ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 430, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्त मनोरथार्थ विश्व-रूप बना ऋषिकेश— ऊपरका जो यह हाथ । चक्रचलानेमें है रत । वह चिन्ह स्पष्ट है तात । विश्व-मूर्तिका ॥ ९५ ॥ वहीं दूसरे हाथमें गदा । नीचेका हाथ है निरायुध । रास संभालते है गोविंद । सरसाते जो ॥ ९६ ॥ तथा उसी वेगसे तू सहसा । मेरे मनोरथार्थ ऋषीकेश । विश्व-रूप बना है विश्वेश । जानता हूं मैं ॥ ९७ ॥ किंतु है क्या यह अतिओज । मौका है न सोचनेका आज । हुवा है मेरा चित्त अबूझ । अतिशय तात ॥ ९८ ॥ यह विश्व-रूप है भी या नहीं । सोच ऐसा श्वास चलता नहीं । अंग-प्रभाकी जो यह नवाई । भरी है सर्वत्र ॥ ९९ ॥ इस तेजसे नयन झुलसता । सूर्य मलिन खद्योतसा भासता । ऐसी तीव्र है जिसकी अद्भुतता । यहां आज ॥ ३०० ॥ यह मानो महा-तेजका महार्णव । विश्वको डुबो देता है कर तांडव । युगांतका वज्रपात जैसे देख । ढक देता है ॥ १ ॥ अथवा संहार तेजकी जो ज्वाल । तोड़के मंडप बांधा अंतराल । दिव्य-चक्षुसे अब नभ-मंडल । देखा नहीं जाता ॥ २ ॥ अधिकाधिक प्रकाश उज्ज्वल । जलाता बनकर महाज्वाल । देखनेसे होती दृष्टि व्याकुल । दिव्यता होने पर भी ॥ ३ ॥ अथवा महा-प्रलयका प्रचंड । होता है जो कालाग्निरुद्रमें गूढ़ । उस तीसरे नयनके प्रगाढ़ । खुले हैं पलक ॥ ४ ॥ तथा फैला यह प्रकाश । पंचाग्नि-ज्वालाओंके पाश । करते ब्रह्मांडका शोष । अळकर ॥ ५ ॥ तेजाराशी है जो ऐसी अद्भुत । देखता मैं आज ही हो चकित । तेरी कांतिकी व्याप्ति है अनंत । विश्व-रूप ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६०