ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा तू कहांसे आया है। बैठा है खड़ा या सोया है। तेरी आकृति कितनी है। किस मांके उदरमें ? ॥ ७४ ॥ तेरा रूप कैसा वय कितना । तेरे आदि औ' अंतकी भावना । तू किस भांति है यह जानना । चाहता अब ॥ ७५ ॥ देख लिया मैने यह संपूर्ण । तू ही है अपना स्थान श्रीकृष्ण । न तू किसीका औ' न है कारण । अनादि सिद्ध तू ॥ ७६ ॥ न तू बैठा है न खड़ा है । न छोटा है या न बड़ा है। नीचे ऊपर सर्वत्र है । केवल तू ही ॥ ७७ ॥ रूपमें है तू अपनासा । वयमें भी तू है तुझ-सा । उदर पीठ भी परेशा । तेरा तू है ॥ ७८ ॥ क्या कहना है अब बात । तुझमें तू पूर्ण अनंत । बार बार सोचके ज्ञात । हुवा यह मुझको ॥ ७९ ॥ किंतु तेरे इस रूपमें एक । रह गया व्यंग कहता देख । आदि मध्य अंतका निकष । नहीं दीखता ॥ २८० ॥ देखा मैंने सर्वत्र कहीं । इन बातोंका पता नहीं । तुझमें तीनों कहीं नहीं । ये विशुद्ध रूप ॥ ८१ ॥ ऐसा आदि मध्यांत रहित । विश्वेश्वर तू अपरिमित । देखा है मैंने आज तत्वतः । विश्व-रूप ॥ ८२ ॥ तू है ऐसा महा विश्व-रूप । तेरे तनमें हैं अन्य रूप । तभी नाना वस्त्र अपरूप । पहने हैं तूने ॥ ८३ ॥ अथवा नाना रूप द्रुमांकुर । तेरे स्वरूप-महाचल पर । दिव्यालंकार फल पुष्प धर । उमड आये हैं ॥ ८४ ॥ अथः तू है स्वरूप सागर । अनेक रूप मात्र ये लहर । या तू एक महा-वृक्ष सुंदर । फला रूप-फलोंसे ॥ ८५ ॥ भूतोंसे भरा जैसे भूतल । या नक्षत्रोंसे नभ-मंडल । वैसे तू मूर्ति-मय सकल । बना स्वामी ॥ ८६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३५८