ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेखनेसे दीखना है स्वाभाविक । ना कछु इसमें विस्मय-जनक । किंतु न देखते भी दीखना एक । महादाश्चर्य ॥ २९ ॥ अनुग्रहकी यह कैसी करतूत । देखता या नहीं देखता वह पार्थ । उसके सह कर लिया आच्छादित । नारायणने ॥ २३० ॥ पड़कर विस्मय प्रवाहमें । निकलकर किनारा छूनेमें । उलझता आश्चर्य सागरमें । अनायास ॥ ३१ ॥ ऐसे ही उस अनंत-रूपके । अलौकिक दर्शन-कौशल्यके । जालमें धनंजय उलझके । हो रहा विस्मित ॥ ३२ ॥ श्री कृष्ण विश्वतोमुख स्वभावसे । दर्शनार्थी जो पार्थकी प्रार्थनासे । विश्वरूप हुआ है संपूर्णतासे । इस समय ॥ ३३ ॥ दीप या सूर्य-तेजमें है देखती । या आंख मूंदनेसे नहीं देखती । वह दिव्य-दृष्टि ऐसी नहीं थी । दी जो श्रीकृष्णने ॥ ३४ ॥ पार्थ देखता तब दोनों ओर । आंख खोलकर या मूंदकर । कहता नगरमें बैठकर । संजय राजासे ॥ ३५ ॥ कहता है “सुनो” यह संजय । विश्व-रूप देखता धनंजय । नानाभरणयुत स-विस्मय । विश्वतोमुख ॥ ३६ ॥ दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥ अनंत सूर्योंसे भी वह तेजस्वी रूप -- उस देवके जो अंग-प्रभाकी । बात कहनी है सो कहनेकी । जैसे द्वादशादित्य मिलनकी । प्रभा-सी कल्पांतमें ॥ ३७ ॥ अजी ! सहस्रावधि दिव्य-सूर्य । उदय हुए एक ही समय । फिर भी है वह अनुपमेय । उस दिव्य-प्रभासे ॥ ३८ ॥ प्रभा सहस्र सूर्योंकी नभमें एक हो दिखे । तभी उस महात्माकी प्रभासे तुल्य है नहीं ॥ १२ ॥ ३५३ (45) विश्व-रूप-दर्शनयोग