-चरण । बहु उदर नाना-वर्ण । प्रति वदन मद-पूर्ण । आवेशसे ॥ ४१ ॥ अथवा महा-प्रलय समय । पाशमें बांधकर यमराय । प्रलयाग्नि जलाता भयमय । जहां तहां सर्वत्र ॥ ४२ ॥ या संहार त्रिपुरारिका यंत्र । या प्रलय-भैरवका जो क्षेत्र । अनेक युगांत शक्तिका पात्र । आगे किये विनाशाथर्य ॥ ४३ ॥ विशाल है रूप असंख्य नेत्र करालं दाढें मुख हाथ पैर । अनेक हैं ऊरु विशाल पेट ये देख हूँ व्याकुल लोक मैं भी ॥ २३ ॥ ३६५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

अध्याय ८: अक्षरब्रह्मयोग

वैसे जहां तहां चहूं ओर। तेरे वदन हैं भयंकर। वहां सिंहसे दांत प्रखर। दीखते क्रोधाग्निसे ॥ ४४ ॥ देख जैसे काल रात्रिका अंधार। करते हैं पिशाच घोर संचार। वैसे वदनमें प्रलय रुधिर। भरे हैं दांत ॥ ४५ ॥ कालने किया है जैसे युद्ध-निमंत्रण। उन्मत्त हुआ सर्व संहारक मरण। वैसे दीखते हैं मुखमें भय लक्षण। तेरे आज ॥ ४६ ॥ बेचारे उस त्रिभुवन पर। सहज दृष्टि डाली इक बार। वह दुःख कालिंदी तट पर। हो गया है वृक्ष ॥ ४७ ॥ रूप है यह महा-मृत्युका सागर। उठते हैं उसमें दुर्वातां भंवर। त्रैलोक्य-जीवित डोंगी खाती चक्कर। उलटी आंधीमें ॥ ४८ ॥ क्रोधसे तू यदि यह कहता। लोगोंकी बात क्यों व्यर्थ करता। इसमें तेरा क्या आता जाता। भोग तू ध्यान सुख ॥ ४९ ॥ देव ! लोगोंकी बात क्या साधारण। किया है यह परदा स-कारण। कांप रहे हैं मेरे स-देहप्राण। देखकर रूप ॥ ३५० ॥ संहार-रुद्र भी घबड़ाता जिससे। मृत्यु भी छिप जाता जिसके डरसे। ऐसा महाबली मैं कांपता भयसे। ऐसा किया तूने ॥ ५१ ॥ महामारीका यह कराल रूप। भयको जो छिपाने लगता आप। इसको कहना यदि विश्व-रूप। आश्चर्य है यह ॥ ५२ ॥ नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥ आकाश भेदे बहुरंगवाले खुले मुखोंके विशाल नेत्र। ज्वलंत तू देव तुझ देख जीव अधीर होता सुख शांति खोता ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६६

महाकालसे हठ छोड़कर । अनेक मुख जो क्रोधसे भर । आकाशको ओछा मान विस्तार । दिखाते हैं अपना ॥ ५३ ॥ नभ-विस्तार न करता आकलन । त्रिलोक पवन न करता वेष्टन । जिसमेंसे ज्वाला निकलती महान । धधकती हुई ॥ ५४ ॥ इनमें हैं विविध आकार । वैसे ही हैं वर्णके प्रकार । प्रलयाग्नि भी लेता आधार । इन मुखोंका ॥ ५५ ॥ इतना है इनके अंगका तेज । इनसे राख होता विश्व सहज । एक मुखमें मुख उनमें तेज । दांत औ' दाढ भी ॥ ५६ ॥ हुवा यहां मानो वायुको धनुर्वात । समुद्र हुवा महापूरमें पतित । विषाग्नि मारनेमें हुवा प्रवृत्त । बड़वानलको ॥ ५७ ॥ पीता है जैसे अग्नि हालाहल । मृत्यु मरनेमें सन्नद्ध है नवल । संहार तेज आज निगलता खोल । मुख बन कर ॥ ५८ ॥ किंतु कैसे हैं ये विशाल । जैसे टूटा हुवा अंतराल । मानो आकाशका ही बिल । पड़ा है यह ॥ ५९ ॥ या वसुंधराको बगलमें दबाकर । हिरण्याक्ष घुसा जब पाताल गव्हर । पाताल कुहर खोला हाटकेश्वर । वक्त्र दीखते ऐसे ॥ ३६० ॥ तेरे मुखोंका ऐसा विकास । उसमें जिह्वाओंका आवेश । विश्व बनता अधूरा ग्रास । इसीलिये नहीं खाता ॥ ६१ ॥ तथा पातालव्यालोंका फूत्कार । विष ज्वाला जा छूती हैं अंबर । वैसी फैली है जिव्हा भयंकर । बदन-दरीमें ॥ ६२ ॥ प्रलय-विद्युतके झुंड लेकर । सजाये हैं जैसे गगन शिखर । मुखमें दीखते हैं दांत प्रखर । तथा दाढ भी वैसे ॥ ६३ ॥ जैसे ललाट परके अंचलमें । भयको ही डराते हैं अंधारमें । महा-मृत्युके हैं आवेग वेगमें । अंगार-सी आंखें ॥ ६४ ॥ ऐसा ले यह महा-भयका भोज । यहां क्या करने आया है तू काज । समझ न पा करके यह मुझ । मरण भय आया है ॥ ६५ ॥ ३६७ विश्व रूप-दर्शनयोग