ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेखनेमें आश्चर्य एकैक । उसी विश्व-रूपमें जो एक । अनेकताका दर्शन-सुख । हुआ फल-प्रद ॥ ५ ॥ कहां हैं इसके चरण । कहां है मुकुट विस्तीर्ण । बढ़ती इच्छा प्रतिक्षण । देखनेकी ॥ ६ ॥ रखी वहां भाग्य-निधि पार्थ । होंगे कैसे निष्फल मनोरथ । रखता क्या भातेमें बाण व्यर्थ । पिनाकपाणी ॥ ७ ॥ नहीं तो ब्रह्मदेवकी गिरापर । होते हैं क्या झूटे अक्षर । इसीलिये साद्यंत जो है अपार । देखा विश्व-रूप ॥ ८ ॥ नहीं होता जो वेदको आकलन । उसका सकलावयव दर्शन । एक समय करते हैं नयन । धनंजयके ॥ ९ ॥ चरणोंसे मुकुट पर्यंत । देखता है रूप-श्रेष्ठ पार्थ । नाना रत्नालंकार भूषित । झलक सुंदर ॥ २१० ॥ पर-ब्रह्म बना स्वयं भूषण । सजानेके लिये अपना तन । उन अलंकारोंका मैं वर्णन । करूं कैसे ॥ ११ ॥ उसकी जो प्रभा अतीव उज्ज्वल । निखारती थी चंद्रादित्य मंडल । थी जो वह महातेजकी चित्कला । उससे प्रकटता विश्व ॥ १२ ॥ वह जो दिव्य-तेज शृंगार । किसीकी बुद्धिको हो गोचर । पहना हरि ने अलंकार । देखता पार्थ ॥ १३ ॥ शरीर था वही अलंकार । जो है हाथ वही हथियार । जो है शरीरी वही शरीर । स-चराचरमें वही ॥ १४ ॥ वही फिर ज्ञान दृष्टिसे निर्मल । देखता कर-पल्लव जो सरल । वहां तोडते जो कल्पांतक ज्वाल । ऐसे शस्त्र करमें ॥ १५ ॥ उसके किरणोंके स्फुलिंग । नक्षत्रोंको बनाते जो मूंग । उसके तेजमें छिपी आग । घुसती सिंधुमें ॥ १६ ॥ फिर कालकूट कल्लोलके तरंग । अथवा विद्युतवनके विस्फुलिंग । दीखते हैं कर-पल्लव अभंग । उचितायुध-युक्त ॥ १७ ॥ ३५१ विश्व-रूप-दर्शनयोग