भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥ विश्वरूपकी भयानकतासे विह्वल होकर दृष्टि मूंद लेना— उस भयसे हटाकर दृष्टि । देखता कंठ मुकुट किरीटी । हुई है सुरतरुकी जो सृष्टि । मानो वहींसे ॥ १८ ॥ मूल-सिद्धीका जहां महा-पीठ । शांत कमलाका विश्राम मठ । ऐसे सुमनों से वह किरीट । सजा हुआ ॥ १९ ॥ मुकुट पर पुष्प स्तवक । तथा पूजा अंध जो अनेक । गलेमें झूलते अलौकिक । पुष्पहार ॥ २२० ॥ सूर्य तेजसे स्वर्गको लपेटना । मेरु-गिरिको सुवर्णसे ओढ़ना । वैसा था उसका भव्य पहनना । पीतांबर सुंदर ॥ २१ ॥ शंकरको कर्पूरसे लेपना । कैलासको पारदसे पोतना । अथवा सागरको ही ओढ़ना । क्षीरार्णवसे ॥ २२ ॥ अजी ! चंद्रमाकी तह खोलकर । आवरण डालना आकाशपर । वैसे ही था उसके सर्वांग पर । चंदन लेपन ॥ २३ ॥ स्व-प्रकाशकी आभा जिससे बढ़ती । तथा ब्रह्मानंदकी उष्णता मिटती । पृथ्वी है अपना अस्तित्व टिकाती । उस सुगंधसे ॥ २४ ॥ ब्रह्मा जिसका लेपन करता । अनंग भी उबटन करता । उस परिमलकी जो महत्ता । बखाने कौन ॥ २५ ॥ ऐसी अंगर शोभा देखकर । विस्मित-सा रहा पांडुकुमार । यह भी न समझा देखकर । देव बैठा है या सोया है ? ॥ २६ ॥ दृष्टि खोलकर देखता बाहर । जब वही विश्व-रूप सभी ओर । आंख मूंदकर देखता ऊपर । तब भी वही रूप ॥ २७ ॥ सम्मुख देखें मुख अगणित । पीछे मुड देखा हो भयग्रस्त । वहां भी वही मुख पाया हाथ । तथा दिव्य-रूप ॥ २८ ॥ दिव्य वस्त्र पुष्प माला भूषित दिव्य गंधसे । सब आश्चर्यसे पूर्ण विश्व-व्यापी अनंत जो ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी ३५२

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