ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥ अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम् स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥ तेरे तेजसे सारा विश्व संतप्त है प्रभो— हे देव तू है अक्षर । त्रिअर्थ मात्रासे पर । श्रुति है जिसका घर । ढूंढती है ॥ ७ ॥ आकारका तू आयतन । विश्व निक्षेपका निधान । वह अव्यय तू गहन । अविनाशी जो ॥ ८ ॥ धर्मका है तू जीवन । अनादि नित्य-नूतन । सैंतीसवा तू महान । पुरुष विशेष ॥ ९ ॥ तू है आदि मध्यांत रहित । सर्व सामर्थ्यसे तू है अनंत । विश्व-बाहु तू अपरिमित । विश्व-चरण तू ॥ ३१० ॥ असीम तू अक्षर जाननेका तू ही महा आश्रय विश्वका है । तू राखता शाश्वत-धर्म नित्य मैं जानता तू परमात्म तत्व ॥ १८ ॥ अनादि मध्यांत अनंत शक्ति अनेक भुजा मुख अग्नि-ज्योति । आंखें दिखे उज्ज्वल चन्द्र सूर्य स्वतेजसे तू जगको तपाता ॥ १९ ॥ (46) ३६१ विश्व-रूप-दर्शनयोग