ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 420, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम स्वरूप समाधान । होकर रहा वह अर्जुन । खुले फिर उसने लोचन । देखा विश्व-रूप ॥ ९५ ॥ देखना इन्ही नयनोंसे । विश्व-रूप संपूर्ण ऐसे । वह दुलार भी कृष्णसे । हुआ पूर्ण ॥ ९६ ॥ अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥ विश्व-रूपकी अद्भुतता-- देखता तब वहां अनेक वदन । जैसे रमा-रमणके राज-भवन । प्रकट हुए अनेकानेक निधान । लावण्य श्रियाके ॥ ९७ ॥ या आनंद-वनमें आया बहार । या सौंदर्य राज्य मिले हैं अपार । वैसे देखता वदन मनोहर । श्रीहरिका वह ॥ ९८ ॥ उसमें भी थे जो अनेक । सहज अति भयानक । प्रलय-रात्रीके कटक । उठ आया है ॥ ९९ ॥ या मृत्युके ये मुख उत्पन्न । भयके दुर्ग रचे विभिन्न । या प्रलयाग्निके ये हवन- । कुंड खुले हैं ॥ २०० ॥ ऐसे अद्भुत औ' भयंकर । देखता है रूप धनुर्धर । कई सालंकृत औ' सुंदर । तथा सौम्य भी ॥ १ ॥ ज्ञान-चक्षुसे किया अवलोकन । किंतु न होता मुखोंका अंत न जान । स-कौतुक देखने लगा नयन । विश्व रूपके ॥ २ ॥ नाना वर्णका मानो कमल-वन । विकसित हो रहा था यह जान । आदित्य-समुदायसे वे नयन । देखने लगा पार्थ ॥ ३ ॥ जैसे कृष्ण मेघ-घटाओंमें । कौंधती बिजली प्रलयमें । वैसी देखी भ्रू-भंग तलमें । पिंगलानलकी ॥ ४ ॥ अनेक मुख औ' आंखें जिसमें अति अद्भुत । बहु दिव्य अलंकार अनेक दिव्य आयुध ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ३५०