ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमानो सूर्य चंद्रकी जो कला । तेरी कोप-प्रसाद लीला । कृपा दृष्टिसे कर संभाल । कोप कटाक्षसे क्रोध ॥ ११ ॥ इस भांति मैं अब देखता । प्रख्याग्नि तेज-सा अनंत । तेरे बदनकी जो दिव्यता । विस्मित होकर ॥ १२ ॥ आगसे धधकते पर्वत । निकलती ज्वालायें अद्भुत । जैसे चाटते हैं दाढं दांत । ज्वाला जिव्हा ॥ १३ ॥ इस बदनकी जो है ऊब । तथा सर्वांग-कांतिकी प्रभा । करती विश्वमें अति क्षोभ । अकुलाहट भरा ॥ १४ ॥ द्यावापृथिव्योरिदमंतरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥ जो देख अकुला रहा त्रिलोक — भूलोक और पाताल । पृथ्वी तथा अंतराल । दश दिशायें आकुल । है दिशा चक्र ॥ १५ ॥ तुझसे है जो यह संपूर्ण एक । भरा हुवा देखता मैं सकौतुक । गगन सह डूबा है, भयानक । विश्व-रूपमें ॥ १६ ॥ या रस लहरोंसे अद्भुत । चतुर्दश भुवन हैं व्याप्त । वैसे मैं हो अत्यंत विस्मित । देखूं क्या क्या ॥ १७ ॥ अनाकलित व्याप्ति जो असाधारण । सही न जाती रूपकी उग्रता-तीक्ष्ण । सुख गया दूर, यहां विश्वके प्राण । निकले भयसे ॥ १८ ॥ सभी दिशा विस्तृत अंतरिक्ष सर्वत्र तू एक हि छा रहा है । तेरा यही अद्भुत उग्र रूप जो देख अकुला रहा त्रिलोक ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी ३६२