भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तेरा एकेक अंग-प्रांत । होता जाता है त्रि-जगत । विश्व-रूप ऐसा है मूर्त । रोम रोममें भरा ॥ ८७ ॥ लगाकर तू ऐसा विश्व-पसारा । कौन कहांसे ले आया है शरीर । सोच देखा तो सारथी तू हमारा । वही जो जनार्दन ॥ ८८ ॥ सोचना हूं तब तू मुकुंद । ऐसा ही व्यापक सर्वदा । भक्तानुकंपार्थ तू हो मुग्ध । बना है सारथी ॥ ८९ ॥ चतुर्भुज तू शाम मनमोहन । देखकर होते हैं तृप्त नयन । करनेमें तब प्रेमालिंगन । आना भुजाओंमें ॥ २९० ॥ ऐसी सुंदर मूर्ति तू स्रूप । भक्तसे हो आता है विश्व-रूप । किंतु हमारी दृष्टि है सलेप । देखते हम सामान्य ॥ ९१ ॥ गयी है अब दृष्टिकी मलीनता । सहज दी तूने दृष्टिमें दिव्यता । इसीलिये जाना मैंने यथार्थता । महिमा तेरी ॥ ९२ ॥ उस मरियलके उस पार । छिपा था रूप जो ना ओर छोर । वह सम्मुख आया भयंकर । पहचाना मैंने ॥ ९३ ॥ किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोरार्शि सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥ वही मुकुट जो पस्तक पर । दीखता है यहां धरणी धर । अज है उसका तेज अपार । है अति विस्मय ॥ ९४ ॥ प्रभो गदा चक्र किरीट धारी प्रकाश सर्वत्र भरा प्रचंड । देखा न जाता वह अप्रमेय जला रहे सूरज अग्नि ज्योति ॥ १७ ॥ ३५९ विश्व-रूप-दर्शनयोग